बरकतउल्ला विश्वविद्यालय विवाद के बाद व्यवस्था सुधारने सीनियर आईएएस को सौंपी कमान
ऐसे समझें क्या है पूरा मामला...
- दो कुलगुरुओं का कार्यकाल विवादों के बाद खत्म।
- बीएड कॉलेजों की संबद्धता पर फैसले बदले।
- बीबीए-एमबीए प्रवेश प्रक्रिया पर भी सवाल उठे।
- हजारों छात्रों का एडमिशन प्रभावित होने की स्थिति।
- उच्च शिक्षा मंत्री इंदर सिंह परमार को करना पड़ा हस्तक्षेप।
- अब अनुपम राजन संभालेंगे कुलगुरु की जिम्मेदारी।
मध्यप्रदेश की उच्च शिक्षा व्यवस्था एक बार फिर सवालों के घेरे में है। राजधानी के बरकतउल्ला विश्वविद्यालय में पिछले डेढ़ महीने के भीतर घटनाक्रम इतनी तेजी से बदले कि दो कुलगुरु बदल गए, फैसले पलटते रहे और हजारों छात्र असमंजस में आ गए।
सवाल यह है कि जब विश्वविद्यालय के भीतर प्रशासनिक खींचतान और फैसलों पर लगातार विवाद हो, तो गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और छात्रों का भविष्य आखिर कैसे सुरक्षित रहेगा? इसी बीच अब विश्वविद्यालय की कमान अपर मुख्य सचिव (उच्च शिक्षा) IAS अनुपम राजन को सौंपी गई है।
शिक्षा से ज्यादा फैसलों की लड़ाई?
बरकतउल्ला विश्वविद्यालय ( Barkatullah University) भोपाल में पिछले कुछ महीनों के घटनाक्रम ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। कभी संबद्धता का फैसला बदला गया, कभी प्रवेश प्रक्रिया विवादों में आई और अब परीक्षाओं को लेकर भी अनिश्चितता बनी हुई है। इन परिस्थितियों में सबसे अधिक परेशानी छात्रों को झेलनी पड़ रही है, जिनका पूरा शैक्षणिक कैलेंडर प्रभावित हो रहा है।
मंत्री को खुद मैदान में उतरना पड़ा
पूर्व कुलगुरु प्रो. एसके जैन के कार्यकाल में परीक्षा व्यवस्था, प्रशासनिक फैसलों और संविदा शिक्षकों की नियुक्ति जैसे मुद्दों पर लगातार विवाद सामने आए। स्थिति इतनी गंभीर हुई कि उच्च शिक्षा मंत्री इंदर सिंह परमार स्वयं विश्वविद्यालय पहुंचे। उन्होंने अधिकारियों, शिक्षकों और छात्र प्रतिनिधियों से चर्चा कर व्यवस्था सुधारने के निर्देश दिए। इसके कुछ समय बाद प्रो. एस.के. जैन ने पद छोड़ दिया।
एक गए, दूसरे आए पर नहीं रुके विवाद
19 जून को प्रो. विवेक शर्मा को प्रभारी कुलगुरु बनाया गया। उम्मीद थी कि हालात सामान्य होंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। बीएड कॉलेजों की संबद्धता को लेकर पहले एक फैसला हुआ, फिर शिकायतों के बाद उसे बदल दिया गया। मामला राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (एनसीटीई) तक पहुंच गया, जहां जांच शुरू हो चुकी है।
लगातार बढ़ते विवादों के बीच प्रो. विवेक शर्मा ने भी पद छोड़ दिया। इसके बाद नियमित कुलगुरु की नियुक्ति तक अपर मुख्य सचिव अनुपम राजन को जिम्मेदारी सौंपी गई।
प्रवेश प्रक्रिया भी बनी विवाद की वजह
बीबीए और एमबीए कॉलेजों की प्रवेश प्रक्रिया भी सवालों के घेरे में आ गई। आरोप लगे कि अंतिम मंजूरी से पहले ही कॉलेजों की सूची तकनीकी शिक्षा संचालनालय को भेज दी गई।
बाद में निर्णय बदलने से 71 कॉलेज पहले चरण की काउंसलिंग से बाहर हो गए, जिससे 19,260 सीटों पर प्रवेश प्रभावित होने की स्थिति बन गई। सबसे ज्यादा चिंता उन छात्रों की बढ़ी, जो प्रवेश प्रक्रिया पूरी होने का इंतजार कर रहे थे।
अब परीक्षा पर भी मंडरा रहा संशय
27 जुलाई से प्रस्तावित बीएड परीक्षाओं को लेकर भी स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। सूत्रों के अनुसार उत्तरपुस्तिकाओं की छपाई समय पर पूरी नहीं हो सकी है।
यदि व्यवस्था समय पर नहीं बनी तो परीक्षा कार्यक्रम में बदलाव की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता। हालांकि, विश्वविद्यालय की ओर से इस संबंध में कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है।
अनुपम राजन के सामने बड़ी चुनौती क्या?
अब विश्वविद्यालय की जिम्मेदारी अपर मुख्य सचिव अनुपम राजन के पास है। उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल प्रशासन संभालना नहीं, बल्कि छात्रों का भरोसा लौटाना, लंबित फैसलों को पारदर्शी तरीके से निपटाना और विश्वविद्यालय की शैक्षणिक व्यवस्था को फिर से पटरी पर लाना भी होगी।
सबसे बड़ा सवाल
विश्वविद्यालय केवल इमारतों से नहीं, बल्कि भरोसे से चलता है। यदि फैसले लगातार बदलते रहें, प्रशासनिक अस्थिरता बनी रहे और छात्र भविष्य को लेकर असमंजस में रहें, तो उच्च शिक्षा की गुणवत्ता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। अब निगाहें इस बात पर हैं कि नई प्रशासनिक व्यवस्था इन विवादों पर विराम लगा पाती है या नहीं।
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