लंदन में रखी प्रतिमा ही भोजशाला की वाग्देवी, हुई पुष्टि, वापसी की प्रक्रिया तेज
समझें क्या है पूरा मामला...
- भोजशाला की वाग्देवी प्रतिमा भारत वापस लाने की प्रक्रिया तेज हुई है।
- लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम में प्रतिमा की लीगल वेरिफिकेशन पूरी हो गई है।
- पुष्टि हुई कि यह मूल वाग्देवी यानी सरस्वती प्रतिमा ही है।
- भोपाल में आज से ब्रिक्स सांस्कृतिक कार्य समूह की बैठक शुरू हो रही है।
- जून में हुई आरटीआई में एएसआई ने कोई रिकॉर्ड होने से इनकार किया था।
मध्यप्रदेश की ऐतिहासिक भोजशाला से जुड़ी वाग्देवी प्रतिमा को भारत वापस लाने की कोशिशों को बड़ी कामयाबी मिली है। केंद्रीय संस्कृति सचिव विवेक अग्रवाल ने मंगलवार को यह जानकारी दी। उन्होंने बताया कि लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम में रखी प्रतिमा की लीगल वेरिफिकेशन पूरी हो चुकी है। जांच में पुष्टि हुई है कि यह वही मूल वाग्देवी प्रतिमा है, जो भोजशाला से जुड़ी है। यह जानकारी उन्होंने भोपाल में ब्रिक्स सांस्कृतिक कार्य समूह की बैठक से पहले दी।
लीगल वेरिफिकेशन पूरी
संस्कृति सचिव ने बताया कि ब्रिटिश म्यूजियम में मौजूद प्रतिमा की जांच लंबे समय से चल रही थी। अब यह साफ हो गया है कि यह प्रतिमा असली वाग्देवी यानी सरस्वती की ही है। इस पुष्टि के बाद भारत की दावेदारी और मजबूत हो गई है। इसे कानूनी आधार पर वापस लाने का रास्ता अब साफ माना जा रहा है। यह जांच की सबसे बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है।
राजनयिक स्तर पर प्रक्रिया तेज
संस्कृति सचिव ने कहा कि प्रतिमा को भारत लाने के लिए अब राजनयिक स्तर पर प्रक्रिया तेज कर दी गई है। केंद्र सरकार, भारतीय राजनयिक मिशन और ब्रिटिश म्यूजियम के बीच कानूनी बातचीत आगे बढ़ाई गई है।
मंत्रालय के एएस यानी एडिशनल सेक्रेटरी (Additional Secretary) शिवशेखर शुक्ला ने पदभार संभालने के बाद इस पहल को शुरू किया था। उनकी पहल के बाद ही यह मामला फिर सक्रिय हुआ। अब इसमें कई विभाग मिलकर काम कर रहे हैं।
ब्रिक्स बैठक आज से भोपाल में
भोपाल में आज से 8 अगस्त तक ब्रिक्स यानी BRICS सांस्कृतिक कार्य समूह की बैठक हो रही है। इसमें सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण पर चर्चा होगी। चोरी हुई धरोहरों की वापसी का मुद्दा भी एजेंडे में शामिल है।
डिजिटल सांस्कृतिक सहयोग और यूनेस्को में संयुक्त बहुराष्ट्रीय नामांकन पर भी बातचीत होगी। वाग्देवी प्रतिमा का मामला इसी बड़े एजेंडे से जुड़ा माना जा रहा है। यह बैठक मध्यप्रदेश के लिए भी अहम अवसर है।
पहले क्या कहा था RTI ने
यह खबर ऐसे वक्त आई है जब कुछ हफ्ते पहले ही एक आरटीआई यानी सूचना के अधिकार (Right to Information) से अलग तस्वीर सामने आई थी। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण यानी एएसआई (Archaeological Survey of India) ने जवाब में कहा था कि प्रतिमा वापसी को लेकर कोई पत्र-व्यवहार नहीं हुआ।
एएसआई के भोपाल सर्कल ने साफ किया था कि इस विषय पर कोई दस्तावेज मौजूद नहीं है। उस जवाब से सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच फासला उजागर हुआ था। अब संस्कृति सचिव के बयान से स्थिति में बड़ा बदलाव दिख रहा है।
मूर्ति का इतिहास
वाग्देवी की यह प्रतिमा 11वीं सदी की मानी जाती है। इसका संबंध राजा भोज के काल से जोड़ा जाता है। साल 1875 में धार के भोजशाला परिसर के पास खुदाई में यह मूर्ति मिली थी। इसके पांच साल बाद 1880 में एक ब्रिटिश अधिकारी इसे इंग्लैंड ले गया। बाद में यह प्रतिमा लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम का हिस्सा बन गई। यह मुद्दा साल 2003 में संसद में भी उठ चुका है।
पहले भी उठी थी मांग
साल 2022 में मध्यप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी प्रतिमा वापसी की कोशिश का भरोसा दिलाया था। इसी साल मई में मध्यप्रदेश हाई कोर्ट ने भोजशाला को देवी सरस्वती का मंदिर माना था।
कोर्ट ने केंद्र सरकार को प्रतिमा वापसी पर विचार करने का सुझाव भी दिया था। इसके बाद हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस ने प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री मोहन यादव को पत्र भी लिखा था। संगठन का कहना था कि यह प्रतिमा करोड़ों लोगों की आस्था का प्रतीक है।
आगे क्या होगा
लीगल वेरिफिकेशन पूरी होने के बाद अगला कदम राजनयिक बातचीत का माना जा रहा है। संस्कृति मंत्रालय की कोशिश है कि प्रतिमा जल्द भारत वापस लाई जाए। ब्रिक्स बैठक में भी चोरी धरोहरों की वापसी पर बनी सहमति इस मामले में मददगार हो सकती है। धार के भोजशाला से जुड़े श्रद्धालुओं को अब वापसी की नई उम्मीद जगी है। आने वाले दिनों में इस मामले पर और स्पष्टता आने की उम्मीद है।
FAQ
- भोजशाला की वाग्देवी मूर्ति क्या है और यह लंदन कैसे पहुंची?
वाग्देवी यानी देवी सरस्वती की यह मूर्ति 11वीं सदी की मानी जाती है और इसका संबंध राजा भोज के काल से है। साल 1875 में धार के भोजशाला परिसर के पास खुदाई में यह मिली थी। इसके बाद 1880 में एक ब्रिटिश अधिकारी इसे इंग्लैंड ले गया। अब यह लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम में रखी हुई है।
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