सरकारी रेट से भी महंगे किए फ्लैट, आंख मूंदकर जवाब दे रहे अधिकारी, लगा जुर्माना

Neel Tiwari | Aug 01, 2026, 13:02 IST
सरकारी रेट से भी महंगे किए फ्लैट
भोपाल के MIG कनिष्क अपार्टमेंट विवाद में हाई कोर्ट ने सरकार और हाउसिंग बोर्ड की कार्यप्रणाली पर सख्त टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि सरकार ने आंख मूंदकर हाउसिंग बोर्ड के अधिकारी को प्रभारी बना दिया। सही कलेक्टर गाइडलाइन नहीं बता पाने पर जुर्माना लगाया गया है।

समझें क्या है पूरा मामला...

  • यह मामला भोपाल के कनिष्क अपार्टमेंट में MPSRTC कर्मचारियों के फ्लैटों की बिक्री से जुड़ा है।
  • मध्यप्रदेश हाईकोर्ट पहले ही बाजार कीमत पर रजिस्ट्री करने का आदेश दे चुका था।
  • कर्मचारियों का आरोप है कि हाउसिंग बोर्ड ने गलत गाइडलाइन से ज्यादा कीमत तय कर दी।
  • ताजा सुनवाई में सरकार सही कलेक्टर गाइडलाइन भी नहीं बता सकी।
  • हाईकोर्ट ने लापरवाही पर प्रभारी अधिकारी पर 25 हजार रुपए की व्यक्तिगत लागत लगा दी।

हाउसिंग बोर्ड एस्टेट ऑफिसर पर जुर्माना

भोपाल के शिवाजी नगर में कनिष्क अपार्टमेंट है। यहां रहने वाले MPSRTC के पांच रिटायर्ड कर्मचारियों और हाउसिंग बोर्ड के बीच एक विवाद चल रहा था। इसी मामले में शुक्रवार, 31 जुलाई को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने काफी सख्ती दिखाई है।



जस्टिस विशाल मिश्रा की कोर्ट ने न सिर्फ 25 हजार रुपए का जुर्माना लगाया, बल्कि राज्य सरकार के काम करने के तरीके पर भी कड़े सवाल उठाए हैं।



कोर्ट ने कहा कि सरकार ने बिना यह देखे कि मामला पहले से ही हाई कोर्ट में चल रहा है, सीधे हाउसिंग बोर्ड के अधिकारी को इस केस का जिम्मेदार अधिकारी बना दिया। इतना ही नहीं, उस अधिकारी ने भी खुद से कोई जांच-पड़ताल नहीं की और हाउसिंग बोर्ड की ओर से पहले ही दिए गए जवाब को ही सही मान लिया। अदालत ने इस पूरी प्रक्रिया को गंभीर लापरवाही बताया।



कोर्ट ने सरकार से पूछा बड़ा सवाल

सुनवाई के दौरान पूरा विवाद संबंधित क्षेत्र की कलेक्टर गाइडलाइन पर केंद्रित रहा। इसी गाइडलाइन के आधार पर फ्लैटों की बाजार कीमत तय होनी है। वहीं, राज्य सरकार की ओर से मौजूद वकील अदालत को यह तक नहीं बता सके कि संबंधित क्षेत्र की सही गाइडलाइन क्या है।



कोर्ट ने कहा कि जब पूरा विवाद बाजार मूल्य के निर्धारण का है, तब सरकार का केवल हाउसिंग बोर्ड के जवाब पर निर्भर रहना उचित नहीं है। अदालत ने माना कि राज्य को खुद रिकॉर्ड की जांच कर स्पष्ट जानकारी के साथ जवाब दाखिल करना चाहिए था।





25 हजार की लागत, जेब से भरेंगे प्रभारी अधिकारी

राज्य सरकार ने अदालत से अतिरिक्त समय मांगा ताकि सही जानकारी जुटाकर नया शपथपत्र दाखिल किया जा सके। हाई कोर्ट ने सात दिन का समय तो दिया, लेकिन इसे राज्य की गलती मानते हुए 25 हजार रुपए की व्यक्तिगत लागत भी लगा दी।



अदालत ने स्पष्ट आदेश दिया कि यह राशि मामले के प्रभारी अधिकारी यानी एमपी हाउसिंग एंड इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट बोर्ड के एस्टेट ऑफिसर स्वयं जमा करेंगे। यह पैसा सरकारी खजाने से नहीं दिया जाएगा। कोर्ट ने इसे अधिकारियों की व्यक्तिगत जिम्मेदारी माना।



आखिर क्या है पूरा विवाद

यह मामला एमआईजी, कनिष्क अपार्टमेंट, शिवाजी नगर भोपाल स्थित एमपीएसआरटीसी के कर्मचारियों से जुड़ा है। कर्मचारियों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर कहा कि हाउसिंग बोर्ड ने फ्लैटों की बिक्री के लिए जरूरत से ज्यादा कीमत तय कर दी है।



याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह कीमत वास्तविक कलेक्टर गाइडलाइन के अनुरूप नहीं है। ज्यादा कीमत नहीं देने पर उन्हें बेदखली की चेतावनी भी दी गई थी। इसी आदेश को चुनौती देते हुए नई रिट याचिका दाखिल की गई।



पिछले आदेश में बेदखली पर लगाई थी रोक

24 सितंबर 2024 को हाई कोर्ट ने इस मामले में कर्मचारियों को राहत देते हुए उनके खिलाफ किसी भी तरह की बेदखली की कार्रवाई पर रोक लगा दी थी। उस समय अदालत ने माना था कि पहले यह तय होना जरूरी है कि हाउसिंग बोर्ड ने बाजार मूल्य सही तरीके से तय किया है या नहीं। इसी कारण मामले की सुनवाई लगातार जारी रही।



अप्रैल 2024 के फैसले से शुरू हुई पूरी प्रक्रिया

इस विवाद की शुरुआत 26 अप्रैल 2024 के उस फैसले से हुई, जब जस्टिस जी.एस. अहलूवालिया ने कई शहरों के कर्मचारियों की एक साथ सुनवाई करते हुए महत्वपूर्ण आदेश दिया था।



कोर्ट ने कहा था कि एमपीएसआरटीसी के कर्मचारी अपने कब्जे वाले मकानों को रजिस्ट्री की तारीख पर लागू कलेक्टर गाइडलाइन के अनुसार बाजार मूल्य देकर खरीद सकते हैं। कर्मचारियों को केवल अपना आवंटन पत्र और लिखित सहमति देनी होगी। इसके बाद हाउसिंग बोर्ड को तय समय में बिक्री की प्रक्रिया पूरी करनी होगी।



MPSRTC की आर्थिक स्थिति से जुड़ा है पूरा मामला

सालों पहले एमपीएसआरटीसी और हाउसिंग बोर्ड के बीच हायर परचेज योजना के तहत कर्मचारियों के लिए मकान बनाए गए थे। बाद में निगम आर्थिक संकट में आ गया और परिसमापन की स्थिति तक पहुंच गया।



इसी दौरान मकानों के स्वामित्व और बिक्री को लेकर विवाद शुरू हुआ। भोपाल, रीवा, जबलपुर और ग्वालियर के कर्मचारियों ने अलग-अलग याचिकाएं दायर कीं। अप्रैल 2024 में हाई कोर्ट ने सभी मामलों का एक साथ निपटारा किया था।



हाई कोर्ट का संदेश, बिना जांच जवाब दाखिल नहीं होगा

ताजा आदेश केवल इस मामले तक सीमित नहीं माना जा रहा। अदालत ने स्पष्ट संकेत दिया है कि सरकारी विभाग बिना तथ्य जांचे अदालत में जवाब दाखिल नहीं कर सकते।



कोर्ट की आंख मूंदकर अधिकारी नियुक्त करने और केवल हाउसिंग बोर्ड का जवाब अपनाने जैसी टिप्पणियां बताती हैं कि न्यायालय अब विभागों से तथ्यात्मक और जिम्मेदार जवाब की अपेक्षा कर रहा है। यदि ऐसा नहीं हुआ तो संबंधित अधिकारी व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार होंगे।



अगली सुनवाई 10 अगस्त से शुरू होने वाले सप्ताह में

हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को सात दिन के भीतर नया और स्पष्ट शपथपत्र दाखिल करने का निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 10 अगस्त 2026 से शुरू होने वाले सप्ताह में होगी। तब तक याचिकाकर्ताओं को मिली अंतरिम राहत जारी रहेगी। यानी फिलहाल उनके खिलाफ कोई प्रतिकूल कार्रवाई नहीं की जा सकेगी।



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