25 साल तक भर्ती नहीं, अब मेडिको लीगल संस्थान बंद करने की तैयारी, FSL में मर्ज का खेल
News in short:
- 25 साल में एक भी भर्ती क्यों नहीं?
- 5 अधिकारियों में अब केवल 2 बचे
- 1 एक्सपर्ट जून में हो जाएंग रिटायर
- पहले से FSL में मर्ज की हो रही थी तैयारी?
News in detail:
25 पद स्वीकृत, लेकिन भर्ती शून्य:
राज्य गठन के बाद मध्य प्रदेश से पांच कर्मचारियों की टीम छत्तीसगढ़ आई थी। इनमें तीन मेडिकल ऑफिसर और दो लिपिक थे। इसके अलावा 25 नए पदों पर भर्ती होनी थी। लेकिन 25 साल बाद भी एक भी नियुक्ति नहीं हुई। हालत यह है कि संस्थान में अब केवल दो अधिकारी बचे हैं। इनमें से एक जून में रिटायर होने वाले हैं। यानी कुछ दिन बाद पूरा संस्थान लगभग एक व्यक्ति के भरोसे रह जाएगा।
सवाल यह है कि जिस संस्थान ने कई हाई प्रोफाइल मामलों में मौत का सच सामने रखा, उसे मजबूत करने के बजाय कमजोर क्यों किया गया? आरोप है कि विभाग ने सालों तक अनदेखी की और अब स्टाफ की कमी का हवाला देकर मर्जर का रास्ता चुना जा रहा है। गृह विभाग की प्रमुख सचिव आईएएस निहारिका बारिक सिंह ने अधिकारियों को रिपोर्ट तैयार करने के लिए कहा है।
मौत की असली वजह बताता है संस्थान:
मेडिकोलीगल संस्थान मौत के कारणों की वैज्ञानिक जांच करता है। यहां यह पता लगाया जाता है कि मौत प्राकृतिक थी, आत्महत्या थी या हत्या। अगर हत्या हुई तो किस जहर या रसायन का इस्तेमाल हुआ। कितने समय से जहर दिया जा रहा था। किस हथियार से हमला हुआ। कई ऐसे केस, जिनमें पोस्टमार्टम के बाद भी मौत का कारण साफ नहीं होता, यहां भेजे जाते हैं। संस्थान की रिपोर्ट कोर्ट में अहम साक्ष्य मानी जाती है।
गृह विभाग का तर्क भी सवालों में:
गृह विभाग का कहना है कि मेडिको लीगल संस्थान और FSL दोनों गृह विभाग के अधीन हैं। इसलिए अलग-अलग लैब चलाने के बजाय एक ही लैब को मजबूत करना बेहतर होगा। लेकिन सवाल यह है कि अगर सरकार व्यवस्था मजबूत करना चाहती थी तो 25 साल तक भर्ती क्यों नहीं की गई? संस्थान को कमजोर क्यों होने दिया गया? विभाग के पास इसका स्पष्ट जवाब नहीं है।
कई बार भेजे गए पत्र, जवाब नहीं:
संस्थान के डायरेक्टर कई बार भर्ती और संसाधनों को लेकर वरिष्ठ अधिकारियों को पत्र लिख चुके हैं। लेकिन न चर्चा हुई और न जवाब मिला। इससे यह सवाल और गहरा हो गया है कि क्या विभाग पहले से ही संस्थान को खत्म करने की दिशा में काम कर रहा था।
शुरुआत से ही उपेक्षा का शिकार:
मेडिको लीगल संस्थान की जरूरत 1975 में महसूस की गई थी। 1976 में मध्यप्रदेश में देश का पहला ऐसा संस्थान शुरू हुआ। इससे मौत के मामलों की जांच तेज हुई। कई हाई प्रोफाइल केस जल्दी सुलझने लगे। बाद में दूसरे राज्यों ने भी इसी मॉडल को अपनाया। लेकिन छत्तीसगढ़ में यह संस्थान शुरुआत से ही उपेक्षित रहा।
मेडिकल कॉलेज के अधीन कर दिया गया:
राज्य गठन के बाद संस्थान को स्वतंत्र पहचान नहीं मिली। इसे रायपुर मेडिकल कॉलेज के अधीन कर दिया गया। फॉरेंसिक विभाग के HOD को इसका पदेन संचालक बना दिया गया। आरोप है कि संस्थान का बजट और संसाधन मेडिकल कॉलेज के कामों में खर्च होते रहे। इससे संस्थान कभी मजबूत नहीं हो पाया।
संसाधनों की भी भारी कमी:
संस्थान में आधुनिक उपकरणों और विशेषज्ञों की कमी है। कई जरूरी जांचों के लिए पर्याप्त संसाधन तक नहीं हैं। प्रदेश में अपराध और संदिग्ध मौतों के मामले बढ़ रहे हैं, लेकिन सरकार ने इस संस्थान की क्षमता बढ़ाने पर कभी गंभीरता नहीं दिखाई।
प्रभारी संचालक ने बताई जरूरत:
संस्थान के प्रभारी संचालक डॉ. विकास ध्रुव का कहना है कि कई मामलों में पोस्टमार्टम के बाद भी मौत का कारण स्पष्ट नहीं होता। कई बार शव डिकंपोज हो चुका होता है। कई मामलों में रसायनों की सही मात्रा पता करना मुश्किल होता है। ऐसे केस संस्थान में भेजे जाते हैं। यहां वैज्ञानिक जांच के बाद रिपोर्ट तैयार होती है। कोर्ट उसी रिपोर्ट के आधार पर फैसला सुनाता है।
बड़ा सवाल अब भी कायम:
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या गृह विभाग अपनी 25 साल की लापरवाही छिपाने के लिए मर्जर का रास्ता अपना रहा है? अगर संस्थान इतना जरूरी है तो भर्ती क्यों नहीं हुई? अगर स्टाफ नहीं था तो संसाधन क्यों नहीं बढ़ाए गए? और अगर अब इसे FSL में मिला दिया गया तो क्या इसकी अलग पहचान खत्म नहीं हो जाएगी?
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