झीरम कांड वाले नक्सली सरेंडर फिर भी बरकरार सवाल, 13 साल पहले हुए नरसंहार का असली मास्टरमाइंड कौन
Raipur. छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद के खात्मे के दावे के बीच एक बार फिर 25 मई 2013 के झीरम घाटी नरसंहार की चर्चा तेज हो गई है। 31 मार्च 2026 तक कई बड़े नक्सली या तो मारे जा चुके हैं या उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया है। इनमें वे चेहरे भी शामिल हैं, जिनका नाम झीरम हमले की साजिश से जोड़ा जाता रहा है। इसके बावजूद आज तक यह साफ नहीं हो पाया कि आखिर इस हमले का असली मास्टरमाइंड कौन था। कांग्रेस कहती है कि जब झीरम हमले को अंजाम देने वाले नक्सली नेता सरेंडर कर चुके हैं तो यह सच बाहर आना चाहिए।
झीरम में कांग्रेस के बड़े नेताओं की हत्या:
झीरम घाटी हमला छत्तीसगढ़ ही नहीं, देश के सबसे बड़े राजनीतिक नरसंहारों में गिना जाता है। कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा पर हुए इस हमले में प्रदेश कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, उनके पुत्र दिनेश पटेल, वरिष्ठ नेता महेंद्र कर्मा, पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल समेत 32 लोगों की हत्या कर दी गई थी। इस घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया था।
13 साल से सच दफन:
घटना के 13 साल बाद भी सबसे बड़ा सवाल यही बना हुआ है कि हमले की पूरी साजिश किसने रची थी और किन लोगों ने इसे राजनीतिक स्तर पर अंजाम तक पहुंचाया। सुरक्षा एजेंसियों ने कई नक्सलियों को गिरफ्तार किया, कई मुठभेड़ों में ढेर हुए और कुछ ने आत्मसमर्पण भी किया, लेकिन जांच अब तक निर्णायक नतीजे तक नहीं पहुंच सकी। बताया जाता है कि झीरम हमले की ग्राउंड प्लानिंग में शामिल कई बड़े नक्सली अब या तो मारे जा चुके हैं या पुलिस की पकड़ में हैं। इनमें वे कमांडर भी शामिल बताए जाते हैं, जिन्होंने हमले के दौरान घात लगाकर फायरिंग और विस्फोट की रणनीति बनाई थी। बावजूद इसके, जांच एजेंसियां अब तक उस व्यक्ति या समूह का नाम स्पष्ट नहीं कर पाई हैं, जिसने पूरी कार्रवाई का मास्टर प्लान तैयार किया।
आज भी हमले के निशान:
घटनास्थल पर आज भी हमले के निशान दिखाई देते हैं। जिस जगह कांग्रेस नेताओं के काफिले पर हमला हुआ था, वहां अब भी क्षतिग्रस्त वाहन और मलबे के अवशेष मौजूद हैं। स्थानीय लोग बताते हैं कि उस दिन घाटी गोलियों और धमाकों से दहल उठी थी। कई घंटों तक चली इस खूनी वारदात ने पूरे देश का ध्यान बस्तर की ओर खींच लिया था।
झीरम को लेकर कई सवाल:
झीरम हमले को लेकर समय-समय पर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप भी होते रहे हैं। कांग्रेस लगातार मामले की गहराई से जांच और साजिशकर्ताओं की पहचान की मांग उठाती रही है। वहीं बीजेपी का कहना है कि नक्सलवाद के खिलाफ सबसे सख्त कार्रवाई वर्तमान दौर में हुई है और लगातार अभियान चलाकर संगठन को कमजोर किया गया है। 2023 के बाद प्रदेश में सत्ता परिवर्तन होने के बाद नक्सल विरोधी अभियान और तेज हुआ। सुरक्षा बलों ने बस्तर के अंदरूनी इलाकों में बड़े ऑपरेशन चलाए, जिनमें कई इनामी नक्सली मारे गए। कई शीर्ष कैडर के आत्मसमर्पण करने के बाद यह उम्मीद जगी थी कि झीरम हमले से जुड़े कई राज सामने आएंगे, लेकिन ऐसा अब तक नहीं हो पाया।
जांच एजेंसियों के सामने चुनौती:
सूत्रों के मुताबिक, जांच एजेंसियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह रही कि हमले में शामिल नक्सली अलग-अलग जोन और कमेटियों से जुड़े थे। कई अहम लोग मारे गए, जबकि कुछ ने पूछताछ में सीमित जानकारी ही दी। यही वजह है कि केस अब भी रहस्य और सवालों में उलझा हुआ है।
झीरम कांड की बरसी पर हर साल राजनीतिक दल अपने-अपने तरीके से श्रद्धांजलि देते हैं, लेकिन पीड़ित परिवारों और आम लोगों के मन में अब भी एक ही सवाल कायम है। जब हमले को अंजाम देने वाले कई नक्सली या तो खत्म हो चुके हैं या सरेंडर कर चुके हैं, तो फिर असली साजिश का पर्दाफाश क्यों नहीं हुआ?
निष्कर्ष:
13 साल बाद भी झीरम घाटी (jheeram ghati) सिर्फ एक नरसंहार नहीं, बल्कि एक ऐसा राजनीतिक और सुरक्षा रहस्य बनकर खड़ी है, जिसका पूरा सच अब तक सामने नहीं आ सका है।
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