पन्ना में लू के कारण भगवान जगन्नाथ हुए बीमार, 15 दिन तक बंद रहेंगे मंदिर के कपाट, इस दौरान भगवान का होगा इलाज

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BP Shrivastava
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पन्ना में लू के कारण भगवान जगन्नाथ हुए बीमार, 15 दिन तक बंद रहेंगे मंदिर के कपाट, इस दौरान भगवान का होगा इलाज

PANNA. दुनिया की देखभाल करने वाले भगवान जगन्नाथ जी खुद बीमार पड़ गए हैं। इसका कारण उन्हें लू लगना है। भगवान की तबीयत खराब होने के कारण मंदिर को 15 दिन के लिए बंद कर दिया गया है और इस दौरान भगवान का इलाज किया जाएगा। 





प्राचीन परंपरा 





जिले में भगवान जगन्नाथ स्वामी का प्राचीन मंदिर है। यहां पर भगवान पुरी की तरह अपनी बहन सुभद्रा और भाई बलभद्र के साथ विराजमान हैं। यहां भी पुरी की तरह भगवान की रथ यात्रा निकाली जाती है। लेकिन इस परंपरा में थोड़ा बदलाव जरूर है। मंदिर के पुजारी राकेश गोस्वामी ने बताया कि यहां रथ यात्रा से पहले भगवान लू लगने से बीमार पड़ जाते हैं। भीषण गर्मी के इस मौसम में भगवान को लू लगने का कारण धूप में स्नान करना है। इसके कारण वे बीमार पड़ जाते हैं। 





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रथ यात्रा की परंपरा की शुरुआत





मंदिर में रविवार(4 जून) को सुबह राज परिवार की उपस्थिति में भगवान जगन्नाथ स्वामी के स्नान की रस्म अदायगी की गई। इसके साथ भगवान बीमार पड़ जाते हैं, बीमार भगवान को ठीक करने के लिए भक्त प्रार्थना करते हैं। 





कैसे होता है इलाज





सबसे पहले भगवान को मंदिर के गर्भगृह से बाहर लाया जाता है। यहां मंत्रोच्चार के साथ औषधीय जल से भगवान को स्नान कराया जाता है। इसी दौरान भगवान की भोजन व्यवस्थता भी बदल दी जाती है। इसका कारण उनका बीमार पड़ना है। मान्यता के अनुसार ठीक होने तक उन्हें रोज वैद्य द्वारा दवा देने की परंपरा भी निभाई जाती है। इस दौरान मंदिर के कपाट भक्तों के लिए बंद रहते हैं। 



गौरतलब है कि प्राण प्रतिष्ठा के 36 साल बाद पन्ना में भी आषाढ़ शुक्ल की द्वितीया को जगन्नाथ जी की रथयात्रा निकालने की शुरुआत हुई। बीते करीब 170 सालों से रथयात्रा निकालने का सिलसिला चला आ रहा है। पुरी की तरह इस रथ यात्रा में हजारों की भीड़ के साथ घोड़े-हाथी, ऊंटों की सवारी निकलती है।





पुरी में भी भगवान हो जाते हैं बीमार





पुरी में भगवान जगन्नाथ, उनकी बहन देवी सुभद्रा और भाई बलभद्र भी 15 दिन के लिए बीमार हो जाते हैं। वहां भी मंदिर को इस दौरान बंद कर दिया जाता है। जब तक भगवान बीमार रहते हैं उनके पास वैद्य और पुजारी को ही जाने की अनुमति होती है। यह प्रक्रिया हर साल होती है और फिर आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को भगवान रथ यात्रा पर निकलते हैं।



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