देश में 28 लाख से अधिक पेड़ों की कटाई को मंजूरी, छत्तीसगढ़ का हसदेव पहले नंबर पर

Arun Tiwari | Jun 26, 2026, 14:52 IST
हसदेव अरण्य पर सबसे बड़ा संकट
देश के विकास के लिए इस खबर को चिंताजनक माना जा सकता है। एक तरफ विकास है और दूसरी तरफ पर्यावरण। विकास देश के जंगलों को लील रहा है। पिछले तीन साल में देश में 28 लाख पेड़ों को काटने की मंजूरी दी गई है। इनमें छत्तीसगढ़ पहले नंबर पर है।

समझें क्या है पूरा मामला

  • जुलाई 2023 से मई 2026 के बीच 28 लाख से अधिक पेड़ों की कटाई को मंजूरी
  • 80 फीसदी से अधिक वन भूमि डायवर्जन प्रस्तावों को स्वीकृति
  • कुल स्वीकृत कटाई का लगभग 90 फीसदी हिस्सा खनन, बिजली और पुनर्वास परियोजनाओं से जुड़ा
  • हसदेव क्षेत्र की कोयला परियोजना में 4 लाख से अधिक पेड़ों की कटाई की अनुमति

Raipur : विकास पर्यावरण पर बहुत भारी पड़ रहा है। खनन परियोजनाएं हरे भरे जंगलों को खाती जा रही हैं। एक रिपोर्ट में सामने आया है कि पिछले तीन सालों में देश के अलग अलग राज्यों में 28 लाख पेड़ों को काटने की मंजूरी दी गई है। पेड़ों की कटाई के मामले में छत्तीसगढ़ का हसदेव पहले नंबर पर है। यहां हाल ही में पर्यावरण मंत्रालय ने कोल परियोजना के लिए 4 लाख से ज्यादा पेड़ों को काटने की अनुमति दी है। यह देश में सबसे बड़ी कटाई का मामला माना जा रहा है।



क्या कहती है रिपोर्ट

देश में विकास परियोजनाओं के लिए जंगलों पर बढ़ते दबाव की तस्वीर सामने आई है। पर्यावरण से जुड़ी एक रिपोर्ट के अनुसार देश में जुलाई 2023 से मई 2026 के बीच वन भूमि पर स्थित 28 लाख से अधिक पेड़ों की कटाई को मंजूरी दी गई है। यह आंकड़ा केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की विभिन्न समितियों के रिकॉर्ड में सामने आया है।



रिपोर्ट के मुताबिक पेड़ों की कटाई के लिए मंजूर कुल प्रस्तावों में से ज्यादातर खनन, जलविद्युत, ऊर्जा और पुनर्वास प्रोजेक्ट से जुड़े थे। कुल स्वीकृत कटाई का लगभग 90 फीसदी हिस्सा इन परियोजनाओं से ही संबंधित है। साथ ही वन भूमि डायवर्जन के प्रस्तावों को मंजूरी मिलने की दर 80 फीसदी से अधिक रही है।



कटाई के मामले में हसदेव अव्वल

रिपोर्ट में छत्तीसगढ़ के हसदेव अरण्य क्षेत्र का भी उल्लेख किया गया है। जहां एक कोयला खनन परियोजना के लिए चार लाख से अधिक पेड़ों की कटाई का प्रस्ताव सामने आया। यह देश में दर्ज सबसे बड़े वन कटाई मामलों में से एक माना जा रहा है। परियोजना को लेकर स्थानीय आदिवासी समुदायों और पर्यावरण संगठनों ने लंबे समय से विरोध जताया है। रिपोर्ट ने पेड़ों की कटाई के बदले पेड़ लगाने की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए हैं।



वर्तमान नियमों के तहत वन भूमि के उपयोग की अनुमति मिलने पर बदले में अन्य स्थानों पर पौधारोपण किया जाता है। पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि सैकड़ों वर्ष पुराने प्राकृतिक जंगलों की भरपाई कुछ वर्षों में लगाए गए पौधों से नहीं की जा सकती। एक प्राकृतिक वन की जैव विविधता को स्थापित होने मे सालों लग जाते हैं। रिपोर्ट में यह भी चिंता जताई गई है



कि लगाए गए पौधों के वास्तविक परिणामों और पौधों के जीवित रहने की दर को लेकर पारदर्शिता की कमी है। कई मामलों में यह स्पष्ट नहीं होता कि लगाए गए पौधे कितने समय तक जीवित रहे और क्या वे वास्तव में खोए हुए जंगलों की भरपाई कर पाए। पर्यावरणविदों का कहना है कि भारत जैसे जलवायु-संवेदनशील देश में बड़े पैमाने पर वन कटाई भविष्य में जल संकट, तापमान वृद्धि और जैव विविधता के नुकसान जैसी समस्याओं को और गंभीर बना सकती है।



निष्कर्ष : पर्यावरण पर भारी विकास

रिपोर्ट में कहा गया है कि आर्थिक विकास और औद्योगिक विस्तार की परियोजनाओं को प्राथमिकता देते हुए प्राकृतिक वनों की कीमत पर फैसले लिए जा रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि पुराने और बड़े जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं होते बल्कि वे जैव विविधता, जल संरक्षण, मिट्टी की उर्वरता और कार्बन अवशोषण जैसी महत्वपूर्ण पारिस्थितिकी सेवाएं प्रदान करते हैं। इन जंगलों के विनाश से सांसों का संकट पैदा हो जाएगा। यदि इसी तरह से पेड़ कटते रहे तो एक दिन मानवता को खतरा आ जाएगा।



FAQ

  1. पिछले तीन साल में कितने पेड़ों की कटाई को मंजूरी मिली?
    जुलाई 2023 से मई 2026 के बीच देश में 28 लाख से अधिक पेड़ों की कटाई को मंजूरी दी गई है।
  2. पेड़ों की कटाई सबसे ज्यादा किस क्षेत्र में हुई?
    छत्तीसगढ़ का हसदेव अरण्य क्षेत्र सबसे अधिक प्रभावित रहा है, जहां कोयला परियोजना के लिए चार लाख से अधिक पेड़ों की कटाई की अनुमति दी गई है।
  3. इतनी बड़ी कटाई का मुख्य कारण क्या है?
    अधिकतर पेड़ों की कटाई खनन, बिजली परियोजनाओं और औद्योगिक विकास कार्यों के लिए की गई है, जो कुल मामलों का लगभग 90 फीसदी हिस्सा है।

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