इंदौर रेसीडेंसी एरिया में आजादनगर, धार कोठी, रतलाम कोठी, रेडियो कॉलोनी सभी सरकारी घोषित
पूरी खबर को 5 पॉइंट में समझें...
- इंदौर जिला प्रशासन ने रेसीडेंसी एरिया की पूरी जमीन को सरकारी घोषित कर दिया है।
- जमीन पर काबिज लोगों को मालिकाना हक के दस्तावेज दिखाने के लिए 12 जनवरी तक का समय मिला है।
- वैध दस्तावेज होने पर जमीन को संबंधित व्यक्ति की निजी संपत्ति घोषित किया जाएगा।
- दस्तावेज न होने पर सरकार लीज रेंट लेकर व्यक्ति को औपचारिक पट्टा आवंटित करेगी।
- यह कार्यवाही ब्रिटिश काल से चले आ रहे जमीन विवाद और सर्वे को पूरा करने के लिए की गई है।
INDORE. इंदौर के रेसीडेंस एरिया में बवाल हो गया है। जिला प्रशासन द्वारा रेसीडेंसी एरिया की सभी भूमि सरकारी घोषित कर दी गई है। इसके साथ ही अब जमीन पर काबिज लोगों से उनके मालिकाना हक को लेकर कागज मांगे गए हैं। ऐसे में रेसीडेंसी एरिया में आजादनगर, धार कोठी, रतलाम कोठी, रेडियो कॉलोनी सभी की जमीन सरकारी हो गई है। इसका सर्वे पूरा कर रिपोर्ट प्रकाशन कर दिया गया है।
12 जनवरी तक देना है दावे
सर्वेक्षण अधिकारी तहसीलदार कमलेश कुशवाह ने बताया कि यहां दावे और आपत्ति के लिए लोग 12 जनवरी तक दस्तावेज लगा सकते हैं। इन दावों का निराकरण किया जाएगा। इसके बाद अपील कलेक्टर स्तर पर सुनी जाएगी। जानकारी के मुताबिक, अगर दावेदार अपने मालिकाना हक के दस्तावेज दिखा सकते हैं, तो उसे निजी घोषित किया जाएगा।
क्या कब्जे लेगी सरकार
सबसे बड़ा सवाल जो लोगों के मन में आ रहा है, वो ये है कि क्या उनकी जमीन पर सरकार कब्जा करेगी या फिर उसे तोड़ा जाएगा। तो इसका जवाब है नहीं। प्रशासन द्वारा किए गए सर्वे में यह भी बताया गया है कि कौन व्यक्ति अभी उस जमीन पर काबिज है। अगर किसी को राज्य सरकार, प्रशासन, रेसीडेंसी अथॉरिटी ऑफ इंडिया या होलकर रियासत से वैध दस्तावेज के जरिए जमीन मिली है, तो वह जमीन उनके पास ही रहेगी
यदि दस्तावेज नहीं है तो फिर प्रशासन इस जमीन के लिए उन्हें धारणाधिकार नियम के तहत औपचारिक रूप से उस भूखंड का पट्टा आवंटित करेगी। इसके लिए उनसे सालाना लीज रेंट लिया जाएगा, जैसे कि आईडीए की संपत्ति लेने पर 30 साल का लीज रेंट लिया जाता है। इसी तरह इन सभी को लीज रेंट देना होगा और उन्हें औपचारिक पट्टा दे दिया जाएगा।
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क्या है पूरा मसला
दरअसल रेसीडेंसी एरिया ब्रिटिश काल में विकसित एरिया था जो रेसीडेंसी अथारिटी आफ इंडिया के पास था। सीपीडब्ल्यूडी इस जमीन पर अपना कब्जा बताती आई है, जबकि उसका कब्जा केवल उसकी बनी संपत्ति पर माना गया ना कि पूरी जमीन पर। तत्कालीन कलेक्टर मनोज श्रीवास्तव ने इस एरिया का सर्वे नहीं होने पर इसे लेकर पहल की।
सरकार ने साल 2003 में इस पूरे एरिया की जमीन नजूल मानी। लेकिन कभी इसका सर्वे पूरा नहीं हो सका। इसके बाद जिला प्रशासन ने इसमें पहल की और तत्कालीन कलेक्टर आशीष सिंह के समय काम में तेजी आई।अब कलेक्टर शिवम वर्मा के समय यह काम पूरा हुआ और इसके बाद सर्वे के आधार पर इसका प्रारंभिक प्रकाशन कर दिया गया है।