एमपी के जंगल में डूबने का खतरा, वन विभाग की दोगुनी गश्त पर बड़ा सवाल
समझें क्या है पूरा मामला
- मध्यप्रदेश के जंगलों में बारिश से जलस्तर बढ़ रहा है।
- कई वन क्षेत्रों के नदी-नाले तेज बहाव पर हैं।
- वन विभाग ने पैदल गश्त दोगुनी करने का दावा किया।
- जलभराव और कटे रास्तों से वन्यजीवों पर खतरा बढ़ा है।
- बदलती वन्यजीव आवाजाही के लिए ठोस तैयारी जरूरी है।
सिर्फ गश्त से सुरक्षा पर सवाल
मध्य प्रदेश में भारी बारिश से जंगलों के नदी-नालों और निचले इलाकों में जलस्तर बढ़ रहा है। विभाग ने पैदल गश्त दोगुनी कर दी, लेकिन सवाल है कि सिर्फ गश्त बढ़ाने से बाढ़ के बीच वन्यजीवों और उनके ठिकानों की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित होगी? MP के जंगलों में बारिश के बीच जलस्तर बढ़ रहा है। वन विभाग ने पैदल गश्त दोगुनी की है, लेकिन असली सवाल यह है कि जलभराव, कटे वन मार्ग और बदलती वन्यजीव आवाजाही से निपटने की ठोस तैयारी क्या है?
गश्त दोगुनी, तैयारी कितनी?
वन विभाग का दावा है कि बारिश को देखते हुए निगरानी बढ़ाई गई है। लेकिन सवाल निगरानी की मात्रा का नहीं, उसकी क्षमता का है। अगर तेज बहाव किसी वन मार्ग को काट देता है, नाला अचानक उफन जाता है या कोई वन्यजीव सुरक्षित जगह की तलाश में अपना रास्ता बदल देता है, तो पैदल गश्त करने वाला अमला कितनी जल्दी मौके तक पहुंच पाएगा? यही वह सवाल है जो सामान्य बारिश की खबर को एक गंभीर वन्यजीव सुरक्षा मुद्दे में बदल देता है।
खतरा सिर्फ पानी का नहीं है
भारी बारिश के दौरान सबसे पहले छोटे नाले, कच्चे रास्ते और निचले वन क्षेत्र प्रभावित हो सकते हैं। ऐसे रास्ते कटने से वन अमले की सामान्य आवाजाही भी मुश्किल हो सकती है। दूसरी तरफ पानी बढ़ने पर हिरण, चीतल, सांभर और जंगली सूअर ऊंचे इलाकों की ओर जा सकते हैं। बाघ और तेंदुए भी अपनी गतिविधियों का क्षेत्र बदल सकते हैं। यानी खतरा सिर्फ जंगल में पानी भरने का नहीं, बल्कि वन्यजीवों के रास्ते बदलने और इंसानी बस्तियों की तरफ बढ़ने का भी है।
असली परीक्षा अब शुरू होगी
मंडला, डिंडोरी, बालाघाट, सिवनी, जबलपुर, शहडोल, अनूपपुर, उमरिया, रीवा, सीधी और सिंगरौली जैसे इलाकों में बारिश के कारण नदी-नालों का जलस्तर बढ़ने की स्थिति बताई गई है। ऐसे में सिर्फ गश्त बढ़ाना पर्याप्त है या नहीं, यह आने वाले दिनों में साफ होगा। जरूरत जलस्तर की लगातार निगरानी, संवेदनशील रास्तों की पहचान और वन्यजीवों की बदलती गतिविधियों पर तत्काल प्रतिक्रिया की है।
नुकसान नहीं हुआ, लेकिन सवाल खत्म नहीं
अभी तक किसी वन्यजीव अभयारण्य या नेशनल पार्क में जलभराव से नुकसान की सूचना नहीं है। यह राहत की बात है। लेकिन नुकसान नहीं होना और जोखिम नहीं होना, दोनों अलग बातें हैं। मानसून अभी सक्रिय है और अचानक बढ़ा पानी परिस्थितियों को कुछ घंटों में बदल सकता है।
वन्यजीव सुरक्षा सिर्फ जंगल में कर्मचारी भेजने से पूरी नहीं होती। सवाल यह है कि आपदा की स्थिति में विभाग के पास जलस्तर की रियल-टाइम जानकारी, सुरक्षित वैकल्पिक मार्ग और वन्यजीवों की आपात निगरानी की कितनी प्रभावी व्यवस्था है? यही व्यवस्था तय करेगी कि इस मानसून में दोगुनी गश्त सिर्फ कागज पर बढ़ी हुई कार्रवाई साबित होती है या वास्तव में जंगल और वन्यजीवों के लिए सुरक्षा कवच बनती है।
ये भी पढ़ें...
सितंबर में एमपी आएंगे राहुल गांधी, संभागीय सम्मेलन से संगठन की नब्ज टटोलेंगे
एमपी में बिजली सुधार पर करोड़ों खर्च, फिर भी लॉस बढ़ने का अनुमान क्यों
ग्वालियर की सब्जी मंडी होगी शिफ्ट? व्यापारियों की मांग पर साडा ने खोले रास्ते
Top News: खबरें काम की... मुंबई में लैंडस्लाइड से सात की मौत