पसीना बहाकर पैदा की फसल, अब MSP के लिए 6 सालों से कोर्ट का चक्कर काट रहे किसान
News in short
- 2018-19 में उड़द का MSP 5600 रुपए प्रति क्विंटल, मिला सिर्फ 3137 रुपए।
- 2022 में हाईकोर्ट ने 6% ब्याज सहित भुगतान का आदेश दिया।
- 300+ किसानों को मिलना है बकाया, अब तक भुगतान नहीं।
- सरकार ने भुगतान के बजाय फैसले के खिलाफ अपील दायर की।
- 28 अप्रैल को नई डिविजनल बेंच में होगी अहम सुनवाई।
News in detail
दमोह के सैकड़ों किसान आज भी अपनी 2018-19 की उड़द फसल का पूरा भुगतान पाने के लिए कोर्ट के चक्कर लगा रहे हैं। सरकार ने 2025-26 के लिए MSP 7800 रुपए तय किया है, लेकिन पुराने बकाया का भुगतान अब तक अधूरा है। हाईकोर्ट ने किसानों को राहत दी, लेकिन सरकार ने इसके खिलाफ अपील दायर की। चीफ जस्टिस की बेंच ने इस मामले में नाराजगी जताई है और अब 28 अप्रैल को बड़ा फैसला आ सकता है।
MSP के लिए लड़ाई लड़ रहे किसान
सरकार ने भले ही 2025-26 के लिए उड़द का MSP 7800 रुपए प्रति क्विंटल तय कर दिया हो, लेकिन दमोह जिले के सैकड़ों किसान आज भी 2018-19 की फसल का पूरा भुगतान पाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। उस समय तय 5600 रुपए प्रति क्विंटल के मुकाबले किसानों को महज 3137 रुपए प्रति क्विंटल मिले, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति पर गहरा असर पड़ा।
कोर्ट में सरकार की अपील पर सख्त रुख
सोमवार 20 अप्रैल को जबलपुर हाईकोर्ट चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा और जस्टिस विनय सराफ की डिविजन बेंच में इस मामले की सुनवाई हुई। कोर्ट ने सरकार द्वारा किसानों को भुगतान करने के बजाय अपील दायर करने पर नाराजगी जताई। जब सरकारी अधिवक्ता ने सिर्फ एक दिन की मोहलत मांगी, तो कोर्ट ने उसे भी अस्वीकार कर दिया।
तकनीकी वजह से टला कड़ा आदेश
कोर्ट इस मामले में सरकार के खिलाफ सख्त आदेश लिखना शुरू कर चुका था। लेकिन तभी यह तथ्य सामने आया कि डिविजन बेंच के एक सदस्य जस्टिस विनय सराफ पहले इस मामले के एक हिस्से की सुनवाई कर चुके हैं।
इस कारण मामला दूसरी बेंच में ट्रांसफर कर दिया गया और फिलहाल सरकार को राहत मिल गई। अब यह मामला 28 अप्रैल को जस्टिस विवेक रूसिया की डिविजन बेंच में सुना जाएगा।
माना जा रहा है कि इस बार कोर्ट किसानों के हक में बड़ा और स्पष्ट आदेश दे सकता है, जिससे वर्षों से लंबित भुगतान का रास्ता साफ हो सकता है।
2019 से चल रही कानूनी लड़ाई
इस विवाद की शुरुआत 2019 में हुई थी। दमोह के किसान किशन गोपाल सिंह ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। किसानों का आरोप था कि सरकार ने तय MSP के बजाय कम भुगतान किया। बाद में सरकार ने गुणवत्ता (FAQ norms) का हवाला देकर जिम्मेदारी से बचने की कोशिश की।
2022 में हाईकोर्ट का स्पष्ट आदेश
जस्टिस सुश्रुत अरविंद धर्माधिकारी की एकल पीठ ने 6 सितंबर 2022 को अपने फैसले में कहा था कि फसल की गुणवत्ता का परीक्षण खरीद के समय किया जाना चाहिए था। कोर्ट ने इसे किसानों का शोषण मानते हुए आदेश दिया कि सरकार 5600 रुपए प्रति क्विंटल के हिसाब से बकाया राशि और 6% वार्षिक ब्याज के साथ भुगतान करे।
300 से ज्यादा किसानों का बकाया अटका
इस आदेश के बाद 300 से अधिक किसानों को राहत मिलनी तय हुई थी। लेकिन सरकार ने भुगतान करने के बजाय इस फैसले के खिलाफ अपील तैयार कर दी। नतीजा यह हुआ कि किसानों को आज भी अपने हक के लिए कोर्ट के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं।
सवालों के घेरे में सरकारी व्यवस्था
यह मामला एक बड़ा सवाल खड़ा करता है। किसानों के लिए बनाई योजनाओं का लाभ पाने के लिए उन्हें न्यायालय का सहारा क्यों लेना पड़ रहा है? MSP का उद्देश्य किसानों को सुरक्षा देना है। लेकिन जब उसी के भुगतान के लिए वर्षों तक इंतजार करना पड़े, तो यह पूरी व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता है।
28 अप्रैल पर टिकी उम्मीद
अब सभी की नजरें 28 अप्रैल की सुनवाई पर टिकी हैं, जहां से यह तय होगा कि किसानों को उनका हक कब और कैसे मिलेगा। अगर कोर्ट सख्त रुख अपनाता है, तो यह फैसला न सिर्फ दमोह बल्कि पूरे प्रदेश के किसानों के लिए मिसाल बन सकता है।
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