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मेरी पीढ़ी ने साहस और विश्वास के साथ अपने लिए राहें बनाई हैं। रूढ़ियों और संकोच की ऊंची दीवारों के बीच भी हमने नए द्वार खोले हैं। हमने केवल अपने लिए स्थान नहीं बनाया, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए रास्तों को थोड़ा और विस्तृत किया है। फिर भी यह सफर यहीं समाप्त नहीं होता, क्योंकि समाज और व्यवस्था दोनों में अभी कई अनकही चुनौतियां और बंद दरवाजे शेष हैं।
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पुलिस और जनता के बीच विश्वास की दूरी
आज भी आम जनता का बड़ा हिस्सा अपने आप को पुलिस थानों से दूर महसूस करता है। यह दूरी धीरे-धीरे कम हो रही है, पर इसकी गति अभी भी धीमी है। इसलिए पुलिस के सामने सबसे बड़ा दायित्व जनता का विश्वास जीतने का है। सोशल मीडिया के इस दौर में कई बार पुलिस आलोचना के घेरे में भी आ जाती है।
कई बार हम अपने प्रयासों को पूरी तरह लोगों के सामने रख नहीं पाते और कई बार प्रोटोकॉल तथा विवेचना की गोपनीयता के कारण भी सब कुछ स्पष्ट करना संभव नहीं होता। ऐसे में लोगों को लगता है कि शायद प्रयास पूरे नहीं हो रहे हैं, जबकि वास्तविकता अक्सर इससे भिन्न होती है।
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गांव-गांव जाकर सुनीं समस्याएं
आलोचना से घबराना नहीं चाहिए। किसी भी कार्य के साथ प्रश्न और संदेह जुड़ते हैं, परंतु अंततः परिणाम ही सबको दिखाई देता है। जब सत्य सामने आता है तो वही समाज जो प्रश्न करता है, वही प्रशंसा भी करता है।
मेरे अनुभव में जनता तक पहुंचने का सबसे प्रभावी माध्यम उनकी शिकायतें ही होती हैं। इसलिए मैंने अपने हर जिले में शिकायत निवारण शिविर लगाए, गांव-गांव जाकर लोगों की समस्याएं सुनीं और उनका निराकरण करने का प्रयास किया। यह केवल शिकायतों का समाधान नहीं था, बल्कि विश्वास निर्माण का भी एक प्रयास था।
संदेह पूरा नहीं करता सपने
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर मैं विशेष रूप से महिलाओं से यही कहना चाहूंगी कि यदि आपने अपने लिए कोई लक्ष्य तय किया है तो उसके प्रति दृढ़ संकल्प रखें। आसपास की आलोचनाएं, संदेह और सामाजिक दबाव कई बार हमारे कदम धीमे करने का प्रयास करते हैं, पर उन्हें अपने आत्मविश्वास पर हावी न होने दें।
निरंतर आगे बढ़ते रहना ही सफलता की सबसे बड़ी कुंजी है। जब महिलाएं अपने विश्वास और साहस के साथ आगे बढ़ती हैं, तभी समाज में सच्चे अर्थों में परिवर्तन और सशक्तिकरण संभव होता है।
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