मोहन यादव का असली समय शुरू होता है...अब
The Sootr | Dec 13, 2024, 11:02 IST
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डॉ. मोहन यादव ने मुख्यमंत्री के रूप में अपने पहले वर्ष में कड़े फैसलों और सशक्त नेतृत्व से नई पहचान बनाई। अगले चार वर्षों में उनकी कार्यशैली पर नजरें होंगी।
वरिष्ठ पत्रकार प्रकाश भटनागर
डॉ. मोहन यादव ने अपनी पहचान एकदम उलट बनाने की राह पकड़ी। सहज, सरल रहते हुए सख्त और मजबूत फैसले लेने वाले मुख्यमंत्री की। यह छवि बनाने का उन्होंने कोई मौका नहीं खोया। चाहे मामला एक बस ड्राइवर से बदतमीजी करने पर एक कलेक्टर को तत्काल हटाने का हो या फिर गुना में बस में आग लगने की घटना पर ट्रांसपोर्ट कमिश्नर से लेकर तमाम जिम्मेदारों पर तत्काल एक्शन लेने का मामला हो। छतरपुर में पुलिस पर हुए हमले के बाद डॉ. यादव की सरकार ने जो सख्त कदम उठाए थे , उसमें उन्होंने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को भी शायद पीछे छोड़ दिया था।
शिवराज को हटाए जाने की चर्चा
जिनकी राजनीति में अधिक दिलचस्पी नहीं है, उन्होंने भी वर्ष 2023 के आसपास बेहद आसानी से कुछ महसूस किया होगा। वह यह कि उस समय के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा के बीच एक अघोषित प्रतियोगिता आकार ले चुकी थी। इसका ज्यादा विवरण देने की जगह इतना भर बता देते हैं कि तब शिवराज को हटाए जाने की चर्चा थी और संभावित मुख्यमंत्रियों के रूप में शर्मा का नाम भी चल रहा था। भाजपा ने हमेशा से संगठन की मजबूती पर जोर दिया है। शर्मा तब भी मजबूती के साथ संगठन चला रहे थे और अपने दो पूर्ववर्तियों दिवंगत नंदकुमार सिंह चौहान और राकेश सिंह के समय पार्टी में आए ठहराव को शर्मा रवानगी में बदल चुके थे। अब पता नहीं यह इस सबका असर था या फिर कुछ और, लेकिन विधानसभा चुनाव के बाद शर्मा तो प्रदेश में ही रहे, अलबत्ता भाजपा ने शिवराज सिंह चौहान का नया ठिकाना दिल्ली में स्थापित कर दिया।
संघ के समर्पित कार्यकर्ता...डॉक्टर साहब
यह परिवर्तित परिदृश्य अक्सर अलग-अलग रूप में दिखता है। लोकसभा चुनाव से लेकर अमरवाड़ा, बुदनी और विजयपुर का उपचुनाव इसका गवाह है। इनमें से विजयपुर में भाजपा की इकलौती पराजय को छोड़ दें, तो शेष सभी मामलों में साफ दिखा कि यादव और शर्मा की युति ने मध्यप्रदेश के स्तर पर डबल इंजन वाली मजबूती को साकार कर दिखाया। ऐसा ही भाजपा के उस सदस्यता अभियान में भी नजर आ रहा है, जिसकी धमाकेदार सफलता के लिए पार्टी का शीर्ष नेतृत्व भी मध्यप्रदेश की पीठ थपथपा चुका है।
यादव 'नाम' के नहीं बल्कि 'काम' के
मुख्यमंत्री की परेशानी
ऐसी विपरीत परिस्थितियों से निकलने के लिए यादव अपनी टीम सहित तैयार तो दिख रहे हैं, लेकिन खुद यह टीम मुख्यमंत्री के अनुरूप कितनी तैयार है, यह देखना बहुत जरूरी होगा। और यह भी देखने वाली बात होगी कि टीम के लिहाज से गलत चयन वालों के चाल-चलन को सुधारने के लिए यादव क्या करेंगे? क्योंकि इस जमावट को बार-बार ताश के पत्तों की तरह फेंटने का समय यादव के पास नहीं रह गया है। मुख्यमंत्री के रूप में पहले जन्मदिन के बाद यादव का असली समय शुरू होता है अब। तो अगले चार साल में यादव कैसे दिखेंगे, इसके संकेत तो मिल रहे हैं, लेकिन संकेतों की मुकम्मल तस्वीर बनने के बाद ही यह समझ आ सकेगा कि यादव तकदीर से मुख्यमंत्री तो बन गए, लेकिन तदबीर से वह कैसे पार्टी के इस फैसले को सही साबित कर सकेंगे? अपनी तरफ से वे पूरी मजबूती से पेश आ रहे हैं और अगले चार साल के लिए सधे हुए कदमों से वे अपनी मंजिल की तरफ अग्रसर हैं।
( लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)
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