छत्तीसगढ़ सरकार ने नगर निगमों के अधिकारों में बड़ा बदलाव, आबादी तय करेगी आयुक्त-MIC के पास कितनी ताकत

VINAY VERMA | May 27, 2026, 12:33 IST
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छत्तीसगढ़ सरकार ने नगर निगमों के प्रोजेक्ट मंजूरी नियम बदले। आबादी के अनुसार कमिश्नर, MIC और सामान्य सभा की शक्तियां तय। ई-टेंडर और समीक्षा अनिवार्य।

छत्तीसगढ़ सरकार ने नगर निगमों में होने वाले करोड़ों के विकास कार्यों को लेकर बड़ा फैसला लिया है। नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग ने प्रशासनिक और वित्तीय मंजूरी के नियम बदल दिए हैं। विभाग की सचिव आर. शंगीता ने नया आदेश जारी किया है। अब नगर निगमों में प्रोजेक्ट मंजूरी आबादी के आधार पर तय होगी।


सरकार ने साफ कर दिया है कि अब हर नगर निगम में कमिश्नर, एमआईसी और सामान्य सभा की ताकत अलग-अलग होगी। शहर की आबादी जितनी ज्यादा होगी, उसी हिसाब से मंजूरी का ढांचा तय रहेगा। इस फैसले का असर रायपुर, दुर्ग, भिलाई, बिलासपुर और बड़े शहरी निकायों पर सीधे पड़ेगा।



बडे़ निगमों का नया फॉर्मूला:

सरकार ने 3 लाख से ज्यादा और 10 लाख से कम आबादी वाले नगर निगमों के लिए अलग व्यवस्था बनाई है। इन निगमों में अब कामों की मंजूरी तीन स्तरों पर होगी। कमिश्नर, एमआईसी और सामान्य सभा के अधिकार स्पष्ट कर दिए गए हैं।



नए नियम क्या कहते हैं

  • कमिश्नर 1 करोड़ तक के काम मंजूर करेंगे
  • 1 से 6 करोड़ तक की मंजूरी MIC देगी
  • 6 से 10 करोड़ तक सामान्य सभा फैसला करेगी
  • 10 करोड़ से ऊपर शासन की मंजूरी जरूरी होगी
  • हर मंजूरी रिकॉर्ड और समीक्षा के दायरे में रहेगी

बड़े शहरों में कमिश्नर की ताकत घटी:

10 लाख से ज्यादा आबादी वाले नगर निगमों के लिए सरकार ने अलग मॉडल लागू किया है। राजधानी रायपुर समेत बड़े शहरों में अब कमिश्नर के अधिकार सीमित रहेंगे। सरकार चाहती है कि बड़े प्रोजेक्ट्स पर ज्यादा निगरानी रहे। इसी वजह से वित्तीय शक्तियां नीचे स्तर पर कम कर दी गई हैं।



50 लाख तक ही मंजूरी दे पाएंगे कमिश्नर:

नए आदेश के मुताबिक 10 लाख से ज्यादा आबादी वाले निगमों में कमिश्नर अब केवल 50 लाख रुपए तक के काम मंजूर कर सकेंगे। इससे ऊपर के प्रस्ताव सीधे एमआईसी के पास जाएंगे। सरकार का मानना है कि बड़े प्रोजेक्ट्स में सामूहिक निर्णय जरूरी है।



MIC को मिला 3 करोड़ तक का अधिकार:

बड़े शहरों में एमआईसी को 50 लाख से 3 करोड़ रुपए तक के प्रोजेक्ट मंजूर करने का अधिकार दिया गया है। वहीं 3 करोड़ से 10 करोड़ तक के काम सामान्य सभा में रखे जाएंगे। यानी अब बड़े प्रोजेक्ट्स बिना राजनीतिक सहमति के आगे नहीं बढ़ पाएंगे।



10 करोड़ से ऊपर शासन की मंजूरी अनिवार्य:

सरकार ने पहली बार 10 करोड़ की सीमा तय कर दी है। इससे ऊपर का कोई भी प्रोजेक्ट अब स्थानीय स्तर पर मंजूर नहीं होगा। न कमिश्नर, न एमआईसी और न ही सामान्य सभा इसे पास कर पाएगी। ऐसे हर मामले में राज्य शासन की पूर्व अनुमति जरूरी होगी।



छोटे नगर निगमों के लिए अलग नियम:

3 लाख से कम आबादी वाले नगर निगमों में सरकार ने सीमित वित्तीय अधिकार दिए हैं। यहां सिर्फ कमिश्नर की भूमिका तय की गई है। छोटे निगमों के कमिश्नर अधिकतम 50 लाख रुपए तक के काम मंजूर कर सकेंगे। इससे ऊपर के मामलों में शासन का हस्तक्षेप रहेगा।



ई-टेंडरिंग अब पूरी तरह अनिवार्य:

सरकार ने टेंडर प्रक्रिया को लेकर भी सख्ती दिखाई है। 10 लाख रुपए से ऊपर के सभी काम अब ई-टेंडर से ही होंगे। हाथों-हाथ फॉर्म बांटने की व्यवस्था खत्म कर दी गई है। विभाग चाहता है कि हर प्रक्रिया डिजिटल और पारदर्शी बने।



सिंगल टेंडर पर लगेगी रोक:

यदि किसी प्रोजेक्ट में पहली बार सिर्फ एक ही निविदा आती है, तो उसे स्वीकार नहीं किया जाएगा। कमिश्नर को 7 दिन के भीतर दोबारा टेंडर जारी करना होगा। सरकार ने साफ किया है कि प्रतिस्पर्धा के बिना बड़े काम मंजूर नहीं होंगे।



कम रेट वाले ठेकेदारों पर भी सख्ती:

जो ठेकेदार एस्टीमेट से 10 प्रतिशत कम दर पर टेंडर डालेंगे, उन्हें परफॉर्मेंस गारंटी जमा करनी होगी। एफडीआर या एनएससी जमा किए बिना एग्रीमेंट नहीं होगा। विभाग का मानना है कि इससे अधूरे और घटिया कामों पर रोक लगेगी।



वर्क ऑर्डर में देरी बर्दाश्त नहीं:

सरकार ने काम शुरू करने की समयसीमा भी तय कर दी है। फाइल मंजूर होते ही उसी दिन वर्क ऑर्डर जारी करना होगा। भूमि पूजन के तीन दिन के भीतर काम शुरू करना अनिवार्य रहेगा। देरी होने पर जिम्मेदारी तय होगी।



हर महीने होगी समीक्षा बैठक:

नगरीय प्रशासन विभाग की सचिव आर. शंगीता अब हर महीने समीक्षा करेंगी। महीने के अंतिम मंगलवार को सभी निगमों की फाइलें जांची जाएंगी। इसमें मंजूरी, टेंडर और काम की स्थिति देखी जाएगी।



नियम तोड़े तो सीधे कार्रवाई:

सरकार ने साफ चेतावनी दी है कि नियमों से बाहर जाकर मंजूरी देने पर सख्त कार्रवाई होगी। संबंधित निगम आयुक्त और इंजीनियर पर अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी। जरूरत पड़ने पर सस्पेंशन तक किया जा सकता है। सरकार अब नगर निगमों में ढिलाई के मूड में नहीं दिख रही।



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