छत्तीसगढ़ सरकार ने खदानों के लिए दे दी सवा 2 लाख पेड़ों की बलि, हसदेव के 1 लाख पेड़ों पर चली उद्योगपतियों की आरी
Arun Tiwari | Mar 10, 2026, 17:07 IST
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छत्तीसगढ़ में उद्योंगों और खनन के लिए हरे भरे पेड़ों की बलि दी जा रही है। ये पेड़ खदानों की भेंट चढ़ रहे हैं। बिजली के लिए कोयला निकालने की होड़ में पेड़ों पर बेरहमी से आरी चलाई जा रही है। द सूत्र ने पेड़ कटने की पड़ताल की।
NEWS IN SHORT
- साल 2022 से 2026 तक पेड़ कटने का आंकड़ा
- सरकार ने 2 लाख 33 हजार 237 पेड़ काटने की अनुमति दी
- अब तक काटे गए पेड़ 1 लाख 95 हजार 292
- हसदेव से कटे 1 लाख पेड़
- पेड़ काटने के एवज में पेड़ लगाने का प्रावधान नहीं
NEWS IN DETAIL
छत्तीसगढ़ में 4 साल में 2 लाख पेड़ कटे :
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक पिछले चार सालों में करीब दो लाख पेड़ काटे जा चुके हैं। इससे भी अधिक पेड़ों को काटने की अनुमति दी जा चुकी है।
इस मामले में की गई द सूत्र की पड़ताल में सामने आया है कि साल 2022 से जनवरी 2026 तक सरकार ने 2 लाख 33 हजार 237 पेड़ काटने की अनुमति दी। इनमें से अब तक 1 लाख 95 हजार 292 पेड़ काटे गए।
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हसदेव अरण्य में सबसे ज्यादा पेड़ों की कटाई :
छत्तीसगढ़ की इन कोयला खदानों से महाराष्ट्र और राजस्थान की बिजली कंपनियों के लिए कोयला निकाला जा रहा है। इन खदानों में अडानी समूह माइन डेवलपर एंड ऑपरेटर (एमडीओ) के रूप में काम कर रहा है। यानी खदानों के विकास और संचालन की जिम्मेदारी इसी कंपनी के पास है।
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इन जिलों में इतने कटे पेड़ :
रायगढ़ - 51851, अनुमति - 69525
दंतेवाड़ा - 15481, अनुमति - 21699
बीजापुर - 341
कांकेर - 9952, अनुमति - 21297
नारायणपुर - 17836, अनुमति - 20491
रायपुर -128
सरगुजा - 73888, अनुमति - 73941
सूरजपुर - 6695
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इन कंपनियों ने काटे पेड़ :
एनटीपीसी
बीएस स्पंज प्रा.लि.
जिंदल स्टील एंड पॉवर
महाराष्ट्र स्टेट पॉवर जनरेशन कंपनी,एमडीओ अडानी कंपनी
रावघाट लौह अयस्क परियोजना
टेक्सटाइल पार्क
राजस्थान के लिए कोल ब्लॉक, एमडीओ अडानी कंपनी
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सरकार का तर्क :
हालांकि पर्यावरण से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि बड़े पैमाने पर हो रही इस कटाई से पर्यावरण संतुलन पर असर पड़ सकता है। जंगलों की संख्या कम होने से वन्यजीवों के आवास, जल स्रोतों और स्थानीय जलवायु पर भी प्रभाव पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
हसदेव बचाने के लिए काम करने वाले आलोक शुक्ला का कहना है कि सरकार की यह बहुत कम संख्या बता रही है। इससे दोगुने पेड़ काटे जा चुके हैं। आदिवासियों के विरोध के बाद भी सरकार उद्योगपतियों के आगे नतमस्तक है।
निष्कर्ष :
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