विधायकी से महंगा युवा कांग्रेस की कुर्सी का भाव, अध्यक्ष बनने 5 करोड़ का दांव
छत्तीसगढ़ में इस वक्त युवा कांग्रेस के चुनाव का जोर है। युवा कांग्रेस हो या युवा मोर्चा इसके प्रदेश अध्यक्ष किसी विधायक,सांसद से कम नहीं माने जाते। सियासत के अधिकांश नेता इसी कुर्सी के बाद राजनीति की उपरी पायदान तक पहुंचे हैं।
लेकिन युवा कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष का भाव बहुत महंगा हो गया है। महंगा भी इतना कि यह किसी आम कार्यकर्ता के बूते के बाहर है। यूथ कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव विधायकी और सांसदी के चुनाव से भी महंगा हो गया है।
जिसकी जेब में 5 करोड़ रुपए हैं वही यूथ कांग्रेस का प्रदेश अध्यक्ष बन सकता है।
चुनाव का जोर-शोर :
छत्तीसगढ़ में इन दिनों यूथ कांग्रेस के संगठनात्मक चुनाव की प्रक्रिया चल रही है। इसी चुनाव के जरिए ब्लॉक, विधानसभा, जिला और प्रदेश स्तर के पदाधिकारियों का निर्वाचन होगा।
नामांकन की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है और जल्द ही सदस्यता और मतदान का दौर शुरू होगा। यूथ कांग्रेस के चुनाव का सबसे महत्वपूर्ण आधार सदस्यता है। जिस उम्मीदवार के पक्ष में जितने अधिक सदस्य होंगे, उसकी जीत की संभावना उतनी ही मजबूत होगी।
यही वजह है कि पूरा चुनाव सदस्य बनाने की प्रतिस्पर्धा पर टिक जाता है और यहीं से चुनाव का खर्च करोड़ों में पहुंचने लगता है।
सदस्यता यानी जीत का टारगेट :
पहली नजर में सदस्यता शुल्क कोई बड़ा मुद्दा नहीं लगता। लेकिन असली खेल यहीं से शुरू होता है। इस बार प्रत्येक सदस्य के लिए 75 रुपए शुल्क निर्धारित किया गया है।
पिछली बार 2022 के चुनाव में यह शुल्क 50 रुपए था। सामान्य तौर पर यह माना जा सकता है कि जो युवा सदस्य बनना चाहता है, वह अपनी जेब से 75 रुपए जमा कर देगा लेकिन चुनाव की सच्चाई इससे बिल्कुल अलग है।
अधिक से अधिक सदस्य बनाने की जरूरत प्रदेश अध्यक्ष पद के दावेदारों को होती है। इसके लिए ब्लॉक, विधानसभा और जिला स्तर पर उनके समर्थकों का चुनाव लड़ना भी जरूरी होता है, क्योंकि वही अपने क्षेत्रों में सदस्य बनाएंगे और प्रदेश अध्यक्ष के पक्ष में माहौल तैयार करेंगे।
ऐसे में सदस्यता शुल्क का भार आमतौर पर कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों पर नहीं बल्कि प्रदेश अध्यक्ष पद के दावेदारों पर आ जाता है।
संगठन के विभिन्न स्तरों पर चुनाव लड़ रहे समर्थक अपनी जेब से हजारों-लाखों रुपए खर्च करने की स्थिति में नहीं होते, इसलिए सदस्यता शुल्क का बड़ा हिस्सा अध्यक्ष पद के उम्मीदवार या उनके समर्थक राजनीतिक गुट वहन करते हैं।
20 लाख सदस्य बनाने का लक्ष्य :
2022 के चुनाव के आंकड़े इस खर्च का अंदाजा लगाने के लिए काफी हैं। उस समय 17 लाख से अधिक सदस्य बनाए गए थे। यदि प्रति सदस्य 50 रुपए के हिसाब से देखें तो केवल सदस्यता शुल्क के रूप में लगभग 8 करोड़ 50 लाख रुपए जमा हुए।
बाद में जांच के दौरान 10 लाख से अधिक सदस्यताएं अमान्य घोषित कर दी गईं और केवल 7 लाख 16 हजार 748 सदस्य ही वैध मतदाता माने गए। यानी करोड़ों रुपए उन सदस्यताओं पर भी खर्च हुए, जो आखिरकार वोट में तब्दील ही नहीं हो सकीं।
इस बार सदस्यता का लक्ष्य और बड़ा रखा गया है। करीब 20 लाख सदस्य बनाने की तैयारी की गई है। यदि प्रति सदस्य 75 रुपए शुल्क के हिसाब से गणना करें तो केवल सदस्यता शुल्क ही लगभग 15 करोड़ रुपए तक पहुंच जाता है।
यह रकम किसी एक उम्मीदवार द्वारा नहीं बल्कि अध्यक्ष पद के प्रमुख दावेदारों के बीच खर्च की जाती है।
बघेल और देवेंद्र यादव खेमे में मुकाबला :
मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में माना जा रहा है कि प्रदेश अध्यक्ष पद के लिए मुख्य मुकाबला पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और विधायक देवेंद्र यादव के समर्थक खेमों के बीच हो सकता है।
स्क्रूटनी के बाद प्रदेश अध्यक्ष पद के लिए 17 उम्मीदवार मैदान में हैं लेकिन मुकाबला दो उम्मीदवारों के बीच में ही माना जा रहा है। शैलेंद्र बंजारे को देवेंद्र यादव समेत वर्तमान अध्यक्ष आकाश शर्मा और पूर्व मंत्री रुद्र गुरु का भी समर्थन है।
वही सत्येंद्र चेलक को भूपेश बघेल समेत दीपक बैज और टीएस सिंहदेव भी समर्थन दे रहे है। हालांकि अन्य गुटों के उम्मीदवार भी मैदान में रहेंगे लेकिन कुल मिलाकर चार से पांच ही प्रमुख दावेदार होंगे।
यदि केवल सदस्यता शुल्क की कुल राशि को इन्हीं उम्मीदवारों के बीच विभाजित किया जाए तो प्रति उम्मीदवार लगभग 3 से साढ़े तीन करोड़ रुपए का खर्च बैठता है।
लेकिन चुनाव का खर्च केवल सदस्यता शुल्क तक सीमित नहीं रहता। प्रदेशभर में लगातार दौरे, प्रचार-प्रसार, कार्यकर्ताओं के साथ बैठकें, आवागमन, चुनाव प्रबंधन और समर्थकों की आवभगत जैसे कई मद ऐसे हैं, जिन पर अतिरिक्त करोड़ों रुपए खर्च होते हैं।
संगठन के भीतर यह आंकलन लगाया जा रहा है कि प्रदेश अध्यक्ष पद के दो या तीन प्रमुख दावेदारों का कुल चुनावी खर्च 5 से 7 करोड़ रुपए तक पहुंच सकता है।
प्रदेश अध्यक्ष पद के लिए 17 उम्मीदवार :
स्क्रूटनी के बाद प्रदेश अध्यक्ष पद के लिए कुल 17 उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं। इनमें सत्येंद्र चेलक, शैलेंद्र बंजारे, विनोद कश्यप (भक्कू), भावेंद्र गंगोत्री, दीक्षा पांडे, जसमीत शर्मा (सोनू शर्मा), कपिल कांत नाग, मानव देशमुख, मुदुला भास्कर, परमीत बग्गा (हनी बग्गा), प्रशांत बोकड़े, प्रीतिका विश्वकर्मा, प्रीति वैष्णव, सागर बाघमारे, सजल चंद्राकर, शालिनी रामटेके और सोनिका पोर्ते शामिल हैं। इन सभी उम्मीदवारों के बीच प्रदेश युवा कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए मुकाबला होगा।
इन पदों पर चुनाव :
युवा कांग्रेस के संगठनात्मक चुनाव में केवल प्रदेश अध्यक्ष ही नहीं, बल्कि कई अन्य महत्वपूर्ण पदों के लिए भी मतदान कराया जाएगा।
प्रदेश अध्यक्ष के अलावा 16 प्रदेश उपाध्यक्ष, 53 प्रदेश महासचिव, जिला अध्यक्ष, जिला महासचिव, विधानसभा अध्यक्ष और ब्लॉक अध्यक्ष समेत विभिन्न पदों पर चुनाव होंगे।
मतदान प्रक्रिया जल्द शुरू होने की संभावना है। हालांकि संगठन के अन्य पदों पर चुनाव लड़ने का खर्च अपेक्षाकृत कम माना जाता है। अनुमान है कि प्रदेश महासचिव जैसे पद का चुनाव 5 से 10 लाख रुपए के भीतर लड़ा जा सकता है, जबकि ब्लॉक, विधानसभा और जिला स्तर के कई पद इससे भी कम खर्च में हासिल किए जा सकते हैं।
सबसे महंगा और संसाधन आधारित चुनाव प्रदेश अध्यक्ष का ही माना जाता है। युवा कांग्रेस का सदस्य ब्लॉक,जिला,विधानसभा और प्रदेश अध्यक्ष के लिए ऑनलाइन वोट डालता है।
विधायक और सांसदों के लिए खर्च की सीमा :
भारत निर्वाचन आयोग विधानसभा चुनाव में एक उम्मीदवार के लिए अधिकतम 40 लाख रुपए और लोकसभा चुनाव में 95 लाख रुपए तक खर्च करने की सीमा तय करता है।
इस सीमा का मकसद यही है कि केवल पैसे के दम पर चुनाव प्रभावित न हो और सभी उम्मीदवारों को बराबरी का अवसर मिले। लेकिन विडंबना यह है कि एक युवा संगठन के प्रदेश अध्यक्ष का चुनाव लड़ने के लिए उससे कई गुना अधिक खर्च होने की चर्चा है।
इस खर्च का कोई हिसाब चुनाव आयोग को नहीं देना पड़ता, क्योंकि यह राजनीतिक दल का आंतरिक चुनाव होता है और इस पर वैसी निगरानी नहीं होती जैसी सार्वजनिक चुनावों पर होती है। हालांकि विधानसभा और लोकसभा चुनाव में भी तय सीमा से कहीं अधिक खर्च किया जाता है।
आम कार्यकर्ता से बाहर चुनाव :
सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है कि यदि चुनाव लड़ने के लिए करोड़ों रुपए की जरूरत होगी तो क्या कोई सामान्य एनएसयूआई या यूथ कांग्रेस का कार्यकर्ता, जिसने वर्षों तक संगठन के लिए काम किया है, कभी प्रदेश अध्यक्ष बनने की हिम्मत जुटा पाएगा।
वास्तविकता यह है कि संसाधनों के अभाव में अधिकांश कार्यकर्ता चुनावी दौड़ में उतरने से पहले ही बाहर हो जाते हैं। दूसरी ओर, जिनके पास आर्थिक संसाधन हैं या जिन्हें किसी प्रभावशाली राजनीतिक गुट का समर्थन प्राप्त है, उनके लिए रास्ता अपेक्षाकृत आसान हो जाता है।
कई बार सामाजिक-राजनीतिक समीकरणों के आधार पर किसी मध्यमवर्गीय चेहरे को भी आगे बढ़ाया जाता है, लेकिन उसके पीछे भी किसी बड़े नेता या गुट का आर्थिक सहयोग होता है।
जिस कार्यकर्ता के पास न पैसा है और न किसी बड़े नेता का सहारा, वह चाहे कितना भी काबिल और मेहनती क्यों न हो, उसकी भूमिका अक्सर नारे लगाने, जुलूसों में भीड़ जुटाने और नेताओं के स्वागत-सत्कार तक सीमित रह जाती है।
वही कार्यकर्ता सालों तक पार्टी के लिए पसीना बहाता है, लेकिन जब संगठन में पद बांटने की बारी आती है तो पैसे और पहुंच वाले चेहरे आगे निकल जाते हैं।
बाद में यही लोग विधानसभा और लोकसभा के टिकटों की दौड़ में भी शामिल हो जाते हैं और सत्ता के बड़े पदों तक पहुंच जाते हैं, जबकि जमीनी स्तर पर काम करने वाला कार्यकर्ता वहीं का वहीं रह जाता है।
पैसे वालों की राजनीति :
इस व्यवस्था का समर्थन करने वालों का तर्क है कि बिना संसाधनों के इतने बड़े स्तर पर सदस्यता अभियान चलाना, पूरे प्रदेश में प्रचार करना और हजारों कार्यकर्ताओं को सक्रिय रखना संभव नहीं है।
उनके अनुसार जो व्यक्ति संगठन के लिए संसाधन जुटा सकता है, वही भविष्य में भी पार्टी के लिए उपयोगी साबित होगा। इस तर्क में कुछ व्यावहारिकता जरूर दिखाई देती है, लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब आर्थिक क्षमता ही नेतृत्व की सबसे बड़ी योग्यता बन जाती है।
तब यह नहीं देखा जाता कि कौन बेहतर संगठन चला सकता है, कौन कार्यकर्ताओं के बीच सबसे अधिक स्वीकार्य है या किसके पास बेहतर राजनीतिक दृष्टि है। तब केवल यह देखा जाता है कि किसकी जेब सबसे भारी है।
सियासत या निवेश :
यहीं से एक और बड़ा सवाल खड़ा होता है कि राजनीति आखिर है क्या। समाजसेवा का माध्यम या फिर एक तरह का निवेश। जो युवा करोड़ों रुपए खर्च करके किसी संगठन का पद हासिल करता है, वह स्वाभाविक रूप से इसे केवल सेवा का अवसर नहीं बल्कि एक निवेश की तरह भी देख सकता है, जिससे आगे चलकर उसे राजनीतिक लाभ मिलना चाहिए। व
ह लाभ टिकट के रूप में हो सकता है, सत्ता में प्रभाव के रूप में हो सकता है या किसी अन्य राजनीतिक अवसर के रूप में। एक समय था जब युवा समाज बदलने की सोच लेकर राजनीति में आता था।
अब राजनीति में प्रवेश करने से पहले ही युवाओं के सामने पहला सवाल यह होता है कि कितना खर्च करना पड़ेगा और बदले में क्या मिलेगा।
यह सोच अचानक पैदा नहीं हुई है, बल्कि उसी राजनीतिक संस्कृति का विस्तार है, जिसमें चुनाव लगातार महंगे होते गए और खर्च की भरपाई सत्ता के जरिए तलाशने की प्रवृत्ति मजबूत होती गई।
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