पशुपालन विभाग रिश्वतकांड: 12 साल बाद अधिकारी हाईकोर्ट से बरी, मिली थी 5 साल की सजा
News In Short
- पशुपालन विभाग के डिप्टी डायरेक्टर पर 5 हजार रिश्वत लेने का आरोप लगा।
- ट्रायल कोर्ट ने उन्हें 5 साल की सजा और जुर्माना सुनाया था।
- गवाहों ने कोर्ट में कहा कि उन्होंने रिश्वत का कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं देखा।
- 12 साल बाद हाईकोर्ट ने अधिकारी को पूरी तरह बरी कर दिया।
- हाईकोर्ट ने कहा- कि सिर्फ पैसों की बरामदगी से दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
News In Details
हाईकोर्ट ने पशुपालन विभाग में रिश्वतखोरी मामले में तत्कालीन डिप्टी डायरेक्टर को बरी कर दिया है। यह मामला बीते 12 वर्षों से चर्चा में था, जिसमें अधिकारी पर पांच हजार रूपए की रिश्वत लेने का आरोप लगा था। ट्रायल कोर्ट ने पहले उन्हें 5 साल की सश्रम कारावास और जुर्माने की सजा सुनाई थी, लेकिन हाईकोर्ट ने मामले की गहन समीक्षा के बाद फैसले को खारिज कर दिया।
ट्रायल कोर्ट का आदेश
जस्टिस रजनी दुबे की सिंगल बेंच ने ट्रायल कोर्ट के निर्णय पर सुनवाई करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष ने आरोपी के खिलाफ रिश्वत मांगने और उसे बरामद करने के आरोपों को बिना किसी स्पष्ट सबूत के साबित नहीं किया।
मामले में कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि गवाहों ने कोर्ट में स्वीकार किया कि उन्होंने शिकायतकर्ता और आरोपी के बीच कोई सीधे लेन-देन नहीं देखा। वहीं, शिकायतकर्ता ने दावा किया था कि पैसे आरोपी के हाथ में थे, लेकिन गवाहों के अनुसार नोट अपने आप में अखबार पर रखे पाए गए थे।
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि केवल पैसों की बरामदगी से किसी को दोषी ठहराना पर्याप्त नहीं है। रिश्वत के लिए मांग और स्वीकार करने का स्पष्ट प्रमाण होना जरूरी है।
मामला कैसे सामने आया?
बीजापुर जिले में पशु चिकित्सा क्षेत्र के सहायक अधिकारी गणेश राम प्रधान ने वर्ष 2014 में अपनी शादी के लिए 1.50 लाख रूपए के जीपीएफ एडवांस के लिए आवेदन किया था। प्रधान का आरोप था कि तत्कालीन डिप्टी डायरेक्टर डॉ. नारायण प्रसाद पांडेय ने इस राशि को स्वीकृत करने के एवज में 10 हजार रूपए रिश्वत मांग थी।
प्रधान ने इसकी शिकायत एंटी करप्शन ब्यूरो, जगदलपुर में की थी। इस शिकायत के आधार पर ट्रायल शुरू हुआ और अधिकारी को पांच साल की सजा सुनाई गई।
हाईकोर्ट का फैसला
उच्च न्यायालय (CG High Court) ने मामले के सभी दस्तावेज और गवाहों के बयानों की समीक्षा के बाद ट्रायल कोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि रिश्वत लेने का कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं मिला और इसलिए आरोपी को बरी किया जाता है।
इस फैसले के बाद विभाग और अधिकारी समुदाय में राहत की भावना है। वहीं, यह मामला एक बार फिर यह दिखाता है कि रिश्वत जैसे मामलों में सीधे सबूतों की अहमियत होती है।
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