जबलपुर क्रूज हादसा: ममता की तस्वीर पर मौज उड़ा दी, क्या सच में संवेदनाएं मर गई हैं?
बरगी डैम में एक तरफ पानी में डूबती जिंदगियां और दूसरी तरफ मोबाइल स्क्रीन पर तैरती संवेदनहीनता। जबलपुर के बरगी डैम में हादसे ने कई परिवारों को हमेशा के लिए तोड़ दिया। किसी का बेटा चला गया, किसी की मां, किसी का पूरा घर उजड़ गया। चीखें पानी में डूब गईं, लेकिन उनका दर्द अब भी हवा में तैर रहा है।
मां के सीने से लिपटा मिला मासूम
इसी बीच एक तस्वीर सामने आई, जिसमें एक मां अपने बेटे को छाती से चिपकाए नजर आ रही है। दोनों अब इस दुनिया में नहीं थे, लेकिन जिस तरह मां ने अपने बच्चे को पकड़ रखा था, वह बता रहा था कि मौत भी उस ममता को अलग नहीं कर पाई।
ममता की तस्वीर पर मौज
यह तस्वीर आंसू मांगती थी। यह तस्वीर खामोशी मांगती थी। यह तस्वीर सजदा मांगती थी, लेकिन हुआ क्या? हमने उस तस्वीर को भी नहीं छोड़ा।
किसी ने उस पर इफेक्ट्स लगा दिए। किसी ने बैकग्राउंड बदल दिया और कुछ ने तो हद पार कर दी। उस मां और बच्चे की एआई (AI) तस्वीरें बना डालीं।
जैसे यह कोई कहानी हो, जैसे यह कोई फिल्म का दृश्य हो, जैसे यह दर्द नहीं, कंटेंट हो।
सच्ची तस्वीर ने खड़े किए सवाल
यहीं से सवाल खड़ा होता है कि क्या हम सच में इतने बदल गए हैं? जहां एक मां ने अपने बच्चे को बचाने के लिए आखिरी सांस तक संघर्ष किया, वहीं हम उस संघर्ष को वायरल बनाने में लगे हैं। जहां एक जीवन खत्म हुआ, वहां हम इफेक्ट्स जोड़ रहे हैं। यह सिर्फ असंवेदनशीलता नहीं है, यह संवेदनाओं का क्षरण है और वह भी लगातार।
सोशल मीडिया प्रदर्शन का मंच बन गया है। यहां दर्द भी तब तक दिखाई देता है, जब तक वह ध्यान खींचता है। जैसे ही नया विषय आता है, पुराना दर्द स्क्रॉल होकर नीचे चला जाता है।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तकनीक का चमत्कार है, लेकिन यह भी साफ हो गया है कि तकनीक में समझ नहीं होती। समझ इंसान में होती है। और जब इंसान ही अपनी समझ खोने लगे, तब तकनीक सिर्फ एक औजार बन जाती है, जो संवेदनहीनता को और तेज कर देती है।
एक मां की आखिरी सांस
हर तस्वीर कंटेंट नहीं होती। हर दृश्य शेयर करने के लिए नहीं होता। कुछ पल ऐसे होते हैं, जिन्हें सिर्फ महसूस किया जाता है, चुपचाप और भीतर ही भीतर।
यह तस्वीर भी वैसी ही थी।
एक मां की आखिरी सांस। एक बच्चे की आखिरी सुरक्षा। एक रिश्ता, जो मौत के बाद भी टूटा नहीं, लेकिन हमने उसे भी वायरल मटेरियल बना दिया।
यह सवाल सिर्फ सोशल मीडिया का नहीं है। यह सवाल हमारे भीतर का है। हमारा समाज किस दिशा में जा रहा है? क्या हमारी संवेदनाएं सच में इतनी कमजोर हो गई हैं कि अब हमें दर्द में भी मनोरंजन दिखने लगा है?
जरूरत तकनीक को कोसने की नहीं है। जरूरत है खुद से सवाल करने की।
ध्यान दें...
जब अगली बार कोई ऐसी तस्वीर सामने आए तो क्या हम उसे आगे बढ़ाने से पहले एक पल रुकेंगे? क्या हम उसे कंटेंट की नजर से देखने के बजाय किसी की जिंदगी के रूप में देख पाएंगे?
क्योंकि यदि यह ठहराव खत्म हो गया तो फिर कुछ भी नहीं बचेगा।
और जिस दिन इंसान दर्द को महसूस करना छोड़ देगा, उस दिन सिर्फ मौतें नहीं होंगी, इंसानियत भी खामोशी से दम तोड़ देगी।
जबलपुर क्रूज हादसा
जबलपुर के बरगी डैम में गुरुवार, 30 अप्रैल की शाम करीब 3:30 से 4:00 बजे के बीच एक बहुत ही दर्दनाक हादसा हो गया। यहां तेज आंधी और खराब मौसम की वजह से सैलानियों से भरा एक क्रूज नर्मदा के बैकवाटर में पलट गया।
इस हादसे में अब तक 9 लोगों की जान जाने की खबर सामने आई है, जबकि रेस्क्यू टीम ने रातभर में लगभग 22 से 25 लोगों को सुरक्षित बाहर निकाला है। फिलहाल प्रशासन पूरी मुस्तैदी से काम कर रहा है और गोताखोरों के साथ-साथ सेना की टीमें भी लोगों की तलाश में जुटी हैं जो अब भी लापता हैं।
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