केशकाल बायपास में 100 मीटर की गलती और 14 हजार पेड़ों का कत्लेआम, कौन लेगा इस तबाही की जिम्मेदारी?

VINAY VERMA | May 12, 2026, 17:47 IST
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बस्तर में केशकाल बायपास परियोजना के तहत 8,159 पेड़ काटे गए थे, लेकिन अब यह सामने आया है कि गलती से 100 मीटर का गलत सर्वे किया गया था। इससे परियोजना की लागत 120 करोड़ से बढ़कर 308 करोड़ रुपये हो गई।

बस्तर की लाइफलाइन मानी जाने वाली राष्ट्रीय राजमार्ग-30 पर बन रहे केशकाल बायपास में ऐसा खेल हुआ है, जिसने सरकारी सिस्टम की कार्यशैली पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। सड़क अभी बनी नहीं, लेकिन जंगल पहले ही उजाड़ दिया गया। गलत अलाइनमेंट, विभागीय तालमेल की कमी और अफसरों की लापरवाही के चलते 5 किलोमीटर क्षेत्र में 8,159 हरे-भरे पेड़ काट दिए गए। अब खुलासा हुआ है कि जिस जगह पेड़ काटे गए, वहां सड़क ही नहीं बनेगी। यानी जंगल काटो, करोड़ों खर्च करो और फिर नई जगह दोबारा कटाई करो।



100 मीटर की गलती ने उजाड़ दिया जंगल

पूरा मामला कोंडागांव जिले के केशकाल बायपास परियोजना से जुड़ा है। 11.38 किलोमीटर लंबे इस बायपास को बस्तर के आर्थिक कॉरिडोर के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। लेकिन सड़क निर्माण शुरू होने से पहले ही ऐसा सर्वे कांड सामने आया है, जिसने पूरे प्रोजेक्ट को कटघरे में खड़ा कर दिया। जानकारी के मुताबिक, जिस अलाइनमेंट पर पेड़ों की कटाई की गई, वह असली मार्ग से करीब 100 मीटर अलग निकला। यानी विभागों ने पहले जंगल साफ करवा दिया और बाद में पता चला कि सड़क तो दूसरी तरफ बननी है।



5 किलोमीटर क्षेत्र में 8,159 पेड़ों की कटाई


गलत अलाइनमेंट पर ₹2.75 करोड़ का भुगतान


दो विभागों की चूक से हुआ पर्यावरणीय नुकसान


14 हजार से ज्यादा पेड़ों का नुकसान


120 करोड़ से बढ़कर 308 करोड़ पहुंची लागत



सड़क नहीं बनी…जंगल जरूर साफ हो गया

सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब अलाइनमेंट गलत था तो पेड़ों की कटाई की अनुमति कैसे मिली? वन विभाग ने मार्किंग कैसे की? और एनएच विभाग ने बिना अंतिम सत्यापन के करोड़ों का भुगतान कैसे कर दिया? सूत्रों के मुताबिक, मार्च में राष्ट्रीय राजमार्ग विभाग ने वन विभाग को इस गड़बड़ी की जानकारी दी। इसके बाद मामला खुला। लेकिन तब तक हजारों पेड़ काटे जा चुके थे। अब नए सर्वे में पता चला है कि 11.38 किलोमीटर में से करीब 5 से 6 किलोमीटर हिस्सा पूरी तरह गलत सर्वे पर आधारित था।



अब फिर कटेंगे 6 हजार पेड़!

सरकारी लापरवाही का सबसे खतरनाक हिस्सा अब सामने आ रहा है। क्योंकि सड़क बनाने के लिए अब सही अलाइनमेंट पर दोबारा पेड़ों की कटाई करनी पड़ेगी। यानी पहले 8 हजार पेड़ काटे गए, अब 6 हजार से ज्यादा और पेड़ काटने की तैयारी है।इसका मतलब साफ है कि एक गलत सर्वे और विभागीय लापरवाही के कारण बस्तर में 14 हजार से ज्यादा पेड़ खत्म हो जाएंगे। यह सिर्फ पर्यावरणीय नुकसान नहीं, बल्कि सरकारी सिस्टम की विफलता का बड़ा उदाहरण बन चुका है।



10 साल से लटका है बायपास

यह परियोजना कोई नई नहीं है। वर्ष 2016-17 में केंद्र सरकार ने केशकाल बायपास के लिए 120 करोड़ रुपये मंजूर किए थे। मुंबई की एक कंपनी को ठेका मिला और काम शुरू भी हुआ, लेकिन कुछ ही महीनों में प्रोजेक्ट बंद हो गया।इसके बाद लगभग एक दशक तक फाइलें घूमती रहीं। फिर वर्ष 2025 में इस परियोजना को दोबारा मंजूरी मिली और लागत बढ़कर 308 करोड़ रुपये पहुंच गई। दुर्ग के ठेकेदार को काम सौंपा गया, लेकिन चार महीने बाद भी वर्क ऑर्डर जारी नहीं हुआ।



अफसरों की चूक या मिलीभगत?

अब सवाल सिर्फ गलती का नहीं, जवाबदेही का भी है। आखिर बिना फाइनल सर्वे के पेड़ों की कटाई क्यों हुई? किस आधार पर 2.75 करोड़ का भुगतान किया गया? और जब गलती सामने आ गई तो जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई? वन विभाग और एनएच विभाग दोनों अब जांच की बात कर रहे हैं, लेकिन स्थानीय स्तर पर इसे लीपापोती माना जा रहा है। आरोप है कि विभाग एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालकर मामला दबाने की कोशिश कर रहे हैं।



डीएफओ ने मानी गलती

केशकाल की डीएफओ दिव्या गौतम ने भी माना है कि अलाइनमेंट से हटकर पेड़ों की कटाई हुई है। उन्होंने बताया कि जांच टीम गठित कर दी गई है और मौके पर दोबारा सर्वे व मार्किंग की जा रही है। वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग के उप सचिव डी.आर. सोंटापर ने पीसीसीएफ को पत्र लिखकर विस्तृत जांच और दोषियों पर सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए हैं। लेकिन बड़ा सवाल यही है कि क्या इस बार भी जांच फाइलों में दब जाएगी?



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निष्कर्ष

बस्तर के जंगल सिर्फ पेड़ नहीं, वहां की पहचान हैं। लेकिन सरकारी लापरवाही ने विकास के नाम पर हजारों पेड़ों की बलि ले ली। विडंबना यह है कि एक तरफ सरकार पर्यावरण संरक्षण और हरियाली की बातें करती है, दूसरी तरफ गलत सर्वे के कारण जंगल साफ कर दिए जाते हैं।



केशकाल बायपास अब सिर्फ सड़क परियोजना नहीं, बल्कि सरकारी सिस्टम की लापरवाही का प्रतीक बन चुका है। सड़क अभी तक जमीन पर नहीं उतरी, लेकिन जंगल का बड़ा हिस्सा हमेशा के लिए खत्म हो गया। सवाल अब यही है कि इस ग्रीन स्कैम की असली जिम्मेदारी कौन लेगा?



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