जंतर-मंतर की गूंज MP तक, Gen-Z को लेकर सत्ता-विपक्ष में खलबली
समझें क्या है पूरा मामला
- मध्यप्रदेश में राजनीतिक दलों का Gen-Z पर फोकस बढ़ा।
- भाजपा और संघ युवा संवाद कार्यक्रमों की तैयारी कर रहे।
- कांग्रेस भी छात्रों के बीच अपनी पहुंच बढ़ा रही।
- मध्यप्रदेश सरकार ने 2027 को युवा वर्ष घोषित किया।
- चुनावी रणनीति में युवा वोट अहम भूमिका निभा रहा।
युवाओं की राजनीतिक ताकत
दिल्ली के जंतर-मंतर पर Gen-Z के प्रदर्शन के बाद युवाओं की राजनीतिक ताकत को लेकर सियासी दलों की चिंता बढ़ती दिख रही है। मध्यप्रदेश में इसका असर भाजपा, संघ और कांग्रेस की तैयारियों में नजर आ रहा है।
अब तक किसान, रोजगार, बिजली-पानी और स्थानीय मुद्दे चुनावी राजनीति के बड़े केंद्र रहे हैं, लेकिन Gen-Z को लेकर नई रणनीति आकार ले रही है। भाजपा-संघ संवाद बढ़ाने की तैयारी में हैं, तो कांग्रेस भी छात्रों के बीच बड़ा कार्यक्रम करने की तैयारी कर रही है।
दिल्ली के बाद MP में क्यों बढ़ी हलचल?
दिल्ली के Gen-Z आंदोलन ने राजनीतिक दलों को एक संदेश दिया है कि सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म से जुड़ी युवा पीढ़ी को नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा। यही वजह है कि मध्यप्रदेश में भी युवाओं को लेकर संगठनात्मक गतिविधियां बढ़ाने की तैयारी दिखाई दे रही है।
यह कहना जल्दबाजी होगी कि Gen-Z किसी एक दल के पक्ष में खड़ा है। असल चुनौती युवाओं के मुद्दों, नाराजगी और अपेक्षाओं को समझने की है। इसी जगह से आने वाले समय की राजनीति का नया नैरेटिव तैयार हो सकता है।
भाजपा-संघ ने बढ़ाया कैंपस कनेक्ट
भाजपा और संघ से जुड़े संगठनों ने युवाओं के बीच संवाद बढ़ाने पर जोर दिया है। युवा मोर्चा को सक्रिय करने के साथ ABVP के स्तर पर भी Gen-Z तक पहुंच बनाने की कोशिश की जा रही है।
इसके लिए कॉलेज, हॉस्टल और शैक्षणिक संस्थानों तक संपर्क बढ़ाने की रणनीति बताई जा रही है। 20 सितंबर को भोपाल में युवा संवाद कार्यक्रम की तैयारी है, जिसमें संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले के युवाओं से संवाद करने की बात सामने आई है। भोपाल के साथ इंदौर, जबलपुर और ग्वालियर में भी युवाओं के बीच वरिष्ठ पदाधिकारियों के पहुंचने की योजना बताई गई है।
भाजपा के सामने असली चुनौती क्या?
भाजपा के राष्ट्रीय सह मीडिया संयोजक आशीष अग्रवाल ने कहा कि भाजपा समरसता संकल्प अभियान के तहत Gen-Z से संपर्क बढ़ाएगी। उनका कहना है कि हॉस्टल, कॉलेज और शैक्षणिक संस्थानों तक पहुंच बनाई जाएगी।
प्रदेश भाजपा अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल भी युवाओं के लिए कार्यक्रमों की रूपरेखा तैयार करने की बात कह चुके हैं। वहीं मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने 2027 को युवाओं के लिए समर्पित करने का ऐलान किया है। यानी संगठन और सरकार दोनों स्तर पर युवा एजेंडा को आगे बढ़ाने की तैयारी है।
कांग्रेस भी पीछे हटने के मूड में नहीं
भाजपा-संघ की सक्रियता के बीच कांग्रेस ने भी Gen-Z को लेकर अपना प्लान तैयार करना शुरू कर दिया है। उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और राजस्थान के बाद मध्यप्रदेश में ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम कराने की तैयारी बताई जा रही है।
कांग्रेस की ओर से इसके लिए प्रस्ताव AICC को भेजे जाने की जानकारी है। मंजूरी मिलने के बाद कार्यक्रम की तारीख तय हो सकती है। जबलपुर में राहुल गांधी के छात्रों से संवाद करने की संभावना भी जताई जा रही है।
अब मुद्दा सिर्फ चुनाव तक सीमित नहीं
Gen-Z को लेकर बढ़ती राजनीतिक सक्रियता को केवल आगामी चुनाव की तैयारी के तौर पर देखना अधूरा होगा। डिजिटल दौर की यह पीढ़ी रोजगार, शिक्षा, अवसर, पारदर्शिता और राजनीतिक जवाबदेही जैसे सवालों पर ज्यादा मुखर हो सकती है।
यही कारण है कि भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए चुनौती सिर्फ युवाओं के बीच कार्यक्रम करना नहीं, बल्कि उन्हें यह भरोसा दिलाना है कि उनकी आवाज सत्ता और संगठन की प्राथमिकताओं में शामिल है।
दिल्ली के घटनाक्रम के बाद मध्यप्रदेश में जिस तरह भाजपा, संघ और कांग्रेस युवाओं की ओर रुख कर रहे हैं, उससे साफ है कि जेन जी अब राजनीतिक रणनीति का नया दबाव-बिंदु बन चुका है।
आने वाले समय में यही देखना अहम होगा कि यह सक्रियता महज कार्यक्रमों और संवाद तक रहती है या युवाओं के मुद्दे प्रदेश की राजनीति का वास्तविक एजेंडा बदलते हैं।
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