तंबाकू सेवन में छत्तीसगढ़ आगे, गुड़ाखू की चंगुल में फंसी महिलाएं
NEWS IN SHORT
- छत्तीसगढ़ में तंबाकू सेवन 39.1%।
- गुटखे के बाद गुड़ाखू दूसरा दुश्मन।
- महिलाएं-बुजुर्ग गुड़ाखू के चंगुल में।
- 84% उपभोक्ता छोड़ने के प्रति बेपरवाह।
- गुड़ाखू से कैंसर का गंभीर खतरा।
NEWS IN DETAIL
विश्व तंबाकू निषेध दिवस (वर्ल्ड नो टोबैको डे) के मौके पर सामने आए आंकड़े छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य परिस्थिति की एक डरावनी तस्वीर पेश कर रहे हैं। जहां देश में तंबाकू सेवन का राष्ट्रीय औसत 28.4% है, वहीं छत्तीसगढ़ में यह आंकड़ा बढ़कर 39.1% तक पहुंच चुका है। राज्य में तंबाकू की बात आते ही आमतौर पर सिगरेट, बीड़ी और गुटखे का जिक्र होता है, लेकिन हाल ही में हुए एक सर्वे ने चौंकाने वाला खुलासा किया है। राज्य में गुटखे के बाद गुड़ाखू दूसरा सबसे बड़ा दुश्मन बनकर उभरा है, जिसके चंगुल में खासकर महिलाएं और बुजुर्ग फंसते जा रहे हैं।
दांत साफ करने की आदत बनी जानलेवा लत
ग्लोबल एडल्ट टोबैको सर्वे की टीम द्वारा रायपुर, गौरेला-पेंड्रा-मरवाही (जीपीएम), अंबिकापुर, राजनांदगांव और नारायणपुर सहित 5 जिलों में 2566 लोगों पर एक विस्तृत अध्ययन किया गया। इस सर्वे में सामने आया कि दांत साफ करने की पारंपरिक आदत के रूप में इस्तेमाल होने वाला गुड़ाखू अब एक गंभीर स्वास्थ्य जोखिम बन चुका है।
अध्ययन के अनुसार, राज्य में गुटखा खाने वाले जहां 41.92% हैं, वहीं गुड़ाखू का इस्तेमाल करने वाले भी 41.4% के करीब पहुंच चुके हैं। इसका सबसे ज्यादा असर 40 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों और महिलाओं में देखा गया है।
आंकड़े जो चिंता बढ़ाते हैं (जिलेवार उपभोक्ता):
सर्वे के दौरान कुल 811 सक्रिय तंबाकू उपभोक्ताओं की पहचान कर उनका विस्तृत साक्षात्कार लिया गया, जिनकी संख्या इस प्रकार है:
- गौरेला-पेंड्रा-मरवाही (जीपीएम): 167 उपभोक्ता
- रायपुर : 164 उपभोक्ता
- अंबिकापुर, राजनांदगांव और नारायणपुर: प्रत्येक जिले से 160-160 उपभोक्ता
84% लोग बेपरवाह, छोड़ने की इच्छा सबसे कम
इस सर्वे का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि कैंसर का खतरा जानने के बावजूद 84% लोगों ने कभी तंबाकू छोड़ने का प्रयास ही नहीं किया। केवल 15.9% लोगों ने इसे छोड़ने की कोशिश की, लेकिन उनमें से भी आधे से अधिक लोग एक महीने के भीतर दोबारा इसका सेवन करने लगे।
जहां 52% लोगों ने किशोरावस्था (11-20 वर्ष) में ही तंबाकू का सेवन शुरू कर दिया था, वहीं गुड़ाखू की शुरुआत अधिकतर लोगों ने 20 वर्ष की उम्र के बाद की। हालांकि, जिन लोगों ने इसे छोड़ने की कोशिश की, उनमें से 54.26% लोगों के लिए स्वास्थ्य संबंधी चिंताएं मुख्य वजह रहीं।
गुड़ाखू को सुरक्षित समझना बड़ी भूल
कैंसर रोग विशेषज्ञ डॉ. भावना सिरोही के अनुसार, छत्तीसगढ़ में तंबाकू और गुड़ाखू का सेवन मुंह, गले और भोजन नली के कैंसर का सबसे प्रमुख कारण है। उन्होंने सचेत करते हुए कहा:
"गुड़ाखू को सुरक्षित समझना एक बहुत बड़ी गलत धारणा है। इसमें भारी मात्रा में तंबाकू और निकोटीन होता है। यदि मुंह में न भरने वाले घाव, सफेद या लाल धब्बे, या निगलने में परेशानी जैसे लक्षण दिखें, तो इन्हें बिल्कुल नजरअंदाज न करें, क्योंकि ये कैंसर के शुरुआती संकेत हो सकते हैं।"
डॉ. सिरोही ने यह भी जोड़ा कि तंबाकू की लत सिर्फ एक व्यक्ति को नहीं, बल्कि उसके पूरे परिवार को आर्थिक और मानसिक रूप से बर्बाद कर देती है। इस नो टोबैको डे पर जरूरत इस बात की है कि गुड़ाखू जैसी छिपी हुई जानलेवा आदतों के खिलाफ बड़े पैमाने पर जागरूकता अभियान चलाया जाए।
TIMELINE
- 11-20 वर्ष: 52% लोगों को लगी तंबाकू की लत।
- 20 वर्ष बाद: अधिकांश ने शुरू किया गुड़ाखू का सेवन।
- 40 वर्ष बाद: महिलाएं और बुजुर्ग बने इसके मुख्य शिकार।
- लत के दौरान: 84% लोगों ने कभी नहीं छोड़ी आदत।
- 1 महीने के भीतर: प्रयास करने वाले 50% से अधिक लोग दोबारा हारे।
निष्कर्ष
छत्तीसगढ़ में राष्ट्रीय औसत से अधिक (39.1%) तंबाकू का सेवन चिंताजनक है। गुटखे के बाद 'गुड़ाखू' दांत साफ करने के भ्रम में महिलाओं और बुजुर्गों को कैंसर की ओर धकेल रहा है। 84% लोगों की बेपरवाही और लत न छोड़ने की जिद को तोड़ने के लिए बड़े पैमाने पर जागरूकता बेहद जरूरी है।
FAQ
- छत्तीसगढ़ में कितने प्रतिशत लोग तंबाकू खाते हैं?
39.1% लोग (राष्ट्रीय औसत 28.4% से बहुत ज़्यादा)। - क्या गुड़ाखू सुरक्षित है?
बिलकुल नहीं। इसमें तंबाकू और निकोटीन होता है, जो कैंसर फैलाता है। - मुंह के कैंसर के शुरुआती लक्षण क्या हैं?
मुंह में न भरने वाले घाव, सफेद-लाल धब्बे और निगलने में तकलीफ।
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