चित्रकूट में 500 पांडुलिपियां मिलीं, उर्दू पांडुलिपि में श्रीकृष्ण के कालिया मर्दन का मिला वर्णन
News in Short
- चित्रकूट में सर्वेक्षण के दौरान 500 से ज्यादा पांडुलिपियां मिली हैं।
- एक उर्दू पांडुलिपि में श्रीकृष्ण के कालिया मर्दन का चित्र और वर्णन है।
- इन पांडुलिपियों में महाभारत, रामायण काल की देवनागरी लिपि की पांडुलिपियां भी हैं।
- केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय ज्ञान भारतम मिशन के तहत इन्हें डिजिटल करेगा।
- तीन चरणों में खोज, पहचान, फोटोग्राफी और डिजिटलाइजेशन का काम होगा।
News In Detail
धार्मिक नगरी चित्रकूट क्षेत्र में किए गए सर्वेक्षण के दौरान 500 से अधिक अहम पांडुलिपियां मिली हैं। यह खोज इसलिए खास है क्योंकि इनमें से अधिकांश पांडुलिपियां देवनागरी और संस्कृत में हैं, लेकिन कुछ उर्दू लिपि में भी हैं।
इनमें से एक उर्दू पांडुलिपि बेहद खास है। इसमें भगवान श्रीकृष्ण को कालिया मर्दन करते हुए दिखाया गया है। इसके साथ ही तुलसीदास और भगवान गणेश का भी उल्लेख इन पांडुलिपियों में मिला है।
उर्दू में धार्मिक ग्रंथ, यह क्यों है खास?
आमतौर पर लोग सोचते हैं कि हिंदू धर्म के ग्रंथ केवल संस्कृत या देवनागरी में लिखे गए होंगे। वहीं, चित्रकूट की यह खोज उस सोच को बदलती है। उर्दू लिपि में लिखी पांडुलिपि में श्रीकृष्ण की कथा का होना भारत की साझा सांस्कृतिक विरासत का प्रमाण है।
यह दिखाता है कि सदियों पहले भी भाषा और लिपि की सीमाएं ज्ञान को नहीं रोकती थीं। विद्वानों ने जो जरूरी समझा, उसे जिस भी लिपि में संभव हुआ, उसमें लिखा।
पोथी सतनाम की उर्दू पांडुलिपि
एक पांडुलिपि मुंशी नवल किशोर प्रेस द्वारा प्रकाशित धार्मिक पुस्तक पोथी सतनाम का अंश है। यह पूरी तरह उर्दू लिपि में लिखी हुई है। इसमें मंगलाचरण, दोहा, चौपाई के साथ-साथ भगवान श्रीकृष्ण के कालिया मर्दन का चित्र और तुलसीदास तथा भगवान गणेश का चित्र भी अंकित है। यह पांडुलिपि इस बात की मिसाल है कि उर्दू भाषा भी कभी हिंदू धार्मिक ज्ञान की वाहक रही है।
महाभारत और रामायण काल की पांडुलिपियां भी
तुलसी शोध संस्थान के प्रबंधक ओम प्रकाश पटेल ने बताया कि चित्रकूट में रामचरितमानस की हस्तलिखित पांडुलिपियों के साथ-साथ रामायणकालीन और महाभारतकालीन देवनागरी लिपि की पांडुलिपियां भी सुरक्षित हैं। इनमें से कई आज भी अच्छी स्थिति में हैं जबकि कुछ जीर्ण-शीर्ण हो चुकी हैं।
संस्कृति विभाग ने 350 पांडुलिपियां चित्रकूट के तुलसी शोध संस्थान में जमा कराई हैं। भारत सरकार इन पांडुलिपियों को तीन माह बाद डिजिटल करने की प्रक्रिया में लगेगी।
ज्ञान भारतम मिशन: तीन चरणों में होगा काम
केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय ने ज्ञान भारतम मिशन (Gyan Bharatam Mission) के पहले चरण की शुरुआत 16 मार्च से की है। यह अभियान तीन महीने तक चलेगा।
पहले चरण में देशभर में प्राचीन पांडुलिपियों की खोज, पहचान और दस्तावेजीकरण होगा। इसका मकसद भारत की समृद्ध ज्ञान परंपरा को फिर से सामने लाना और आम जनमानस तक पहुंचाना है।
दूसरे चरण में देशभर में मौजूद पांडुलिपियों की फोटोग्राफी होगी और उन्हें डिजिटलाइज किया जाएगा। तीसरे चरण में जहां भी यह पांडुलिपियां मिलेंगी, वहां विशेषज्ञ भेजकर उन्हें संरक्षित करने और उनका अर्थ समझाने का काम होगा।
75 साल पुरानी पांडुलिपियां भी होंगी सुरक्षित
मिशन के तहत 75 वर्ष से अधिक पुरानी पांडुलिपियों को संरक्षित करने और उन्हें भविष्य के लिए डिजिटल रूप में सुरक्षित करने का प्रयास किया जा रहा है। यह कदम इसलिए जरूरी है क्योंकि कई पांडुलिपियां जीर्ण-शीर्ण हो रही हैं और उनके नष्ट होने का खतरा बना हुआ है।
ज्ञान भारतम ऐप से आप भी कर सकते हैं अपलोड
संस्कृति मंत्रालय, दिल्ली के संस्कृतिक स्रोत एवं प्रशिक्षण केंद्र के क्षेत्राधिकारी चंद्रमौली त्रिपाठी ने बताया कि पहले चरण में ज्ञान भारतम ऐप को आम जनमानस के लिए खोल दिया गया है। यदि किसी के पास कोई पुरानी पांडुलिपि है तो वह इस ऐप में लॉग इन करके उसकी फोटो अपलोड कर सकता है।
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