तीन आईपीएस अफसरों का डिमोशन; सात साल की लड़ाई, एक साल का दाग… आखिर इज्जत जीत गई
सरकारी फाइलों में लिखा एक आदेश कभी-कभी किसी अफसर की पूरी जिंदगी पर भारी पड़ जाता है। छत्तीसगढ़ में तीन वरिष्ठ आईपीएस अफसर आरके विज, संजय पिल्लै और मुकेश गुप्ता की कहानी कुछ ऐसी ही है, जहां सात साल पहले कैबिनेट मीटिंग के एक निर्णय के तहत किए गए डिमोशन ने उनकी पूरी सर्विस पर सवालिया निशान खड़ा कर दिया था। लेकिन सात साल लंबी जद्दोजहद के बाद अब ये अफसर कह सकते हैं-हम हारकर नहीं, अपनी प्रतिष्ठा बचाकर रिटायर हुए हैं।
साख पर सवाल
करीब आठ साल पहले की बात है। तब इन तीनों अफसरों को एडीजी से प्रमोट कर डीजी बनाया गया था। यह उनके करियर का स्वाभाविक और सम्मानजनक पड़ाव था। लेकिन सत्ता क्या बदली, इनके लिए सब कुछ बदल गया। नई कांग्रेस सरकार ने एक झटके में इन तीनों को फिर से एडीजी बना दिया। सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि इस डिमोशन के पीछे कोई ठोस कारण सामने नहीं आया। न कोई अनुशासनहीनता, न कोई जांच, न कोई आरोप। बस एक प्रशासनिक फैसला, जिसने तीन अफसरों की वर्षों की कमाई साख पर सवाल खड़े कर दिए।
सीएम के साथ तल्खी बनी डिमोशन का कारण
अंदरखाने की कहानी कुछ और ही इशारा करती रही। उस समय आईपीएस मुकेश गुप्ता और तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के बीच रिश्ते बेहद तल्ख बताए जाते थे। माना गया कि इस टकराव की आंच सिर्फ मुकेश गुप्ता तक सीमित नहीं रही, बल्कि IPS आरके विज और संजय पिल्लै भी इसकी चपेट में आ गए। मुकेश गुप्ता ने इस फैसले को चुपचाप स्वीकार नहीं किया। उन्होंने इसे न्यायालय की चौखट तक पहुंचाया। पहले कैट और फिर सुप्रीम कोर्ट।
केंद्र सरकार ने भी इस मामले में दखल देते हुए डिमोशन के महज तीन महीने बाद ही साफ कर दिया कि यह फैसला उचित नहीं है और प्रमोशन बहाल होना चाहिए। लेकिन राज्य सरकार ने इस आदेश को फाइलों में ही दबाए रखा। एक-दो महीने नहीं, पूरे एक साल तक। इस दौरान तीनों अफसर एक अजीब स्थिति में रहे। न तो पूरी तरह डीजी और न ही सामान्य एडीजी। सबसे बड़ा संकट पद का नहीं, बल्कि प्रतिष्ठा का था।
महाधिवक्ता की राय
आखिरकार जब मामला ज्यादा तूल पकड़ने लगा, तो उस समय की राज्य सरकार ने महाधिवक्ता से राय ली। यहां भी सरकार को झटका लगा। महाधिवक्ता ने साफ कहा कि यह डिमोशन संविधान के खिलाफ है और इसे तुरंत सुधारा जाना चाहिए। इसके बाद आरके विज और IPS संजय पिल्लैको दोबारा डीजी बना दिया गया। हालांकि मुकेश गुप्ता उस समय सस्पेंड थे, इसलिए उन्हें तत्काल राहत नहीं मिली। बाद में उनकी भी डीजी के रूप में बहाली हो गई।
कितनी अहम थी प्रतिष्ठा
लेकिन सवाल यही था जो एक साल गुजर गया, उसका क्या? वह एक साल, जब बिना किसी गलती के उन्हें कमतर पद पर दिखाया गया। जब हर मुलाकात, हर मीटिंग में उन्हें अपने ही पद के बारे में सफाई देनी पड़ी। जब उनके जूनियर्स तक सवाल पूछने लगे। अब, जब तीनों अफसर रिटायर हो चुके हैं तो नई सरकार ने कैबिनेट में बड़ा फैसला लेते हुए उस विवादित एक साल को ही खत्म कर दिया है। यानी रिकॉर्ड से वह डिमोशन का कालखंड मिटा दिया गया है। जैसे वह कभी था ही नहीं।
अफसर बोले- आखिर हम जीते
तीनों अफसरों की प्रतिक्रिया में राहत के साथ एक गहरी टीस भी झलकती है। उनका कहना है-हमने पूरी सेवा ईमानदारी से की। हमारे खिलाफ कोई आरोप नहीं था। फिर भी हमें डिमोट कर दिया गया। यह सिर्फ पद का नहीं, हमारी छवि का सवाल था। लोगों को जवाब देते-देते हम थक गए थे। वे आगे कहते हैं। अब हमें न पैसे चाहिए, न कोई सुविधा। रिटायरमेंट के बाद इनका कोई मतलब नहीं होता। हम सिर्फ अपनी इज्जत, अपनी प्रतिष्ठा के लिए लड़ रहे थे… और आज लगता है कि हम उस लड़ाई में जीत गए।
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