सरेंडर से धुल गए झीरम कांड के गुनाह, मास्टर माइंड देवजी से सवाल ही नहीं
RAIPUR : झीरम कांड के फैसले के बाद कई सवाल खड़े हो रहे हैं। सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या सरेंडर करने वाले मास्टरमाइंड के सारे गुनाह माफ हो गए। कांग्रेस की एक पूरी पीढ़ी को खत्म करने साजिश का सूत्रधार देवजी से पूछताछ तक नहीं हुई। जबकि वो सरेंडर कर चुका था। ये सारे सवाल कांग्रेस ने भी उठाए हैं।
भूपेश बघेल ने कहा कि एफआईआर से नक्सलियों के शीर्ष नेताओं के नाम हटा दिए गए। बघेल ने कहा कि जांच में लापरवाही बरत रही एनआईए ने 39 को आरोपी बनाया 10 से ज्यादा लोगों को पकड़ ही नहीं पाई।
फैसले पर सुलगते सवाल:
छत्तीसगढ़ के बस्तर की झीरम घाटी में गोलियों की आवाज ने प्रदेश की राजनीति का चेहरा बदल दिया था। कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा पर घात लगाकर किए गए नक्सली हमले में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल, महेंद्र कर्मा और कई अन्य नेताओं समेत 29 लोगों की जान चली गई थी।
13 साल बाद अब इस मामले में अदालत ने 10 आरोपियों को दोषी करार दिया है। लेकिन फैसले के साथ ही कई पुराने सवाल फिर सामने आ गए हैं। जगदलपुर की विशेष एनआईए अदालत ने दो महिलाओं समेत सभी 10 आरोपियों को दोषी माना है। अदालत ने 29 लोगों की हत्या और 15 अन्य की हत्या के प्रयास के आरोपों में उन्हें दोषी पाया।
सजा की अवधि पर फैसला 16 सितंबर को होगा। सुनवाई के दौरान 101 गवाहों के बयान दर्ज किए गए। बचाव पक्ष ने फैसले को ऊपरी अदालत में चुनौती देने की बात कही है।
हमला इतना बड़ा था कि कांग्रेस की पूरी लीडरशिप खत्म हुई:
25 मई 2013 को कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा बस्तर से गुजर रही थी। दरभा थाना क्षेत्र की झीरम घाटी में माओवादियों ने काफिले को निशाना बनाया।
पहले बारूदी सुरंग का इस्तेमाल हुआ और उसके बाद लंबे समय तक गोलीबारी चली। हमले में कांग्रेस के शीर्ष नेताओं के साथ सुरक्षाकर्मी और अन्य लोग भी मारे गए। 30 से ज्यादा लोग घायल हुए थे।
महेंद्र कर्मा को नक्सली संगठन अपना प्रमुख दुश्मन मानता था। वे सलवा जुडूम से जुड़े रहे थे। नंदकुमार पटेल उस समय प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष थे, जबकि विद्याचरण शुक्ल राष्ट्रीय राजनीति का बड़ा चेहरा थे। एक ही हमले में इन नेताओं की हत्या ने छत्तीसगढ़ की राजनीति में गहरा खालीपन पैदा कर दिया।
सरेंडर के बाद देवजी की जिंदगी का दूसरा चेहरा:
इस पूरे मामले में आरोपी रहे देवजी की कहानी भी अलग है। सरेंडर के बाद जब वह जेल पहुंचा तो उसने पढ़ाई जारी रखी। उसने 12वीं की परीक्षा दी।
यानी जिस व्यक्ति पर प्रदेश के सबसे बड़े राजनीतिक नरसंहार से जुड़े होने का आरोप था, वह जेल की चारदीवारी में किताबों के साथ अपना भविष्य बनाने की कोशिश करता रहा।देवजी का यह पहलू झीरम मामले की जटिलता को सामने लाता है।
एक तरफ एक ऐसा हमला था जिसने दर्जनों परिवारों को हमेशा के लिए बदल दिया, दूसरी तरफ उन्हीं आरोपियों में से कुछ की जिंदगी जेल में बिल्कुल अलग दिशा में आगे बढ़ती रही। उनसे पूछताछ तक नहीं हुई।
10 दोषी हुए, लेकिन कहानी अभी पूरी नहीं:
एनआईए ने इस मामले में कुल 39 लोगों को आरोपी बनाया था। हालांकि मुकदमा 11 आरोपियों के खिलाफ चला और इनमें से एक की सुनवाई के दौरान मौत हो गई।
अब अदालत ने बाकी 10 को दोषी माना है। लेकिन रिपोर्टों के मुताबिक 28 आरोपी अभी भी वांछित हैं।यही वजह है कि अदालत का फैसला आने के बावजूद झीरम की पूरी कहानी का एक बड़ा हिस्सा अब भी अधूरा माना जा रहा है।
सवाल सिर्फ यह नहीं है कि हमले में शामिल कौन लोग थे, बल्कि यह भी है कि इतने बड़े हमले की योजना किस स्तर पर बनी और इसके पीछे बैठे मुख्य लोगों तक जांच क्यों नहीं पहुंच सकी।
मास्टरमाइंड का सवाल अब भी कायम:
झीरम हमले को लेकर वर्षों से सबसे बड़ा सवाल इसकी व्यापक साजिश और मास्टरमाइंड को लेकर रहा है। अदालत ने जिन 10 आरोपियों को दोषी माना है, उससे हमले में उनकी भूमिका पर न्यायिक निष्कर्ष सामने आया है, लेकिन इससे यह सवाल खत्म नहीं होता कि हमले की पूरी योजना बनाने वाले लोग कौन थे।
इसी वजह से फैसले के बाद राजनीतिक प्रतिक्रियाओं में भी इसे लेकर सवाल उठे हैं। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने इसे अधूरा न्याय बताया और राजनीतिक साजिश की दिशा में जांच नहीं होने पर सवाल उठाए। दूसरी ओर भाजपा ने फैसले का स्वागत करते हुए इसे जांच की पुष्टि बताया।
13 साल बाद मिला फैसला, लेकिन परिवारों के सवाल बाकी:
झीरम के पीड़ित परिवारों के लिए यह फैसला 13 साल के लंबे इंतजार के बाद आया है। अदालत ने 10 आरोपियों को दोषी माना है, लेकिन 28 लोगों का अब भी फरार होना और हमले की पूरी साजिश से जुड़े सवालों का बाकी रहना बताता है कि न्याय की यह कहानी अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है।
झीरम सिर्फ एक आतंकी या नक्सली हमला नहीं था। यह छत्तीसगढ़ की राजनीति पर हुआ ऐसा वार था, जिसकी चोट 13 साल बाद भी महसूस की जाती है।अदालत का फैसला एक पड़ाव जरूर है, लेकिन उन सवालों के जवाब अभी बाकी हैं जो इस हमले के साथ ही पैदा हुए थे।
FAQ
- झीरम घाटी कांड कब और कहाँ हुआ था?
25 मई 2013 को छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले के दरभा थाना क्षेत्र स्थित झीरम घाटी में नक्सलियों ने कांग्रेस की 'परिवर्तन यात्रा' के काफिले पर हमला किया था. - झीरम घाटी नक्सली हमले में कौन-कौन से प्रमुख नेता मारे गए थे?
हमले में तत्कालीन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल, सलवा जुडूम के प्रमुख महेंद्र कर्मा और पूर्व विधायक उदय मुदलियार समेत कुल 29 लोग मारे गए थे.
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