गेहूं खरीदी के जख्म भरे नहीं, अब खाद की महंगाई ने बढ़ाई किसानों की मुश्किलें
ऐसे समझें पूरा मामला...
- एनपीके 12-32-16 में 550 रुपए प्रति बोरी बढ़ोतरी हुई।
- एनपीके 16-16-16 का दाम 325 रुपए बढ़ा।
- एनपीके 19-19-19 में सबसे ज्यादा 800 रुपए की बढ़ोतरी।
- पोटाश की कीमत 175 रुपए प्रति बोरी बढ़ गई।
- डीजल, बीज और खाद महंगे होने से खेती की लागत बढ़ी।
सरकारी रिकॉर्ड में गेहूं खरीदी को सफल और व्यवस्थित बताया जा रहा है, लेकिन खेतों से निकल रही आवाज कुछ और कहानी कह रही है। गेहूं खरीदी के दौरान सर्वर, भुगतान और व्यवस्थागत परेशानियों से जूझते किसान अब खरीफ सीजन की तैयारी में जुटे हैं।
अब खाद की कीमतों में भारी बढ़ोतरी ने उनकी चिंता कई गुना बढ़ा दी है। डीजल की महंगाई पहले से खेती की लागत बढ़ा चुकी थी, अब खाद और बीज के बढ़ते दाम किसानों की कमर तोड़ने लगे हैं।
- खरीफ सीजन शुरू होने से पहले खाद के दामों में बड़ी बढ़ोतरी।
- एनपीके खाद के रेट में 325 से 800 रुपए प्रति बोरी तक इजाफा।
- पोटाश 175 रुपए प्रति बोरी महंगा हुआ।
- 10 से 12 बैग खाद खरीदने पर किसान पर करीब 5 हजार रुपए का अतिरिक्त बोझ।
डीजल, बीज और खाद महंगे होने से खेती की लागत लगातार बढ़ रही। गेहूं खरीदी की परेशानियों से उबर नहीं पाए किसानों पर नया आर्थिक संकट।
खरीफ की तैयारी पर महंगाई का हमला
रबी फसल की कटाई और बिक्री के बाद किसान अब खरीफ सीजन की तैयारियों में लगे हैं। खेतों की जुताई, बीज और खाद की व्यवस्था के बीच अचानक बढ़े खाद के दामों ने बजट बिगाड़ दिया है। किसानों का कहना है कि खेती अब लगातार महंगी होती जा रही है, जबकि फसलों का लाभकारी मूल्य उसी अनुपात में नहीं बढ़ रहा।
खाद के नए रेट ने बढ़ाई लागत
इस बार सबसे ज्यादा असर एनपीके और पोटाश खाद पर पड़ा है। कई प्रमुख खादों के दामों में सैकड़ों रुपए की वृद्धि दर्ज की गई है।
एक एकड़ खेती में भी बढ़ गया खर्च
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार मक्के जैसी खरीफ फसल के लिए प्रति एकड़ दो बोरी यूरिया, एक बोरी एनपीके और करीब 20 किलो पोटाश की आवश्यकता होती है।
चूंकि एनपीके और पोटाश दोनों महंगे हो चुके हैं, इसलिए प्रति एकड़ लागत सीधे बढ़ेगी। किसानों का कहना है कि पहले डीजल महंगा हुआ, फिर बीजों की कीमत बढ़ी और अब खाद के दामों ने खेती को और महंगा बना दिया है।
सरकारी राहत अधूरी क्यों?
यूरिया और डीएपी के दाम फिलहाल नहीं बढ़ाए गए हैं, लेकिन किसानों की परेशानी यहीं खत्म नहीं होती। बाजार और सहकारी समितियों में डीएपी 12-32-16 की उपलब्धता को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं। कई जगह किसानों को विकल्प के रूप में दूसरी खाद लेने की सलाह दी जा रही है। यानी कीमतों का दबाव अलग और उपलब्धता की चिंता अलग।
सरकारी दावों और हकीकत में फर्क
हाल ही में गेहूं खरीदी को लेकर सरकार की ओर से रिकॉर्ड खरीद और बेहतर व्यवस्थाओं के दावे किए गए थे। दूसरी ओर कई किसानों ने सर्वर समस्या, प्रक्रिया में देरी और अन्य व्यवस्थागत चुनौतियों की शिकायत की थी।
अब खरीफ सीजन शुरू होने से पहले खाद की महंगाई ने किसानों के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है। सवाल यह है कि यदि लागत लगातार बढ़ती रही तो खेती लाभ का सौदा कैसे बनेगी?
किसानों का दर्द
किसान हर्ष शर्मा का कहना है कि महंगाई लगातार बढ़ रही है। खाद, डीजल और अन्य जरूरतों के रेट आसमान छू रहे हैं। किसान समझ नहीं पा रहे कि बढ़ते खर्च का सामना कैसे किया जाए। सरकार को राहत देने वाले ठोस कदम उठाने चाहिए।
किसान कल्याण सिंह कुशवाह का कहना है कि गेहूं खरीदी के दौरान भी कई परेशानियां सामने आई थीं। अब खाद की बढ़ी कीमतों ने नई चिंता पैदा कर दी है। खेती करना दिन-ब-दिन मुश्किल होता जा रहा है।
किसान एवं अधिवक्ता अजय सिंह कुशवाह का कहना है कि डीजल से लेकर खाद तक हर चीज महंगी हो रही है। ऐसी स्थिति में सरकार को किसानों के हित में हस्तक्षेप कर राहत देने वाले निर्णय लेने चाहिए।
खेती पहले ही मौसम, बाजार और लागत के दबाव से जूझ रही है। ऐसे समय में खाद की कीमतों में हुई बड़ी बढ़ोतरी ने किसानों की चिंता और बढ़ा दी है। सरकारी आंकड़े भले संतोषजनक तस्वीर पेश करें, लेकिन खेतों में खड़ा किसान पूछ रहा है कि बढ़ती लागत का बोझ आखिर कब तक उठाएगा?
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