नर्सिंग कॉलेजों की मान्यता में काउंसिल का खेल! प्रवेश की जिम्मेदारी चिकित्सा शिक्षा आयुक्त पर डालकर खुद को बचाने की तैयारी?
काउंसिल ने अपनी सूची में संस्थानों की स्वीकृत सीटें बताईं, लेकिन साथ ही साफ किया कि विद्यार्थियों का प्रवेश भारतीय उपचर्या परिषद यानी INC, नई दिल्ली की स्वीकृत सीटों के मुताबिक ही होना चाहिए।
दो सूचियों का मामला
इस पूरे मामले की जड़ दो अलग-अलग सूचियों में है। एक सूची छत्तीसगढ़ नर्सेस रजिस्ट्रेशन काउंसिल (CGNRC) की है, जबकि दूसरी भारतीय उपचर्या परिषद (INC) की उपयुक्तता सूची है। राज्य काउंसिल ने दावा-आपत्तियों की प्रक्रिया के बाद 17 अक्टूबर को संशोधित आदेश जारी किया। इससे पहले 13 और 14 अक्टूबर को संस्थानों की सूचियां जारी कर 15 अक्टूबर तक आपत्तियां मांगी गई थीं। अब सवाल यह है कि जब राज्य काउंसिल ने संस्थानों को मान्यता और सीटों का विवरण जारी कर दिया, तो प्रवेश के लिए अलग से INC की स्वीकृत सीटों की शर्त लगाने की जरूरत क्यों पड़ी?
सीटें ज्यादा, प्रवेश सीमित
आदेश की शर्तों के मुताबिक, जिन कॉलेजों को INC ने जितनी सीटों के लिए स्वीकृति दी है, प्रवेश और विद्यार्थियों का पंजीयन उसी सीमा में होना चाहिए। यदि किसी संस्थान में स्वीकृत संख्या से ज्यादा विद्यार्थियों को प्रवेश दिया जाता है, तो अतिरिक्त विद्यार्थियों का पंजीयन नहीं होगा। इसकी जिम्मेदारी संबंधित कॉलेज की बताई गई है। यानी राज्य काउंसिल की सूची में सीटों का ब्योरा होने के बावजूद कॉलेज अपनी मर्जी से सभी सीटों पर प्रवेश नहीं दे सकते। जहां राज्य की सूची और INC की स्वीकृत सीटों के बीच अंतर है, वहां वास्तविक प्रवेश क्षमता तय करने में यही शर्त निर्णायक होगी।
आयुक्त के पाले में गेंद
इस व्यवस्था का सबसे अहम पहलू प्रवेश और काउंसलिंग से जुड़ा है। काउंसिल ने मान्यता आदेश में INC की स्वीकृत सीटों की सीमा स्पष्ट कर दी है। अब चिकित्सा शिक्षा विभाग के आयुक्त कार्यालय के सामने चुनौती होगी कि काउंसलिंग में किस संस्थान को कितनी सीटें दी जाएं। यदि राज्य की सूची में दर्ज सीटों और INC की स्वीकृति के बीच अंतर के कारण विवाद पैदा होता है, तो प्रवेश प्रक्रिया पर सवाल उठ सकते हैं। ऐसे में जिम्मेदारी किस विभाग की होगी और छात्रों की शिकायतों का जवाब कौन देगा, यह स्पष्ट होना जरूरी है।
छात्रों पर असर क्या होगा?
नर्सिंग में दाखिला लेने वाले विद्यार्थियों के लिए यह सिर्फ सरकारी आदेशों का मामला नहीं है। सीटों की संख्या, कॉलेज की मान्यता और प्रवेश की वैधता सीधे उनके भविष्य से जुड़ी है। यदि किसी छात्र को ऐसी सीट पर प्रवेश मिल जाता है, जिसे INC की स्वीकृति हासिल नहीं है, तो आगे पंजीयन और प्रमाणपत्र मिलने में परेशानी हो सकती है। काउंसिल ने अतिरिक्त सीटों पर प्रवेश की स्थिति में पंजीयन नहीं होने की बात कही है। इसलिए विद्यार्थियों और अभिभावकों के लिए जरूरी है कि वे कॉलेज की कुल सीटों के बजाय संबंधित पाठ्यक्रम की INC से स्वीकृत सीटों की जानकारी लेकर ही दाखिला लें।
बाकी शर्तें भी सख्त
संशोधित आदेश में कॉलेजों के लिए दूसरी शर्तें भी रखी गई हैं। नए संस्थानों, नए पाठ्यक्रमों और सीट वृद्धि वाले कॉलेजों को राज्य काउंसिल से मान्यता मिलने के छह महीने के भीतर INC अधिनियम की धारा 13 के तहत निरीक्षण के लिए आवेदन करना होगा। जिन संस्थानों ने दस्तावेजों की कमी पूरी करने का शपथपत्र दिया है, उन्हें INC की 2026-27 की उपयुक्तता से संबंधित शर्त को छोड़कर बाकी कमियां एक महीने में पूरी करनी होंगी। काउंसिल वार्षिक और जरूरत पड़ने पर औचक निरीक्षण भी करेगी। नियमों का उल्लंघन मिलने पर मान्यता रद्द की जा सकती है।
जवाब मांगते सवाल
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि राज्य काउंसिल की सूची और INC की स्वीकृत सीटों में अंतर है, तो विद्यार्थियों को भ्रम से बचाने के लिए कॉलेजवार स्पष्ट स्थिति एक साथ क्यों नहीं बताई गई? काउंसलिंग से पहले हर पाठ्यक्रम की वास्तविक प्रवेश क्षमता सार्वजनिक करना किसकी जिम्मेदारी है? और यदि गलत सीटों पर प्रवेश होता है, तो क्या कार्रवाई सिर्फ कॉलेज पर होगी या प्रवेश प्रक्रिया तय करने वाले विभाग की भूमिका भी जांची जाएगी? इन सवालों का जवाब जरूरी है, क्योंकि किसी भी प्रशासनिक उलझन की कीमत आखिरकार फीस भरने वाले विद्यार्थियों को नहीं चुकानी चाहिए।