एमपी में बिजली सुधार पर करोड़ों खर्च, फिर भी लॉस बढ़ने का अनुमान क्यों
Ramanand Tiwari | Aug 12, 2026, 22:36 IST
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मध्य प्रदेश में बिजली नेटवर्क मजबूत करने पर बड़ा निवेश हो रहा है, लेकिन 2027 से अगले पांच साल के लिए वितरण हानि बढ़ाने का प्रोजेक्शन सामने आया है। यही विरोधाभास अब नए टैरिफ की प्रक्रिया में बड़ा सवाल बन गया है।
मध्य प्रदेश में बिजली व्यवस्था को आधुनिक बनाने पर हजारों करोड़ रुपए खर्च हो रहे हैं। स्मार्ट मीटर से लेकर नई लाइन और ट्रांसफार्मर तक लगाए जा रहे हैं। लेकिन इसी बीच अगले पांच साल में बिजली वितरण हानि बढ़ने का अनुमान सामने आया है। पूर्व क्षेत्र के लिए 23% और मध्य क्षेत्र के लिए 24.5% तक लॉस का प्रोजेक्शन अब पूरी टैरिफ प्रक्रिया पर सवाल खड़ा कर रहा है।
मामला सिर्फ इतना नहीं है कि बिजली कंपनियों ने लाइन लॉस का नया आंकड़ा प्रस्तावित कर दिया है। असली सवाल यह है कि जब नेटवर्क सुधारने और नुकसान घटाने के नाम पर लगातार निवेश हो रहा है, तब भविष्य की गणना में नुकसान का स्तर इतना ज्यादा क्यों रखा गया?
यही सवाल आने वाले मल्टी ईयर टैरिफ की बहस का सबसे अहम हिस्सा बन सकता है।
मध्य प्रदेश पावर मैनेजमेंट कंपनी ने मध्य क्षेत्र और पूर्व क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनियों के लिए अगले पांच वर्षों का वितरण हानि प्रोजेक्शन विद्युत नियामक आयोग के सामने रखा है।
प्रस्ताव के मुताबिक पूर्व क्षेत्र में वितरण हानि करीब 14% से बढ़ाकर 23% तक रखने का अनुमान है। वहीं मध्य क्षेत्र के लिए यह स्तर 24.5% तक पहुंच सकता है।
यह ध्यान रखना जरूरी है कि ये अभी प्रस्तावित अनुमान हैं। अंतिम आंकड़ा नियामक आयोग ही तय करेगा।
बिजली वितरण नेटवर्क को मजबूत करने के लिए स्मार्ट मीटरिंग, नई बिजली लाइनें, ट्रांसफार्मर क्षमता बढ़ाने और नेटवर्क अपग्रेड जैसे काम चल रहे हैं।
ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि इन योजनाओं का असर आने वाले वर्षों में लाइन लॉस पर कितना दिखेगा।
अगर निवेश का बड़ा उद्देश्य बिजली वितरण में होने वाले नुकसान को कम करना है, तो भविष्य के प्रोजेक्शन में बढ़ा हुआ लॉस किस आधार पर रखा गया है? यही वह बिंदु है, जिस पर उपभोक्ता और बिजली क्षेत्र के जानकार आयोग के सामने सवाल उठा सकते हैं।
लाइन लॉस को केवल बिजली के तारों में होने वाली तकनीकी क्षति मानना अधूरा होगा।
इसमें तकनीकी और वाणिज्यिक दोनों तरह की हानि शामिल होती है। पुरानी लाइनें, ओवरलोडिंग और ट्रांसफार्मर की क्षमता से जुड़ी समस्याएं तकनीकी नुकसान बढ़ाती हैं।
दूसरी तरफ बिजली चोरी, गलत मीटरिंग, बिलिंग की गड़बड़ी और कमजोर वसूली जैसी वजहें वाणिज्यिक नुकसान बढ़ा सकती हैं।
यानी स्मार्ट मीटर लगाने के साथ बिजली चोरी रोकना और बिलिंग-वसूली सुधारना भी उतना ही जरूरी है।
क्या इसका मतलब
यहां तस्वीर थोड़ी अलग है। लाइन लॉस का अनुमान 23% या 24.5% होने का मतलब यह नहीं है कि उपभोक्ता का बिजली बिल भी उतने प्रतिशत बढ़ जाएगा।
टैरिफ तय करते समय बिजली खरीद लागत, ट्रांसमिशन शुल्क, वितरण खर्च, संचालन, रखरखाव, पूंजीगत निवेश और कंपनियों की राजस्व जरूरत समेत कई पहलुओं को देखा जाता है।
इसलिए लाइन लॉस और बिजली दर के बीच सीधा एक-से-एक संबंध नहीं है। लेकिन अगर ज्यादा वितरण हानि को लागत की गणना में स्वीकार किया जाता है, तो कंपनियों की कुल राजस्व जरूरत प्रभावित हो सकती है। यही वजह है कि इसका अप्रत्यक्ष असर उपभोक्ताओं की जेब पर पड़ने की संभावना को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता।
मध्य प्रदेश विद्युत नियामक आयोग ने प्रस्तावित मल्टी ईयर टैरिफ नियमों और शर्तों पर उपभोक्ताओं से 1 सितंबर तक आपत्ति और सुझाव मांगे हैं।
यानी अब गेंद केवल बिजली कंपनियों के पाले में नहीं है। उपभोक्ता और अन्य हितधारक यह सवाल उठा सकते हैं कि अगले पांच वर्षों में वितरण हानि बढ़ने का आधार क्या है और इसे घटाने की ठोस कार्ययोजना क्या है।
मप्र पावर मैनेजमेंट कंपनी के सीजीएम रेवेन्यू शैलेंद्र सक्सेना के अनुसार, प्रोजेक्शन वास्तविक स्थिति के आसपास के आंकड़ों के आधार पर दिया गया है और वितरण हानि कम करने के लिए लगातार काम किया जा रहा है।
केंद्र सरकार की आरडीएसएस योजना भी वितरण नेटवर्क को मजबूत करने और बिजली हानि घटाने के उद्देश्य से चल रही है। इसकी अवधि 31 मार्च 2028 तक बढ़ाई गई है।
फिलहाल इसे बिजली दर बढ़ने का फैसला नहीं माना जा सकता। यह केवल प्रस्ताव है।
1 सितंबर तक मिलने वाली आपत्तियों और सुझावों के बाद विद्युत नियामक आयोग आंकड़ों की समीक्षा करेगा। इसके बाद तय होगा कि कितना वितरण हानि स्तर स्वीकार किया जाता है और उसका टैरिफ पर क्या प्रभाव पड़ता है।
इसलिए अप्रैल 2027 से लागू होने वाले नए टैरिफ की असली तस्वीर अंतिम आदेश के बाद ही सामने आएगी।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है-जब बिजली व्यवस्था सुधारने पर इतना निवेश हो रहा है, तो अगले पांच साल में लाइन लॉस घटने के बजाय बढ़ने का अनुमान क्यों लगाया गया? यही सवाल अब बिजली टैरिफ की पूरी प्रक्रिया का सबसे दिलचस्प और निर्णायक मुद्दा बन गया है।
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असली सवाल निवेश का नहीं, नतीजे का है
यही सवाल आने वाले मल्टी ईयर टैरिफ की बहस का सबसे अहम हिस्सा बन सकता है।
मध्य प्रदेश पावर मैनेजमेंट कंपनी ने मध्य क्षेत्र और पूर्व क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनियों के लिए अगले पांच वर्षों का वितरण हानि प्रोजेक्शन विद्युत नियामक आयोग के सामने रखा है।
प्रस्ताव के मुताबिक पूर्व क्षेत्र में वितरण हानि करीब 14% से बढ़ाकर 23% तक रखने का अनुमान है। वहीं मध्य क्षेत्र के लिए यह स्तर 24.5% तक पहुंच सकता है।
यह ध्यान रखना जरूरी है कि ये अभी प्रस्तावित अनुमान हैं। अंतिम आंकड़ा नियामक आयोग ही तय करेगा।
हजारों करोड़ का निवेश, फिर लॉस का अनुमान क्यों?
ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि इन योजनाओं का असर आने वाले वर्षों में लाइन लॉस पर कितना दिखेगा।
अगर निवेश का बड़ा उद्देश्य बिजली वितरण में होने वाले नुकसान को कम करना है, तो भविष्य के प्रोजेक्शन में बढ़ा हुआ लॉस किस आधार पर रखा गया है? यही वह बिंदु है, जिस पर उपभोक्ता और बिजली क्षेत्र के जानकार आयोग के सामने सवाल उठा सकते हैं।
लाइन लॉस सिर्फ तारों में बिजली का नुकसान नहीं
इसमें तकनीकी और वाणिज्यिक दोनों तरह की हानि शामिल होती है। पुरानी लाइनें, ओवरलोडिंग और ट्रांसफार्मर की क्षमता से जुड़ी समस्याएं तकनीकी नुकसान बढ़ाती हैं।
दूसरी तरफ बिजली चोरी, गलत मीटरिंग, बिलिंग की गड़बड़ी और कमजोर वसूली जैसी वजहें वाणिज्यिक नुकसान बढ़ा सकती हैं।
यानी स्मार्ट मीटर लगाने के साथ बिजली चोरी रोकना और बिलिंग-वसूली सुधारना भी उतना ही जरूरी है।
क्या इसका मतलब बिजली बिल बढ़ना है?
टैरिफ तय करते समय बिजली खरीद लागत, ट्रांसमिशन शुल्क, वितरण खर्च, संचालन, रखरखाव, पूंजीगत निवेश और कंपनियों की राजस्व जरूरत समेत कई पहलुओं को देखा जाता है।
इसलिए लाइन लॉस और बिजली दर के बीच सीधा एक-से-एक संबंध नहीं है। लेकिन अगर ज्यादा वितरण हानि को लागत की गणना में स्वीकार किया जाता है, तो कंपनियों की कुल राजस्व जरूरत प्रभावित हो सकती है। यही वजह है कि इसका अप्रत्यक्ष असर उपभोक्ताओं की जेब पर पड़ने की संभावना को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता।
अब उपभोक्ताओं के पास सवाल उठाने का मौका
यानी अब गेंद केवल बिजली कंपनियों के पाले में नहीं है। उपभोक्ता और अन्य हितधारक यह सवाल उठा सकते हैं कि अगले पांच वर्षों में वितरण हानि बढ़ने का आधार क्या है और इसे घटाने की ठोस कार्ययोजना क्या है।
कंपनी का तर्क: वास्तविक स्थिति के करीब आंकड़े
केंद्र सरकार की आरडीएसएस योजना भी वितरण नेटवर्क को मजबूत करने और बिजली हानि घटाने के उद्देश्य से चल रही है। इसकी अवधि 31 मार्च 2028 तक बढ़ाई गई है।
अंतिम तस्वीर अभी बाकी है
1 सितंबर तक मिलने वाली आपत्तियों और सुझावों के बाद विद्युत नियामक आयोग आंकड़ों की समीक्षा करेगा। इसके बाद तय होगा कि कितना वितरण हानि स्तर स्वीकार किया जाता है और उसका टैरिफ पर क्या प्रभाव पड़ता है।
इसलिए अप्रैल 2027 से लागू होने वाले नए टैरिफ की असली तस्वीर अंतिम आदेश के बाद ही सामने आएगी।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है-जब बिजली व्यवस्था सुधारने पर इतना निवेश हो रहा है, तो अगले पांच साल में लाइन लॉस घटने के बजाय बढ़ने का अनुमान क्यों लगाया गया? यही सवाल अब बिजली टैरिफ की पूरी प्रक्रिया का सबसे दिलचस्प और निर्णायक मुद्दा बन गया है।
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