डिप्टी सीएम जगदीश देवड़ा के ओएसडी दीपम रायचूरा की नियुक्ति पर सवाल, सीएम की मंजूरी कहां?
तबादला सूची के अनुमोदन पर भी विवाद
मध्यप्रदेश के उपमुख्यमंत्री जगदीश देवड़ा के पूर्व ओएसडी दीपम रायचूरा (Deepam Raichura ) की नियुक्ति और कथित रिश्वत के आरोपों ने प्रशासनिक प्रक्रिया पर सवाल खड़े किए हैं। उपलब्ध समाचार सामग्री के अनुसार, 900 करोड़ रुपए से अधिक की कथित ठगी के आरोपी मोहित गोगिया ने ईडी को दिए बयान में रायचूरा पर शराब ठेके दिलाने के बदले 50 लाख रुपये लेने का आरोप लगाया।
अब सवाल है कि रायचूरा को ओएसडी बनाने के लिए जरूरी मंजूरी ली गई थी या नहीं? उपमुख्यमंत्री और वित्त मंत्री जगदीश देवड़ा के कार्यालय से हटाए गए दीपम रायचूरा का मामला अब केवल शराब ठेकों में कथित रिश्वत तक सीमित नहीं है। उनकी ओएसडी नियुक्ति, मुख्यमंत्री समन्वय से अनुमति और बाद में भोपाल में दोबारा पदस्थ करने की कथित कोशिश भी सवालों के घेरे में है।
27 अगस्त 2024 के आदेश से शुरू हुआ विवाद
जानकारी के मुताबिक, वाणिज्यिक कर विभाग की उपसचिव वंदना शर्मा ने 27 अगस्त 2024 को आदेश जारी कर दीपम रायचूरा को उनके मौजूदा दायित्वों के साथ उपमुख्यमंत्री जगदीश देवड़ा की निजी स्थापना में विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी (ओएसडी) पदस्थ किया था। उस समय रायचूरा सहायक आबकारी आयुक्त, भोपाल के पद पर कार्यरत थे। सूत्रों के अनुसार इस नियुक्ति के लिए सामान्य प्रशासन विभाग की अनुमति नहीं ली गई थी?
मुख्यमंत्री समन्वय से मंजूरी क्यों नहीं ली गई?
सूत्रों के अनुसार रायचूरा की नियुक्ति मुख्यमंत्री मोहन यादव समन्वय के अनुमोदन के बिना की गई। नियुक्ति आदेश राज्यपाल के नाम से जारी नहीं होने पर भी सवाल उठाया गया है।
हालांकि, किसी नियुक्ति में मुख्यमंत्री समन्वय की अनुमति अनिवार्य थी या नहीं, इसका अंतिम निष्कर्ष संबंधित सेवा नियम, अधिकारों के प्रत्यायोजन और मूल नियुक्ति फाइल देखकर ही निकाला जा सकता है। जांच का महत्वपूर्ण विषय यह है कि नियुक्ति प्रस्ताव किसने भेजा, किस स्तर पर परीक्षण हुआ और अंतिम स्वीकृति किस अधिकारी ने दी।
दोबारा पदस्थ करने पर क्यों अड़े थे देवड़ा?
रायचूरा को बाद में सहायक आबकारी आयुक्त (Assistant Excise Commissioner ) भोपाल से हटाकर राज्य स्तरीय उड़नदस्ता, भोपाल में पदस्थ किया गया। इसके बावजूद वे उपमुख्यमंत्री के ओएसडी बने रहे। सूत्रों के अनुसार जून 2026 में तबादलों पर प्रतिबंध से छूट की अवधि के दौरान देवड़ा रायचूरा को दोबारा सहायक आबकारी आयुक्त भोपाल पदस्थ कराना चाहते थे। बताया गया है कि विभागीय अड़चन के कारण आदेश जारी नहीं हो पाया। जानकारी के अनुसार रायचूरा की पदस्थापना नहीं होने पर देवड़ा ने तबादला सूची का अनुमोदन कुछ समय के लिए रोक दिया था। हालांकि, इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि करने वाली मूल नोटशीट उपलब्ध नहीं है।
ईडी के कथित बयान में 50 लाख नकद का आरोप
करीब 930 करोड़ रुपए की कथित धोखाधड़ी के आरोपी मोहित गोगिया के नाम से सामने आए बयान में दावा किया गया है कि वर्ष 2024-25 में भोपाल के टीटी नगर क्षेत्र की दो शराब दुकानों के ठेके दिलाने के बदले कुल एक करोड़ रुपये दिए गए। इसमें 50 लाख रुपये नकद और शेष 50 लाख रुपये बैंक खाते में भेजने का आरोप है। कथित बयान में फर्जी एफडीआर को मंजूरी दिलाने और बिना लाइसेंस शराब बिक्री में मदद करने के आरोप भी हैं। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
देवड़ा ने ओएसडी पद से हटाया
9 अक्टूबर 2026 को उपमुख्यमंत्री जगदीश देवड़ा ने रायचूरा को ओएसडी के प्रभार से मुक्त कर दिया। देवड़ा ने स्पष्ट किया कि जिस अवधि में शराब ठेकों की कथित अनियमितताएं हुईं, उस समय रायचूरा उनके ओएसडी नहीं थे। वे आबकारी विभाग में पदस्थ थे। देवड़ा ने निष्पक्ष विभागीय जांच के निर्देश भी दिए हैं। रायचूरा ने आरोपों को झूठा और निराधार बताया है।
जांच में इन दस्तावेजों की पड़ताल जरूरी
- नियुक्ति फाइल: 27 अगस्त 2024 के आदेश की मूल नोटशीट, सक्षम प्राधिकारी की स्वीकृति और मुख्यमंत्री समन्वय से संबंधित रिकॉर्ड।
- तबादला प्रस्ताव: जून 2026 की प्रस्तावित पदस्थापना, विभागीय आपत्तियां और अनुमोदन संबंधी दस्तावेज।
- कथित रिश्वत: शराब ठेका आवंटन, बैंक गारंटी, एफडीआर, बैंक लेनदेन और संबंधित व्यक्तियों के बयान।
नियुक्ति का जिम्मेदार कौन?
रायचूरा को ओएसडी पद से हटाने के बाद भी उनकी नियुक्ति प्रक्रिया से जुड़े प्रश्न बाकी हैं। यदि मुख्यमंत्री समन्वय की अनुमति आवश्यक थी, तो क्या वह ली गई थी? यदि अनुमति नहीं ली गई, तो किस नियम के आधार पर आदेश जारी हुआ? और यदि विभागीय अधिकारियों ने आपत्ति जताई थी, तो उसका निपटारा कैसे हुआ?
इन सवालों का जवाब नियुक्ति आदेश से अधिक उसकी मूल फाइल में छिपा है। फिलहाल कथित रिश्वत और नियुक्ति में नियमों के उल्लंघन, दोनों को जांच के विषय के रूप में देखना जरूरी है। आरोप सामने आना अपने आप में अपराध सिद्ध होना नहीं है।