मंत्री और विभाग की फाइलें भी नहीं आई काम, IFS शालिनी रैना को नहीं मिला पावरफुल प्रभार
छत्तीसगढ़ के वन विभाग में इन दिनों एक प्रभार को लेकर मंत्रालय में जोरदार चर्चा है। मामला 2001 बैच की IFS अधिकारी शालिनी रैना से जुड़ा है। विभाग के वरिष्ठ अधिकारी उन्हें बजट शाखा की जिम्मेदारी देना चाहते थे। इसके लिए कई बार फाइल चलाई गई। लेकिन हर बार मामला अटक गया। अंत में विभागीय मंत्री के स्तर से भी फाइल आगे बढ़ाई गई। इसके बावजूद मुख्यमंत्री सचिवालय ने इसे मंजूरी नहीं दी। नतीजा यह हुआ कि लंबे इंतजार के बाद शालिनी रैना को केवल प्रशासन शाखा की जिम्मेदारी देकर मामला खत्म कर दिया गया।
मंत्री की फाइल भी नहीं आई काम
जानकारों के मुताबिक विभाग के भीतर बजट शाखा को सबसे प्रभावशाली जिम्मेदारी माना जाता है। इसलिए शालिनी रैना को यह प्रभार दिलाने के लिए लगातार कोशिशें होती रहीं। कई दौर की फाइल नोटिंग हुई। अधिकारियों ने तर्क भी दिए कि वे अनुभवी अधिकारी हैं और समन्वय बेहतर कर सकती हैं। जब विभागीय स्तर पर बात नहीं बनी तो फाइल मंत्री के स्तर से आगे बढ़ाई गई। उम्मीद थी कि मुख्यमंत्री कार्यालय से मंजूरी मिल जाएगी। लेकिन वहां से साफ इनकार हो गया। इसके बाद विभाग को पीछे हटना पड़ा।
कौन हैं IFS शालिनी रैना
शालिनी रैना 2001 बैच की भारतीय वन सेवा की अधिकारी हैं। वे छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ IPS अधिकारी और एडिशनल डायरेक्टर जनरल ऑफ पुलिस आनंद छाबड़ा की पत्नी भी हैं। वन विभाग में उनकी छवि एक तेज-तर्रार और सौम्य अधिकारी की मानी जाती है। विभागीय बैठकों में उनकी पकड़ और समन्वय क्षमता की चर्चा होती है। यही वजह रही कि उन्हें विभाग के भीतर कई अहम जिम्मेदारियां दी जाती रही हैं। इस बार भी विभाग चाहता था कि उन्हें बजट शाखा का प्रभार मिले।
आखिर प्रशासन से ही क्यों करना पड़ा संतोष
फाइलें अटकने के बाद अंत में उन्हें अपर प्रधान मुख्य वन संरक्षक, प्रशासन की जिम्मेदारी दे दी गई। यह पद तकनीकी रूप से महत्वपूर्ण जरूर है, लेकिन विभाग के भीतर इसे कम प्रभाव वाला माना जाता है। इस शाखा में मुख्य रूप से स्थापना संबंधी काम होते हैं। यानी अधिकारी-कर्मचारियों की ट्रांसफर-पोस्टिंग, समन्वय और मानव संसाधन से जुड़े मामले। इसके अलावा विभागीय जांच और शिकायतों के निपटारे का काम भी इसी शाखा के पास रहता है। कई वरिष्ठ अधिकारी इसे ‘बाबूगिरी’ वाला काम भी बताते हैं।
बजट शाखा क्यों मानी जाती है पावरफुल
वन विभाग में बजट शाखा को सबसे प्रभावशाली माना जाता है। हर साल विभाग को करीब 2500 से 3000 करोड़ रूपए का बजट मिलता है। इसके अलावा केंद्र सरकार से कैंपा मद के तहत लगभग 600 करोड़ रूपए आते हैं। इन पैसों से प्रदेश के वन क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर काम होते हैं। जंगलों में सड़कें बनती हैं। नालों पर स्टॉपडेम और बोल्डर चेकडेम बनाए जाते हैं। तालाबों का निर्माण होता है। करोड़ों रूपए का पौधरोपण और फेंसिंग कराई जाती है। यही नहीं, हाथी प्रबंधन से जुड़े गजराज प्रोजेक्ट जैसे कार्यक्रम भी इसी बजट से चलते हैं। इन सभी प्रोजेक्ट की फाइलों पर अंतिम मुहर बजट शाखा प्रमुख की ही लगती है।
कई योजनाओं का पैसा भी इसी से..
वन विभाग के बजट से कई बड़ी योजनाएं चलती हैं। मानव-हाथी द्वंद को रोकने के लिए विशेष प्रोजेक्ट पर पैसा खर्च होता है। प्रदेश में इको-टूरिज्म को बढ़ावा देने के लिए योजनाएं बनती हैं। हरियर छत्तीसगढ़ योजना के तहत बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण होता है। बस्तर जैसे आदिवासी बहुल इलाकों में अधोसंरचना विकास के लिए भी विशेष बजट दिया जाता है। ऐसे में बजट शाखा का नियंत्रण सीधे तौर पर करोड़ों रूपए के प्रोजेक्ट से जुड़ा होता है।
सोशल ऑडिट पर भी उठते रहे सवाल
वन विभाग की कार्यप्रणाली को लेकर पहले भी सवाल उठते रहे हैं। खासकर कैंपा मद के कामों पर सोशल ऑडिट नहीं होने को लेकर। नियमों के मुताबिक अगर राजस्व जमीन पर काम होता है तो मनरेगा की तरह सोशल ऑडिट कराना जरूरी है। इसके लिए पंचायत स्तर पर समितियां बनती हैं और योजनाओं की जानकारी सार्वजनिक की जाती है। लेकिन कई जगहों पर यह प्रक्रिया पूरी नहीं होती। बिना सोशल ऑडिट के ही काम होने के आरोप लगते रहे हैं।
खुद CM भी जता चुके हैं नाराजगी
सूत्र बताते हैं कि इसी तरह के मामलों को लेकर मुख्यमंत्री पहले भी नाराजगी जता चुके हैं। विभाग को पारदर्शिता बढ़ाने के निर्देश दिए गए हैं। ऐसे माहौल में बजट शाखा को लेकर ज्यादा सतर्कता बरती जा रही है। शायद यही वजह रही कि इस बार बजट शाखा के प्रभार को लेकर चली फाइलों पर मुख्यमंत्री कार्यालय ने वीटो लगा दिया। अब मंत्रालय में चर्चा यही है कि आखिर किस वजह से इस एक प्रभार के लिए इतनी कोशिशें हुईं और फिर भी मंजूरी नहीं मिल पाई।
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