रायपुर साहित्य महोत्सव में परंपरा सहेजने की पहल, साहित्य के साथ संस्कृति, खानपान और वेशभूषा को मिला मंच

रायपुर साहित्य महोत्सव छत्तीसगढ़ की संस्कृति को बचाने की बड़ी पहल साबित हुआ। तीन दिनों तक चले इस उत्सव में लेखकों और साहित्य प्रेमियों ने हिस्सा लिया। यहां प्रदेश की विरासत को बखूबी दिखाया गया।

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रायपुर साहित्य महोत्सव इस बार सिर्फ साहित्यिक आयोजन तक सीमित नहीं रहा। यह आयोजन छत्तीसगढ़ की परंपरा, लोक संस्कृति और जनजातीय विरासत को सहेजने की बड़ी पहल बनकर सामने आया है। छत्तीसगढ़ मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में राज्य में परंपराओं को संरक्षित करने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। इसी सोच को जमीन पर उतारने का काम तीन दिन चले रायपुर साहित्य उत्सव में दिखाई दिया है।

तीन दिन चले इस आयोजन में साहित्यकारों, लेखकों, बुद्धिजीवियों और साहित्य प्रेमियों को मंच मिला। इसके साथ ही छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान को भी विशेष स्थान दिया गया। पुरखौती मुक्तांगन में आयोजित इस उत्सव में अलग-अलग स्टॉल लगाए गए, जिनमें बस्तर से लेकर सरगुजा तक की संस्कृति, पहनावा और खानपान को प्रदर्शित किया गया। आयोजन स्थल पर ऐसा माहौल था, जहां लोग साहित्य के साथ-साथ छत्तीसगढ़ की परंपराओं को करीब से समझ सके।

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परंपरा को सहेजने की खास पहल

रायपुर साहित्य महोत्सव में परंपराओं को जीवित रखने की दिशा में कई पहल दिखाई दीं। यहां लगाए गए स्टॉल में जनजातीय जीवन शैली, पारंपरिक वेशभूषा, खानपान और आभूषणों को प्रदर्शित किया गया। लोगों को इन चीजों के बारे में जानकारी दी गई और कई जगह बिक्री की व्यवस्था भी की गई।
यह आयोजन इस बात का उदाहरण बना कि साहित्य के साथ संस्कृति को भी आगे बढ़ाया जा सकता है। लोगों ने इन स्टॉल के जरिए छत्तीसगढ़ की पारंपरिक पहचान को करीब से देखा और समझा।

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धुरवा जनजाति की संस्कृति आकर्षण का केंद्र

बस्तर क्षेत्र की धुरवा जनजाति अपनी अलग सांस्कृतिक पहचान के लिए जानी जाती है। महोत्सव में लगाए गए स्टॉल के माध्यम से धुरवा जनजाति की परंपराओं को प्रदर्शित किया गया। यहां पुरुषों की पारंपरिक वेशभूषा जैसे धोती, सिर पर फेटा और कंधे पर रखा जाने वाला तुवाल दिखाया गया। वहीं महिलाओं की पारंपरिक पहचान चांदी के आभूषण, कौड़ी के हार और रंग-बिरंगी चूड़ियां रही। इन चीजों को देखने में लोगों ने काफी रुचि दिखाई।
खानपान के रूप में चावल, कंद-मूल, मड़िया और महुआ से बने पेय पदार्थों की जानकारी दी गई। स्टॉल के माध्यम से इन पारंपरिक चीजों को प्रदर्शित किया गया और कई चीजों की बिक्री भी हुई।

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जड़ी-बूटियों की परंपरा को बचाने की कोशिश

सरगुजा क्षेत्र की पारंपरिक जड़ी-बूटियों को भी महोत्सव में जगह दी गई। इन जड़ी-बूटियों को प्रदर्शित करने का उद्देश्य लोगों को इनके बारे में जागरूक करना था। कई ऐसी जड़ी-बूटियां दिखाई गईं, जो अब कम मिलती हैं। स्टॉल में मौजूद वैद्यों ने लोगों को पारंपरिक उपचार पद्धति के बारे में जानकारी दी। उन्होंने बताया कि इन जड़ी-बूटियों का उपयोग कई तरह की बीमारियों के इलाज में किया जाता रहा है। इस स्टॉल पर लोगों की अच्छी भीड़ देखने को मिली।

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पारंपरिक आभूषण और जूट कपड़ों की झलक

छत्तीसगढ़ की पारंपरिक पहचान में जूट के कपड़ों का भी खास स्थान रहा है। महोत्सव में जूट के कपड़ों की खूबसूरती और उपयोगिता को दिखाया गया। लोगों को बताया गया कि यह कपड़े पर्यावरण के अनुकूल होते हैं और पहले ग्रामीण जीवन का हिस्सा रहे हैं।
इसके अलावा पारंपरिक आभूषणों की भी प्रदर्शनी लगाई गई। यहां रुपया माला, करधन, एंठी और सूता जैसे आभूषणों को प्रदर्शित किया गया। इन आभूषणों के बारे में नई पीढ़ी को जानकारी देने की कोशिश की गई।

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पारंपरिक व्यंजनों का स्वाद

साहित्य महोत्सव में खानपान को भी विशेष स्थान दिया गया। पारंपरिक व्यंजनों के लिए अलग स्टॉल लगाए गए थे, यहां बस्तर से लेकर सरगुजा तक के पारंपरिक खाने का स्वाद लोगों को मिला। चिला, फरा, धुस्का, गुलगुल भजिया जैसे व्यंजन लोगों ने खूब पसंद किए। इसके साथ बस्तर की प्रसिद्ध चीटियों की चटनी भी लोगों के आकर्षण का केंद्र रही। इस स्टॉल के जरिए लोगों को जनजातीय खानपान की झलक मिली।

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किताब प्रेमियों के लिए बना अलग जोन

साहित्य महोत्सव में किताबों के लिए अलग जोन बनाया गया। इस जोन में छत्तीसगढ़ से लेकर देश और विदेश के 500 से अधिक लेखकों की किताबें रखी गईं। यहां कविता, कहानी, उपन्यास और विचार लेखन की किताबें मौजूद थीं।

ज्ञानपीठ से सम्मानित कथाकार विनोद कुमार शुक्ल की किताबों को लेकर लोगों में खास उत्साह दिखाई दिया। उनकी प्रसिद्ध रचनाएं जैसे नौकर की कमीज और दीवार में एक खिड़की रहती थी भी यहां उपलब्ध थीं।

फिल्म डायरेक्टर और लेखक सुविज्ञा दुबे ने बताया कि पढ़ाई के दौरान उन्हें विनोद कुमार शुक्ल के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी। इस उत्सव के जरिए उन्हें उनके साहित्य को जानने का मौका मिला और अब वे उनकी रचनाएं पढ़ना चाहती हैं।

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साहित्य और संस्कृति को जोड़ने की कोशिश

रायपुर साहित्य महोत्सव ने यह दिखाया कि साहित्य और संस्कृति एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। इस आयोजन में जहां एक तरफ साहित्यिक चर्चा हुई, वहीं दूसरी तरफ लोक संस्कृति और परंपराओं को भी सामने लाया गया। यह महोत्सव छत्तीसगढ़ की पहचान को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इससे राज्य की परंपराओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाने में मदद मिलेगी।

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छत्तीसगढ़ की पहचान हुई मजबूत

कुल मिलाकर रायपुर साहित्य महोत्सव परंपरा, साहित्य और संस्कृति को एक साथ जोड़ने वाला आयोजन साबित हुआ। इस आयोजन के जरिए छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने का संदेश दिया गया। आने वाले समय में इस तरह के आयोजन राज्य की पहचान को और मजबूत करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।

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