क्या एमपी में ब्लैक लिस्टेड सोम डिस्टलरी सीजी में बेच सकती है शराब, आबकारी कमिश्नर की एडवोकेट जनरल को चिट्ठी

Arun Tiwari | Apr 21, 2026, 16:46 IST
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सोम डिस्टिलरीज को छत्तीसगढ़ में सप्लायर बनाए जाने पर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। फर्जी परमिट और अवैध शराब परिवहन के आरोपों के बावजूद कंपनी को 2026-27 सप्लायर सूची में शामिल किया गया। अब मामला कानूनी जांच और महाधिवक्ता की राय पर पहुंच गया है।

पांच प्वाइंट में समझें क्या है पूरा मामला :

  • एमपी में सोम डिस्टिलरीज का लाइसेंस सस्पेंड है।
  • फर्जी परमिट और अवैध शराब परिवहन का आरोप है।
  • हाईकोर्ट ने भी लाइसेंस निलंबन को सही बताया है।
  • छत्तीसगढ़ ने 2026-27 के लिए सप्लायर बना दिया
  • वैध लाइसेंस वाली कंपनियां ही सप्लायर बन सकती हैं।
  • आबकारी आयुक्त,मप्र ने महाधिवक्ता,छत्तीसगढ़ को लिखा पत्र

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Raipur. क्या मध्य प्रदेश में ब्लैकलिस्टेड सोम डिस्टलरी छत्तीसगढ़ में शराब की सप्लाई कर सकती है? यह सवाल मध्य प्रदेश के आबकारी कमिश्नर ने छत्तीसगढ़ के एडवोकेट जनरल से पूछा है। एमपी के आबकारी आयुक्त ने छत्तीसगढ़ के महाधिवक्ता को पत्र लिखा है। इस पत्र में उन्होंने पूरे मामले की जानकारी देते हुए कानूनी राय मांगी है।



आबकारी आयुक्त ने पूछा है कि क्या किसी कंपनी का लाइसेंस दूसरे राज्य में निलंबित होने के बाद भी उसे छत्तीसगढ़ में काम करने की अनुमति दी जा सकती है। क्या ऐसे में कंपनी का सप्लायर रजिस्ट्रेशन रद्द किया जाना चाहिए। क्या इस पूरे मामले में विभागीय जांच शुरू की जानी चाहिए।



क्या है पूरा मामला :

मध्य प्रदेश के आबकारी आयुक्त को 7 अप्रैल 2026 को ई-मेल के जरिए शिकायत मिली। शिकायत में कहा गया कि मध्य प्रदेश में सोम डिस्टिलरीज का निर्माण लाइसेंस 4 फरवरी 2026 को निलंबित कर दिया गया था। कंपनी ने इस फैसले को अदालत में चुनौती दी लेकिन 23 मार्च 2026 को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने भी निलंबन को सही ठहराया और कंपनी की याचिका खारिज कर दी।



इसके बाद भी छत्तीसगढ़ आबकारी विभाग ने इस कंपनी का सप्लायर रजिस्ट्रेशन स्वीकार कर लिया। इतना ही नहीं कंपनी को 2026-27 के लिए शराब की दर तय करने की प्रक्रिया (लैंडिंग प्राइस) में भी शामिल कर लिया गया।



जांच के घेरे में सिंडिकेट :

सोम डिस्टिलरीज के साथ-साथ दो अन्य कंपनियां, सोम डिस्टिलरीज एंड ब्रेवरीज ओडिशा प्राइवेट लिमिटेड और लीजेंड डिस्टिलरीज प्राइवेट लिमिटेड भी आपस में जुड़ी हुई हैं। जगदीश कुमार अरोरा का नाम इन तीनों ही कंपनियों के संचालकों की सूची में शामिल है। सोम डिस्टिलरीज ओडिशा में उनके पुत्र दीपक अरोरा भी संचालक के रूप में जुड़े हैं।



लीजेंड डिस्टिलरीज वर्तमान में छत्तीसगढ़ में देशी और विदेशी मदिरा के प्रदायकर्ता के रूप में पंजीकृत है। आबकारी आयुक्त ने महाधिवक्ता को भेजे पत्र में स्पष्ट किया है कि कंपनी द्वारा छत्तीसगढ़ में पंजीयन के लिए मध्य प्रदेश और ओडिशा के जीवित बॉटलिंग लाइसेंस की प्रतियां प्रस्तुत की गई।



अब आगे क्या :

आबकारी विभाग ने महाधिवक्ता को भेजे गए पत्र के साथ कई जरूरी दस्तावेज भी संलग्न किए हैं, जिनमें हाई कोर्ट का आदेश और कंपनियों से जुड़े कागजात शामिल हैं। अब इस पूरे मामले का भविष्य महाधिवक्ता की राय पर निर्भर करेगा। अगर राय कंपनी के खिलाफ आती है तो छत्तीसगढ़ में सोम डिस्टिलरीज के कारोबार पर बड़ा असर पड़ सकता है।



इस मामले ने आबकारी विभाग की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब कंपनी का लाइसेंस निलंबित होने की जानकारी थी तब उसे रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया में शामिल कैसे किया गया। फिलहाल सभी की नजरें महाधिवक्ता के फैसले पर टिकी हैं।



आबकारी विभाग का कारनामा :

आबकारी विभाग छत्तीसगढ़ में एक बार फिर बड़ी लापरवाही देखने को मिली है। विभाग ने उन कंपनियों को काम दे दिया है जो बाहर बैन हैं। यह मामला सीधे तौर पर नियमों को ताक पर रखने जैसा है। मध्य प्रदेश में जिन कंपनियों के लाइसेंस सस्पेंड हैं, उन्हें यहां एंट्री मिली है।



इन कंपनियों को साल 2026-27 के लिए सप्लायर के तौर पर चुना गया है। अब इस फैसले को लेकर कई सवाल खड़े हो रहे हैं। सोम डिस्टिलरीज एंड ब्रेवरीज लिमिटेड पर एमपी में एक्शन हुआ था। फरवरी 2026 को इस कंपनी का लाइसेंस एमपी में सस्पेंड हुआ था। यह कार्रवाई एक आपराधिक मामले में सजा मिलने के बाद हुई थी।



कंपनी पर फर्जी एक्साइज परमिट बनाने के आरोप साबित हो चुके हैं। इसके अलावा अवैध शराब के परिवहन जैसे गंभीर मामले भी सामने आए थे। एमपी सरकार ने इन कारणों से कंपनी पर कड़ा प्रतिबंध लगाया था।



मध्य प्रदेश आबकारी आयुक्त ने कंपनी के लाइसेंस को रद्द करने का फैसला लिया था। इसके खिलाफ कंपनी कोर्ट गई थी लेकिन उसे वहां से राहत नहीं मिली। हाईकोर्ट ने 23 मार्च 2026 को निलंबन बरकरार रखने का आदेश दिया। कोर्ट के आदेश के बाद भी छत्तीसगढ़ में कंपनी की राह आसान रही।



विभाग ने कंपनी की ओडिशा यूनिट और एक सहयोगी को लिस्ट में जोड़ा है। इन्हें छत्तीसगढ़ की लैंडिंग प्राइस लिस्ट में आधिकारिक तौर पर शामिल किया गया है। इस पूरे मामले ने आबकारी विभाग की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान लगा दिया है। जब एक कंपनी दूसरे राज्य में बैन है, तो उसे यहां काम कैसे मिला? क्या अधिकारियों ने कंपनी के पुराने रिकॉर्ड की जांच नहीं की थी?



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