खनन माफिया पर मेहरबानी क्यों? 305 करोड़ के डिफॉल्टरों को लीज देने पर HC सख्त

Amresh Kushwaha | Jun 30, 2026, 12:50 IST
खनन माफिया पर मेहरबानी क्यों
ग्वालियर हाईकोर्ट ने मध्य प्रदेश सरकार से सवाल किया है। 305 करोड़ रुपए की पेनल्टी न भरने वाले खनन माफिया को नई लीज क्यों दी गई। कोर्ट ने एक हफ्ते में जवाब मांगा है। अगली सुनवाई 6 जुलाई 2026 को होगी।

समझें क्या है पूरा मामला...

  • ग्वालियर हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से सख्त सवाल पूछा है।
  • खनन माफिया पर 305 करोड़ रुपए की पेनल्टी बकाया है।
  • इसके बावजूद उन्हें नई जगहों पर खनन लीज दी गई।
  • कोर्ट ने सरकार को एक हफ्ते में जवाब देने को कहा है।
  • अगली सुनवाई 6 जुलाई 2026 को तय की गई है।

हाईकोर्ट ने सरकार से पूछे तल्ख सवाल

मध्य प्रदेश में खनिज विभाग के अफसरों और खनन माफिया की मिलीभगत का मामला सामने आया है। इस मामले को लेकर ग्वालियर हाईकोर्ट की डबल बेंच ने सख्त रुख दिखाया है। कोर्ट ने सीधे सरकार से सवाल किया है। कोर्ट ने पूछा कि अवैध खनन करने वालों पर करोड़ों रुपए की पेनल्टी बकाया है। फिर भी उनसे अब तक वसूली क्यों नहीं हुई। कोर्ट ने यह भी पूछा कि सरकारी खजाने को नुकसान पहुंचाने वाले इन डिफॉल्टरों को नई खनन लीज किस आधार पर दी गई।



यह तीखे सवाल जस्टिस जीएस अहलूवालिया और जस्टिस पुष्पेंद्र यादव की युगलपीठ ने पूछे हैं। यह सुनवाई याचिकाकर्ता अकरम खान की जनहित याचिका पर हुई। राज्य सरकार की तरफ से अतिरिक्त महाधिवक्ता कोर्ट में मौजूद रहे। उन्होंने सरकार का पक्ष रखने के लिए समय मांगा। कोर्ट ने यह मांग मान ली है। सरकार को अपना जवाब देने के लिए एक हफ्ते का समय दिया गया है। इस मामले की अगली सुनवाई 6 जुलाई 2026 को होगी।



2017 से बकाया है भारी जुर्माना

याचिका में बताया गया है कि जिले के खनन माफिया पर भारी रकम बकाया है। यह रकम पूरे 305 करोड़ 97 लाख रुपए है। यह वसूली साल 2017 से लंबित पड़ी है। इतने सालों में भी खनिज विभाग यह रकम वसूल नहीं कर पाया। नियम के मुताबिक जुर्माना न चुकाने पर खदान संचालकों को ब्लैकलिस्ट कर देना चाहिए था। साथ ही उनका खनन कार्य तुरंत रोक देना चाहिए था। वहीं, इन रसूखदार माफियाओं पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।



रसूखदारों को मिला तोहफे जैसा फायदा

याचिका में एक चौंकाने वाला दावा भी किया गया है। पुराने करोड़ों रुपए दबाकर बैठे खनन माफियाओं की खदानें रिन्यू (नवीनीकरण) कर दी गई हैं। इतना ही नहीं, उन्हें नई जगहों पर खनन के लिए भी नई लीजें दे दी गई हैं। इससे साफ है कि उनकी पेनल्टी न चुकाने वाली बात को पूरी तरह नजरअंदाज किया गया है। यह मामला सरकारी सिस्टम में बड़ी लापरवाही की तरफ इशारा करता है।



बिलौआ-बेरजा में जमीन को बना दिया गहरा गड्ढा

याचिकाकर्ता ने कोर्ट को एक और गंभीर बात बताई है। ग्वालियर जिले के बिलौआ और बेरजा इलाके में काले पत्थर यानी क्रशर गिट्टी का सबसे बड़ा कारोबार होता है। यहां नियमों को पूरी तरह नजरअंदाज कर अवैध खनन किया गया है। इस अंधाधुंध खनन से पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचा है। बिलौआ इलाके में अवैध खनन करने वालों ने जमीन को बेहद गहरे गड्ढों में बदल दिया है। यह गड्ढे करीब 25 से 30 मीटर यानी लगभग 100 फीट गहरे हैं। इतनी गहरी खुदाई से आसपास के इलाके में भी खतरा बढ़ गया है।



सरकारी खजाने का पैसा गया माफिया की जेब में

खनिज विभाग ने पहले भी इन इलाकों की जांच कराई थी। उस जांच में बड़े पैमाने पर अवैध उत्खनन की पुष्टि हुई थी। याचिका के मुताबिक माफिया यहां से कई हजार घनमीटर कीमती काला पत्थर निकाल चुके हैं। यह पत्थर बाजार में बेचकर भारी मुनाफा कमाया गया। जो रकम सरकारी खजाने में आनी चाहिए थी, वह सीधे माफिया की जेब में चली गई। इससे राज्य सरकार को बड़ा आर्थिक नुकसान हुआ है।



प्रशासनिक लापरवाही पर उठे सवाल

इस पूरे मामले से प्रशासनिक तंत्र की कार्यशैली पर भी सवाल उठते हैं। जब नियम साफ हैं, तो डिफॉल्टरों पर कार्रवाई में देरी क्यों हुई। यह सवाल अब हाईकोर्ट ने खुद उठाया है। कोर्ट का यह रुख दिखाता है कि न्यायपालिका इस गड़बड़ी को गंभीरता से ले रही है। अब सबकी निगाहें सरकार के जवाब पर टिकी हैं। छह जुलाई 2026 की सुनवाई में यह साफ होगा कि सरकार इस पर क्या रुख अपनाती है।



स्थानीय पर्यावरण को भी हुआ नुकसान

बिलौआ-बेरजा क्षेत्र में हुए इस अवैध खनन से सिर्फ सरकारी खजाने को नुकसान नहीं हुआ है। इससे स्थानीय पर्यावरण भी बुरी तरह प्रभावित हुआ है। गहरी खुदाई से जमीन की संरचना कमजोर हुई है। इससे आसपास रहने वाले लोगों की सुरक्षा को भी खतरा बढ़ा है। पर्यावरण को हुए इस नुकसान की भरपाई आसान नहीं होगी।



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