हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, शादीशुदा बहन भी अनुकंपा नियुक्ति की हकदार, लेकिन...
समझें क्या है पूरा मामला...
- हाईकोर्ट ने कहा- शादीशुदा बहन भी अनुकंपा नियुक्ति की हकदार हो सकती।
- सिर्फ वैवाहिक स्थिति के आधार पर नौकरी से इनकार करना उचित नहीं।
- कोर्ट ने राज्य सरकार का 2019 का आदेश रद्द कर दिया।
- सरकार को चार सप्ताह में नए सिरे से फैसला लेने का निर्देश मिला।
- फैसले में आर्थिक निर्भरता को वैवाहिक स्थिति से अधिक महत्वपूर्ण।
जस्टिस संजय के अग्रवाल की सिंगल बेंच ने कहा है कि अविवाहित सरकारी कर्मचारी की मृत्यु के बाद उसकी शादीशुदा बहन भी अनुकंपा नियुक्ति की बराबर हकदार है। कोर्ट के मुताबिक सिर्फ वैवाहिक स्थिति और लैंगिक पूर्वाग्रह के आधार पर किसी महिला को उसके संवैधानिक अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता।
यह फैसला बिलासपुर के एक परिवार की लंबी कानूनी लड़ाई के बाद आया है। कोर्ट ने राज्य सरकार के पुराने आदेश को रद्द करते हुए नए सिरे से फैसला लेने का निर्देश दिया है।
यह फैसला अनुकंपा नियुक्ति नीति में लैंगिक समानता को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है।
क्या था पूरा मामला
नेहरू नगर, बिलासपुर निवासी दुर्गेश मिश्रा जांजगीर-चांपा में जिला लोक अभियोजन अधिकारी के पद पर पदस्थ थे। 13 जून 2018 को सेवा में रहते हुए उनका निधन हो गया। मृतक अविवाहित थे।
दुर्गेश मिश्रा के निधन के बाद उनकी वृद्ध मां तारा मिश्रा ने राज्य शासन की अनुकंपा नीति के तहत अपनी बेटी अमिता दुबे यानी मृतक की बहन को अनुकंपा नियुक्ति देने की मांग करते हुए आवेदन दिया था।
सरकार ने खारिज किया था आवेदन
राज्य सरकार के गृह एवं सामान्य प्रशासन विभाग ने 19 सितंबर 2019 को यह कहते हुए आवेदन खारिज कर दिया कि नीति में विवाहित बहन को अनुकंपा नियुक्ति देने का कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है।
इसी आदेश के खिलाफ पीड़ित परिवार ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की।
परिवार ने कोर्ट में दी यह दलील
याचिका में परिवार की तरफ से तर्क दिया गया कि सुप्रीम कोर्ट ने कुलसुम निशा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और सायरा खातून बनाम बिहार राज्य के मामलों में साफ कहा है कि केवल शादी हो जाने से किसी बेटी या बहन का अपने मूल परिवार से नाता खत्म नहीं होता।
परिवार के मुताबिक शासन की नीति में स्पष्ट उल्लेख है कि अविवाहित शासकीय सेवक के निधन पर माता-पिता की अनुशंसा पर उसके भाई-बहन को नियुक्ति दी जाएगी। उनका तर्क था कि जब विवाहित बेटे या भाई को अलग नहीं किया जाता, तो केवल शादीशुदा होने के आधार पर बहन के साथ भेद करना संविधान के अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 15(1) का उल्लंघन है।
हाईकोर्ट बोला, निर्भरता ही मुख्य मानदंड
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि अनुकंपा नियुक्ति का मुख्य मकसद परिवार के कमाऊ सदस्य की असमय मौत के बाद संकटग्रस्त परिवार को तुरंत आर्थिक राहत पहुंचाना है।
कोर्ट के मुताबिक इसमें मुख्य मानदंड निर्भरता और आर्थिक जरूरत है, न कि वैवाहिक स्थिति। कोर्ट ने कहा कि वर्तमान समाज में कई शादीशुदा बेटियां और बहनें अपने माता-पिता और परिवार का सहारा बनती हैं।
पुरानी धारणा को बताया रूढ़िवादी
हाईकोर्ट ने कहा कि शादी के बाद बेटी अपने मायके के परिवार से पूरी तरह अलग हो जाती है, यह एक पुरानी और रूढ़िवादी धारणा है। कोर्ट के मुताबिक इसे संवैधानिक समानता के सिद्धांत के तहत स्वीकार नहीं किया जा सकता।
यह टिप्पणी अनुकंपा से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण संदर्भ बन सकती है।
हाईकोर्ट ने रद्द किया सरकारी आदेश
हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए राज्य सरकार के 19 सितंबर 2019 के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें विवाहित बहन होने का हवाला देते हुए नौकरी देने से इनकार किया गया था।
साथ ही कोर्ट ने निर्देश दिया कि अनुकंपा नियुक्ति के मामले पर चार सप्ताह के भीतर नियमों के मुताबिक पुनर्विचार कर नया और सकारात्मक आदेश जारी किया जाए।
अब आगे क्या
राज्य सरकार को अब चार सप्ताह के भीतर इस मामले में नए सिरे से फैसला लेना होगा। यह फैसला अमिता दुबे और उनके परिवार के लिए राहत लेकर आया है।
आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि सरकार अपनी अनुकंपा नियुक्ति नीति में इस फैसले के मुताबिक कोई स्थायी बदलाव करती है या नहीं।
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