एमपी पर 3.4 लाख करोड़ से ज्यादा का कर्ज, अनजाने में आप भी हुए 40 हजार के कर्जदार, घोषणाएं जारी हैं और बढ़ सकता है कर्ज
BHOPAL. चुनाव जैसे-जैसे पास आ रहे हैं मध्य प्रदेश पर कर्जा भी बढ़ रहा है। चुनावी घोषणाओं की वजह से राज्य की वित्तीय स्थिति गड़बड़ाई हुई है। प्रदेश में प्रति व्यक्ति कर्ज की बात की जाए तो यह 40,000 रुपए तक पहुंच गया है। राज्य में आचार संहिता अगले महीने से शुरू होगी, इस बीच राज्य पर आर्थिक बोझ और बढ़ने की संभावना जताई जा रही है।
मप्र पर 3.4 लाख करोड़ रुपए से अधिक का कर्ज
मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव के चलते राज्य सरकार रोज कोई न कोई घोषणा कर रही है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह मतदाताओं को लुभाने के लिए नए-नए शिलान्यास भी कर रहे हैं। लेकिन इन घोषणाओं के चलते एमपी पर अब 3.4 लाख करोड़ रुपए से अधिक का कर्ज हो चुका है अभी इसके और बढ़ने की संभावना है। 31 मार्च 2023 तक कुल कर्ज 3.3 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा पहुंच चुका था।
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अप्रैल से अब तक लगभग 9,000 करोड़ का कर्ज लिया
सितंबर तक मध्य प्रदेश में हर व्यक्ति पर 40,000 रुपए से ज्यादा का कर्ज है, जबकि मार्च 2016 के आखिर में प्रति व्यक्ति अनुमानित कर्ज 13,853 रुपए के करीब था मतलब कर्ज में पिछले छह वर्षों में तीन गुना वृद्धि हो गई है। सितंबर की शुरुआत में ही सरकार ने दो बार में 3,000 करोड़ रुपए का और कर्ज लेने के लिए अप्लाई किया है। अप्रैल से अब तक सरकार ने लगभग 9,000 करोड़ रुपए का कर्ज लिया है, जिसमें मई में 2000 करोड़ रुपए और जून में 4,000 करोड़ रुपए शामिल हैं। पिछले विधानसभा चुनाव से पहले 1 अप्रैल से 15 सितंबर, 2018 के बीच सरकार ने 7,000 करोड़ रुपए का लोन लिया था।
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नई योजनाओं से मप्र सरकार का खर्च 10% बढ़ने का अनुमान
सूत्रों का कहना है कि पिछले कुछ महीनों में सरकार की चुनाव पूर्व घोषणाओं और योजनाओं से मप्र सरकार का खर्च कम से कम 10% बढ़ने का अनुमान है। इन घोषणाओं से अगली सरकार को फाइनेंशियल मैनेजमेंट में मुश्किल होने वाली है। एमपी सरकार का औसत मासिक खर्च देखा जाए तो वो लगभग 22,000 करोड़ रुपए है। हालांकि, हाल की चुनावी घोषणाओं के बाद यह 25,000 करोड़ रुपए के करीब पहुंच चुका है। चुनाव से पहले इसमें और बढ़ोतरी की संभावना है। वित्त विभाग ने तुरंत सभी प्रमुख सरकारी विभागों को निर्देश दिया कि वे उसकी अनुमति के बिना विभिन्न योजनाओं के तहत धनराशि न निकालें।
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चुनावी साल में हर वर्ग को खुश करने की कोशिश, लेकिन राज्य वित्तीय संकट में
1. अकेले लाड़ली बहना योजना पर हर महीने लगभग 1,500 करोड़ रुपए का खर्च।
2. अतिथि शिक्षकों का मानदेय दोगुना करने में सालाना खर्च 470 करोड़ रुपए।
3. उज्ज्वला गैस सिलेंडर 450 रुपए में देने पर प्रति माह 100 करोड़ रुपए का खर्च।
4. कॉलेजों में अतिथि विद्वानों का वेतन 50,000 रुपए तक बढ़ा दिया है, आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं का वेतन 10,000 से बढ़ाकर 13,000 रुपए, रोजगार सहायकों, जिला पंचायत अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, जनपद अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, उपसरपंच और पंच का मानदेय 9,000 से 18,000 रुपए और तीन गुना भी कर दिया है। इनसे भी सरकार पर खर्च का बोझ बढ़ा है।
5. मेधावी छात्रों को ई-स्कूटर देने पर 135 करोड़ रुपए और 78,000 छात्रों को लैपटॉप देने के वादे पर 196 करोड़ रुपए खर्च होंगे।
अभी भी हर दिन नए वादे करना जारी हैं
सरकार ने संविदा कर्मचारियों को वेतन और अन्य सुविधाओं में नियमित सरकारी कर्मचारियों के बराबर लाने के आदेश जारी किए हैं। इससे भी खर्च बढ़ेगा। लगभग हर दिन नए वादे किए जा रहे हैं, जो अगले महीने आदर्श आचार संहिता लागू होने तक जारी रहने की संभावना है। ऐसे में संभावना है कि आने वाले दिनों में राज्य पर वित्तीय संकट और बढ़ेगा। अब देखने वाली बात यह होगी कि आने वाले विधानसभा चुनाव में किसकी सरकार बनती है और कर्ज का ये बोझ कौन उठाएगा...?