महाभारत की गाथा को विश्व मंच पर पहुँचाने वाली पंडवानी की तीजन बाई नहीं रहीं
RAIPUR : छत्तीसगढ़ ही नहीं, पूरे देश की लोक कला जगत के लिए रविवार का दिन बेहद दुखद रहा। पंडवानी गायन को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने वाली पद्म विभूषण सम्मानित लोक कलाकार तीजन बाई का रायपुर में निधन हो गया। वे लंबे समय से अस्वस्थ थीं और उपचार के दौरान उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके निधन के साथ ही भारतीय लोक संस्कृति का एक स्वर्णिम अध्याय समाप्त हो गया। उनके जाने से कला, साहित्य और सांस्कृतिक जगत में शोक की लहर दौड़ गई है।
देश विदेश में पहुंचाई पंडवानी:
तीजन बाई ने पंडवानी जैसी पारंपरिक लोक कला को देश-विदेश तक पहुंचाने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई। उनकी दमदार आवाज़, प्रभावशाली अभिनय और तंबूरे के साथ महाभारत के पात्रों को जीवंत कर देने की अनूठी शैली ने उन्हें विश्वभर में पहचान दिलाई। उन्होंने उस समय पंडवानी की ‘कपालिक’ शैली में मंच पर खड़े होकर प्रस्तुति देना शुरू किया, जब यह कला लगभग पूरी तरह पुरुष कलाकारों तक सीमित मानी जाती थी। उन्होंने सामाजिक परंपराओं को चुनौती देते हुए अपनी अलग पहचान बनाई और आने वाली पीढ़ियों के लिए नई राह तैयार की।
साधारण से असाधारण बनीं तीजन बाई:
छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के एक साधारण परिवार में जन्मी तीजन बाई का जीवन संघर्षों से भरा रहा। बचपन में ही उन्हें महाभारत की कथाओं से लगाव हो गया था। उन्होंने अपने नाना से पंडवानी की बारीकियां सीखीं और कम उम्र में ही सार्वजनिक मंचों पर प्रस्तुति देना शुरू कर दिया। शुरुआत में समाज के विरोध और आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने अपनी साधना नहीं छोड़ी। यही समर्पण उन्हें देश की सबसे प्रतिष्ठित लोक कलाकारों की श्रेणी में ले गया।
उनकी कला को समय-समय पर देश के सर्वोच्च सम्मानों से नवाजा गया। उन्हें पद्मश्री, पद्मभूषण और बाद में पद्म विभूषण जैसे नागरिक सम्मान मिले। इसके अलावा संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार सहित अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान भी उन्हें प्राप्त हुए। उन्होंने यूरोप, एशिया और दुनिया के कई देशों में पंडवानी की प्रस्तुतियां देकर भारतीय लोक संस्कृति का परचम लहराया।
छत्तीसगढ़ की पहचान:
वह केवल एक लोक गायिका नहीं थीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान का सबसे सशक्त चेहरा भी थीं। उन्होंने महाभारत की कथाओं को अपनी अनूठी शैली, हाव-भाव और गायन से इस तरह प्रस्तुत किया कि दर्शक स्वयं को कथा का हिस्सा महसूस करने लगते थे। उनकी प्रस्तुतियां लोक परंपरा और रंगमंच का अद्भुत संगम मानी जाती थीं।
उनके निधन की खबर सामने आते ही देशभर के राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक जगत से शोक संदेश आने लगे। प्रधानमंत्री समेत कई नेताओं और कलाकारों ने उन्हें भारतीय लोक संस्कृति की अमूल्य धरोहर बताते हुए श्रद्धांजलि अर्पित की।
तीजन बाई का जाना केवल एक कलाकार का निधन नहीं, बल्कि भारतीय लोक परंपरा की उस अमर आवाज़ का मौन हो जाना है, जिसने दशकों तक महाभारत की गाथाओं को अपनी बुलंद आवाज़ से जीवंत रखा। उनकी कला, उनका संघर्ष और उनकी विरासत आने वाली पीढ़ियों के लिए हमेशा प्रेरणा का स्रोत बनी रहेगी।
FAQ
- तीजन बाई का निधन कब और कहाँ हुआ?
उत्तर: तीजन बाई का निधन 5 जुलाई 2026 (रविवार) तड़के करीब 3:15 बजे रायपुर स्थित AIIMS अस्पताल में हुआ। - तीजन बाई किस लोक कला विधा से जुड़ी थीं?
उत्तर: वे छत्तीसगढ़ की प्रसिद्ध पंडवानी गायन शैली से जुड़ी थीं, जिसमें महाभारत की कथाएँ गायन और अभिनय के माध्यम से प्रस्तुत की जाती हैं। - तीजन बाई का जन्म कहाँ हुआ था?
उत्तर: उनका जन्म वर्ष 1956 में छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के गनियारी गांव में हुआ था।
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