आदेश बहुत आए, बुलडोजर भी चले... फिर अवैध कॉलोनियों का साम्राज्य कैसे बढ़ता गया?
मध्य प्रदेश सरकार अब अवैध कॉलोनियों पर शिकंजा कसने के लिए नया और सख्त कॉलोनाइजर कानून लाने जा रही है। प्रस्तावित नियमों में 10 साल तक की जेल, 2 करोड़ रुपए तक जुर्माना और कलेक्टर-आयुक्त को सीधे कार्रवाई के अधिकार देने की तैयारी है। लेकिन इस पूरी कवायद के बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब वर्षों से अवैध कॉलोनियों के खिलाफ अभियान चलाए जाते रहे, तब यह नेटवर्क इतना मजबूत कैसे हो गया?
कानून से पहले जवाबदेही का सवाल
भोपाल, इंदौर, ग्वालियर और जबलपुर जैसे बड़े शहरों में समय-समय पर अवैध कॉलोनियों के खिलाफ अभियान चलाए गए। कलेक्टर और कमिश्नर स्तर से आदेश भी जारी हुए। कुछ दिन कार्रवाई हुई, फिर मामला ठंडे बस्ते में चला गया। नतीजा यह रहा कि अवैध कॉलोनियों का कारोबार न केवल जारी रहा बल्कि बड़े शहरों से निकलकर छोटे जिलों और
कस्बों तक फैल गया।
सरकार मानसून सत्र में नया कॉलोनाइजर कानून ला सकती है। अवैध कॉलोनी विकसित करने पर 10 साल तक जेल का प्रस्ताव। 2 करोड़ रुपये तक जुर्माने की तैयारी। शहर और गांव के लिए एक समान नियम लागू होंगे। कलेक्टर और नगर निगम आयुक्त को सीधे कार्रवाई का अधिकार मिलेगा। 45 दिन में कम्प्लीशन सर्टिफिकेट जारी करना अनिवार्य होगा।
सवाल यह भी: आखिर इतने साल इंतजार क्यों?
यदि मौजूदा कानून प्रभावी थे तो अवैध कॉलोनियों की संख्या लगातार क्यों बढ़ती रही? यदि प्रभावी नहीं थे तो उन्हें समय रहते बदला क्यों नहीं गया? यही वह सवाल है जो अब आम लोगों के बीच चर्चा का विषय बन रहा है। जानकारों का मानना है कि कई मामलों में शुरुआती स्तर पर कार्रवाई की कमी, निगरानी तंत्र की कमजोरी और लंबी प्रशासनिक प्रक्रियाओं ने कॉलोनाइजरों को फायदा पहुंचाया। कई जगहों पर शिकायतें होने के बावजूद निर्माण कार्य चलता रहा।
छोटे शहर बने नया ठिकाना
बड़े शहरों में निगरानी बढ़ने के बाद कई डेवलपर्स और कॉलोनाइजरों ने छोटे जिलों और कस्बों का रुख किया। वहां जमीन सस्ती थी, निगरानी अपेक्षाकृत कमजोर थी और खरीदारों को आकर्षित करना आसान था। नतीजा यह हुआ कि कई जगह बिना सड़क, पानी, सीवरेज और बिजली जैसी बुनियादी सुविधाओं के प्लॉट बेच दिए गए। बाद में सबसे ज्यादा परेशानी उन परिवारों को हुई जिन्होंने जीवनभर की जमा-पूंजी लगाकर जमीन खरीदी।
रसूख के आगे आम आदमी बेबस?
कई मामलों में पीड़ितों का आरोप रहा कि शिकायतों के बाद भी सुनवाई नहीं हुई। आम खरीदार सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाते रहे, जबकि प्रभावशाली कॉलोनाइजर कानूनी और प्रशासनिक रास्तों से राहत हासिल करते रहे। यही वजह है कि नया कानून केवल दंड का नहीं, बल्कि जवाबदेही का भी परीक्षण माना जा रहा है।
नए कानून में क्या होगा खास?
सरकार अवैध कॉलोनियों पर सख्ती की तैयारी कर रही है। प्रस्तावित नियमों में दंड बढ़ाने का प्रावधान किया गया है। अवैध कॉलोनी विकसित करने पर अब 10 साल तक की सजा हो सकती है। जुर्माना बढ़ाकर 2 करोड़ रुपये तक किया जा सकता है। शहर और गांव दोनों के लिए समान नियम लागू होंगे। नगरीय सीमा से 16 किलोमीटर तक का क्षेत्र कानून के दायरे में रहेगा। कलेक्टर आयुक्त और अधिकृत एसडीएम को सीधे कार्रवाई का अधिकार मिलेगा। कम्प्लीशन सर्टिफिकेट 45 दिन में नहीं मिलने पर डीम्ड परमिशन का प्रावधान भी रखा गया है।
असली परीक्षा कानून नहीं, क्रियान्वयन की
सरकार का दावा है कि नया कानून अवैध कॉलोनियों के नेटवर्क को तोड़ देगा। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि मध्य प्रदेश में अवैध कॉलोनियों के खिलाफ अभियान कोई नई बात नहीं है। नई बात होगी यदि कार्रवाई लगातार और निष्पक्ष दिखाई दे, क्योंकि सवाल केवल यह नहीं है कि नया कानून कितना सख्त होगा। असली सवाल यह है कि क्या इस बार कार्रवाई कुछ दिनों की औपचारिकता बनकर नहीं रह जाएगी? जब तक इस सवाल का जवाब जमीन पर नहीं मिलता, तब तक अवैध कॉलोनियों के खिलाफ किसी भी अभियान की सफलता पर सवाल उठते रहेंगे।
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