दमोह कलेक्टर के बेडरूम की रहस्यमयी दराज में दफन था राज, पांच साल बाद हुआ खुलासा
दमोह कलेक्टर के बंगले के एक कमरे में पांच सालों से खामोश पड़ा एक मोबाइल अचानक सामने आया और यह मामला प्रशासनिक महकमे में चर्चा का विषय बन गया।
यह कहानी शुरू होती है कलेक्टर आईएएस प्रताप नारायण यादव के बेडरूम से। वे कमरे में थे, तभी उनकी नजर पलंग के पास बनी दराज पर पड़ी। उन्होंने दराज खोली तो उसमें मोबाइल फोन रखा था। यह कोई सामान्य बात नहीं थी। जिस बंगले में जिले का सर्वोच्च प्रशासनिक अधिकारी रहता हो, वहां किसी अज्ञात मोबाइल का मिलना स्वाभाविक रूप से चिंता बढ़ाने वाला था।
यहां पहला सवाल यही था कि आखिर यह मोबाइल किसका है? मोबाइल बंद था। हाल के दिनों में कलेक्ट्रेट की गोपनीय जानकारियां बाहर पहुंचने और कथित जासूसी जैसे मामले सामने आ चुके थे। ऐसे में आशंका यह भी बनी कि कहीं यह कोई सुरक्षा से जुड़ा मामला तो नहीं। बंगले में मिला यह फोन किसी बड़ी कहानी का हिस्सा तो नहीं है?
जांच के बाद जैसे ही फोन खुला...
मामले की गंभीरता को देखते हुए मोबाइल की तकनीकी जांच कराई गई। उसे चार्ज किया गया और चालू करने की कोशिश की गई। फोन जैसे ही खुला, उसके भीतर छिपा रहस्य धीरे-धीरे सामने आने लगा।
सबसे पहले वर्तमान कलेक्टर ने पूर्व कलेक्टर सुधीर कुमार कोचर से संपर्क किया। उन्हें मोबाइल के बारे में बताया, लेकिन उन्होंने कहा कि यह उनका फोन नहीं है। इसके बाद मोबाइल में मौजूद जानकारी और तस्वीरों के आधार पर पड़ताल आगे बढ़ाई गई।
इस तरह हुई मोबाइल की पहचान
फोन में एक बच्ची की तस्वीर दिखाई दी। सुराग मिला तो मोबाइल की तस्वीर अलग-अलग पूर्व कलेक्टरों को भेजी गई। कुछ देर बाद जवाब आया और रहस्य से पर्दा उठ गया। यह मोबाइल किसी कर्मचारी, सुरक्षा कर्मी या आगंतुक का नहीं, बल्कि दमोह के पूर्व कलेक्टर और आईएएस अधिकारी एस.कृष्ण चैतन्य का निकला।
सबसे दिलचस्प बात यह रही कि मोबाइल की पहचान खुद चैतन्य ने की। जब उन्हें फोन की तस्वीर भेजी गई तो वे भी हैरान रह गए। उन्हें याद था कि यह उनका वैकल्पिक उपयोग वाला मोबाइल था, लेकिन यह कहां और कब गायब हुआ, इसकी उन्हें कोई जानकारी नहीं थी।
2021 में पदस्थ हुए थे चैतन्य
आईएएस एस कृष्ण चैतन्य ने बताया कि मोबाइल खो जाने के बाद उन्होंने सिम बंद करवा दी थी और दूसरी सिम निकलवा ली थी। उन्हें अंदाजा भी नहीं था कि उनका फोन पांच साल तक कलेक्टर बंगले की एक दराज में सुरक्षित पड़ा रहेगा।
आपको बता दें कि एस.कृष्ण चैतन्य की दमोह में पदस्थापना 8 मई 2021 को हुई थी। उनका तबादला 6 अप्रैल 2023 को हो गया। इसके बाद बंगले में आईएएस मयंक अग्रवाल रहे। फिर मार्च 2024 से अप्रैल 2026 तक आईएएस सुधीर कुमार कोचर वहां रहे। यानी एक नहीं, दो-दो कलेक्टर उसी बंगले में रहकर चले गए, लेकिन किसी की नजर उस दराज में रखे मोबाइल पर नहीं पड़ी।
कलेक्ट्रेट में हो रही थी जासूसी
इस घटनाक्रम ने इसलिए भी लोगों का ध्यान खींचा है, क्योंकि कुछ ही दिन पहले दमोह कलेक्ट्रेट में गोपनीय सूचनाएं बाहर पहुंचने का मामला सामने आया था। आरोप था कि कलेक्टर की गुप्त योजनाओं और औचक निरीक्षणों की जानकारी दफ्तर से ही संबंधित विभागों तक पहुंच रही थी। जांच के बाद एक कर्मचारी को निलंबित किया गया था। वहीं दो अन्य कर्मचारियों को उनके मूल विभाग वापस भेजा गया था।
इसलिए सनसनी की वजह बना मोबाइल
ऐसे माहौल में कलेक्टर बंगले से एक अज्ञात मोबाइल का निकलना स्वाभाविक रूप से सनसनी का कारण बना। शुरुआती पड़ताल में इसे सुरक्षा और गोपनीयता से जोड़कर भी देखा गया। हालांकि जांच आगे बढ़ी तो कहानी किसी साजिश की नहीं, बल्कि भूले-बिसरे मोबाइल की निकली, जो वर्षों तक एक दराज में चुपचाप पड़ा रहा। अब यह मामला लोगों के बीच कौतूहल का विषय बना हुआ है।
ये खबरें भी पढ़ें...
आईएएस संतोष वर्मा को चौथे फेज में भी नहीं मिलेगी मसूरी ट्रेनिंग की अनुमति! जानें वजह
MP के 46 आईएएस अफसर जाएंगे मसूरी, विवादित बयान देने वाले संतोष वर्मा भी शामिल
भ्रष्टाचार पर सरकार का बड़ा कदम, 1 आईएएस सहित 103 अफसर निलंबित, 6 बर्खास्त
IAS संतोष वर्मा से जुड़े केस में निलंबित जज अमन सिंह भूरिया गिरफ्तार