झीरम घाटी के हमले में खत्म हो गई कांग्रेस की पूरी पीढ़ी, पूरे सच का इंतजार बाकी

Arun Tiwari | Sept 04, 2026, 14:43 IST
झीरम घाटी का हमला
25 मई 2013 का झीरम घाटी नक्सली हमला छत्तीसगढ़ के राजनीतिक इतिहास की सबसे भयावह घटनाओं में से एक है। कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा पर हुए इस हमले में नंदकुमार पटेल, महेंद्र कर्मा, उदय मुदलियार समेत कई बड़े नेताओं और सुरक्षाकर्मियों की मौत हुई थी।

छत्तीसगढ़ के राजनीतिक इतिहास में 25 मई 2013 की तारीख शायद ही कभी भुलाई जा सकेगी। बस्तर की झीरम घाटी में उस दिन सिर्फ गोलियां नहीं चली थीं, बल्कि प्रदेश की एक पूरी राजनीतिक पीढ़ी को खत्म कर दिया गया था।



कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा से लौट रहे काफिले पर माओवादियों ने घात लगाकर हमला किया। देखते ही देखते सड़क पर लाशें बिछ गईं और छत्तीसगढ़ ने अपने कई बड़े नेताओं को खो दिया। इस हमले में तत्कालीन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, उनके बेटे दिनेश पटेल, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व नेता प्रतिपक्ष महेंद्र कर्मा, पूर्व विधायक उदय मुदलियार और पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल जैसे दिग्गज नेता मारे गए।



विद्याचरण शुक्ल गंभीर रूप से घायल हुए थे और इलाज के दौरान 11 जून 2013 को उनका निधन हुआ। इसके अलावा कांग्रेस नेता योगेंद्र शर्मा समेत कई कार्यकर्ता और नेताओं के सुरक्षा में तैनात जवान भी इस हमले में मारे गए। यह घटना एक बार फिर लोगों के सामने ताजा हो गई है। 5 सितंबर को एनआईए की विशेष कोर्ट घटना के 13 साल बाद अपना फैसला सुनाने जा रही है।



25 मई की वह दोपहर, जब घाटी गोलियों से गूंज उठी:

कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा सुकमा से लौट रही थी। काफिले में कांग्रेस के प्रदेश के कई बड़े नेता मौजूद थे। झीरम घाटी के पास पहुंचते ही अचानक गोलीबारी शुरू हो गई। पहले किसी को समझ नहीं आया कि हमला किस तरफ से हो रहा है। इसके बाद पहाड़ियों से लगातार फायरिंग होने लगी। काफिले में अफरा-तफरी मच गई।



कुछ ही देर में सड़क पर गाड़ियां रुक गईं और नेता और कार्यकर्ता जान बचाने के लिए इधर-उधर भागने लगे। लेकिन चारों तरफ से घिरे इस काफिले के पास बच निकलने का रास्ता नहीं था। कांग्रेस नेता आज भी उस दिन को याद करते हैं तो उनकी आवाज में उस घटना का दर्द साफ सुनाई देता है।



महेंद्र कर्मा को सरेंडर करो :

हमलावरों का एक प्रमुख निशाना महेंद्र कर्मा थे। कर्मा को बस्तर में बस्तर टाइगर के नाम से जाना जाता था। सलवा जुडूम के नेतृत्व की वजह से माओवादी उन्हें अपना बड़ा दुश्मन मानते थे। झीरम हमले में नक्सलियों ने उन्हें पहचानने के बाद अपने कब्जे में ले लिया। काफिले में मौजूद लोगों से कर्मा के बारे में पूछा गया। कर्मा खुद सामने आए।



इसके बाद उन्हें बाकी लोगों से अलग ले जाया गया। हमले के बाद उनके शव पर बड़ी संख्या में गोली और धारदार हथियार के निशान मिले। हत्या के बाद नक्सलियों ने शव के साथ भी बर्बरता की। महेंद्र कर्मा की हत्या झीरम हमले की सबसे भयावह घटनाओं में गिनी जाती है।



नंदकुमार पटेल को भी नहीं छोड़ा :

हमले में कांग्रेस के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार पटेल भी निशाने पर थे। उनके साथ उनके बेटे दिनेश पटेल भी थे। हमले के दौरान नक्सलियों ने नंदकुमार पटेल की पहचान पूछी। इसके बाद उन्हें और उनके बेटे को अपने साथ ले जाने की बात सामने आई।



अगले दिन दोनों के शव बरामद हुए। नंदकुमार पटेल उस समय कांग्रेस के सबसे महत्वपूर्ण नेताओं में से एक थे। विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले उनकी हत्या ने प्रदेश कांग्रेस को गहरा झटका दिया।



यह हमला इसलिए भी असाधारण था क्योंकि एक ही घटना में कांग्रेस ने प्रदेश अध्यक्ष, पूर्व नेता प्रतिपक्ष, पूर्व केंद्रीय मंत्री और कई अन्य वरिष्ठ नेताओं को खो दिया।



उदय मुदलियार के आखिरी दो कदम :

कांग्रेस नेता उदय मुदलियार भी उस दिन हमले में गंभीर रूप से घायल हुए थे। हमले के बाद गाड़ियों के पास पहुंचे तो उदय मुदलियार गाड़ी में बैठे मिले। उन्हें बाहर आने के लिए कहा। मुदलियार किसी तरह गाड़ी से बाहर आए।



लेकिन दो कदम चलने के बाद जमीन पर गिर पड़े।फिर वह कभी नहीं उठे। आज 13 साल बाद भी उस पल को याद करने वाले लोगों के लिए उदय मुदलियार के वे दो कदम झीरम की त्रासदी की सबसे दर्दनाक तस्वीरों में से एक हैं।



पानी-पानी कह रहे थे विद्याचरण शुक्ल :

देश की राजनीति के बड़े नामों में शामिल विद्याचरण शुक्ल भी झीरम हमले में गंभीर रूप से घायल हुए थे। पूर्व केंद्रीय मंत्री और लंबे समय तक राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय रहे शुक्ल को कई गोलियां लगी थीं। हमले के बाद उन्हें इलाज के लिए अस्पताल ले जाया गया। हालत गंभीर होने के कारण उन्हें बाद में दिल्ली के मेदांता अस्पताल ले जाया गया।



करीब दो सप्ताह तक जिंदगी और मौत से जूझने के बाद 11 जून 2013 को उनका निधन हो गया। झीरम के नक्सली हमले ने इस तरह कांग्रेस से सिर्फ एक नेता नहीं छीना, बल्कि प्रदेश और राष्ट्रीय राजनीति में लंबे समय तक प्रभाव रखने वाले एक पूरे दौर को खत्म कर दिया।



13 साल बाद भी झीरम का सवाल खत्म नहीं हुआ

झीरम हमले को 13 साल बीत चुके हैं। बस्तर में हालात काफी बदले हैं। सरकार नक्सलवाद के खात्मे का दावा कर रही है। लेकिन झीरम की जांच और इस हमले के पीछे की पूरी साजिश को लेकर सवाल आज भी राजनीतिक बहस का हिस्सा हैं। जिन परिवारों ने अपने लोगों को खोया, उनके लिए झीरम कोई राजनीतिक मुद्दा नहीं है।



उनके लिए यह उस दिन की याद है जब फोन की एक घंटी ने जिंदगी बदल दी थी। किसी घर में बेटा नहीं लौटा, किसी घर में पिता, किसी घर में पति और किसी परिवार ने अपना पूरा राजनीतिक सहारा खो दिया।



झीरम के 13 साल बाद भी सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इस नरसंहार की पूरी सच्चाई कभी सामने आएगी। क्योंकि 13 साल बाद भी झीरम की घाटी में गोलियों की गूंज भले सुनाई न देती हो, लेकिन उस दिन अपनों को खोने वालों के दिल में वह आवाज आज भी बाकी है।



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