जमीन तय नहीं, अस्पताल बना नहीं, फिर भी हो रही डॉक्टरों की ट्रांसफर-पोस्टिंग

Amresh Kushwaha | Jun 30, 2026, 10:49 IST
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खजराना का सरकारी अस्पताल
खजराना का सरकारी अस्पताल

इंदौर के खजराना में छह साल पहले सिविल अस्पताल की घोषणा हुई थी। जमीन और भवन अब तक नहीं बने। फिर भी 87 पद स्वीकृत हैं और लगातार ट्रांसफर-पोस्टिंग हो रही है। स्टाफ दूसरे अस्पतालों में सेवा दे रहा है।

समझें क्या है पूरा मामला...

  • इंदौर के खजराना में 23 जून 2020 को सिविल अस्पताल बनाने की घोषणा हुई थी।
  • 100 बिस्तर के इस अस्पताल के लिए 87 पद स्वीकृत किए गए थे।
  • 6 साल बाद भी अस्पताल के लिए जमीन तय नहीं हो सकी।
  • भवन और जमीन न होने के बावजूद स्टाफ की पोस्टिंग लगातार होती रही।
  • 15 जून 2026 को भी एक लैब टेक्नीशियन की पदस्थापना इसी अस्पताल में हुई।

जो अस्पताल बना ही नहीं, उसमें स्टाफ की भरमार

खजराना और आसपास के इलाके में रहने वाले तीन लाख से ज्यादा लोगों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधा देने का वादा छह साल पहले किया गया था। मध्य प्रदेश सरकार ने 23 जून 2020 को यहां सिविल अस्पताल बनाने की मंजूरी दी थी। यह अस्पताल 100 बिस्तरों का होना था। इसके लिए 87 पद भी स्वीकृत कर दिए गए थे। वहीं, आज तक इस अस्पताल के लिए जमीन ही तय नहीं हो पाई है। हैरानी की बात यह है कि अस्पताल का अस्तित्व ही नहीं है, फिर भी इसके नाम पर पदस्थापना लगातार होती जा रही है।

ताजा आदेश 15 जून 2026 को जारी हुआ था। इस आदेश में एक लैब टेक्नीशियन की पदस्थापना इसी सिविल अस्पताल खजराना में की गई। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इससे पहले भी विशेषज्ञ डॉक्टर, चिकित्सा अधिकारी, स्टाफ नर्स और कई दूसरे पद इसी अस्पताल के नाम पर स्वीकृत हो चुके हैं। मध्य प्रदेश सरकार ने अस्पताल स्थापना की मंजूरी देते समय विशेषज्ञ डॉक्टर, चिकित्सा अधिकारी, स्टाफ नर्स, लैब टेक्नीशियन और फार्मासिस्ट सहित कुल 87 अतिरिक्त पद स्वीकृत किए थे।

चार साल से लगातार हो रही पदस्थापना

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, चार साल में लगातार इस अस्पताल के नाम पर कर्मचारियों की पदस्थापना की जा रही है। वहीं, हकीकत यह है कि अस्पताल का भवन बनना तो दूर, जमीन तक तय नहीं हुई है। इस वजह से यहां पदस्थ कर्मचारी पीसी सेठी अस्पताल, हुकुमचंद अस्पताल और अन्य सरकारी अस्पतालों में अटैच कर सेवा दे रहे हैं। यानी कागजों में तो वे खजराना अस्पताल के कर्मचारी हैं, लेकिन काम कहीं और कर रहे हैं।

इलाके में आज भी सरकारी अस्पताल नहीं

खजराना, मूसाखेड़ी, तेजाजी नगर, बिचौली हप्सी और आसपास की कॉलोनियों की आबादी लगातार बढ़ रही है। इन इलाकों की मौजूदा आबादी तीन लाख से ज्यादा हो चुकी है। इतनी बड़ी आबादी के बावजूद इस इलाके में आज तक कोई सरकारी अस्पताल काम नहीं कर रहा है। यहां के मरीजों को इलाज के लिए दूर जाना पड़ता है। उन्हें एमवाय अस्पताल, एमटीएच, पीसी सेठी अस्पताल और जिला अस्पताल पर ही निर्भर रहना पड़ता है। इन अस्पतालों पर पहले से मरीजों का दबाव बहुत ज्यादा है। इसी बढ़ते दबाव को कम करने के लिए 2020 में नया सिविल अस्पताल मंजूर किया गया था। इसके बावजूद, यह योजना अब तक फाइलों से बाहर नहीं निकल सकी है।

जमीन का मामला छह साल से अटका हुआ है

स्थानीय स्वास्थ्य अधिकारियों ने इस अस्पताल के लिए जमीन उपलब्ध कराने को लेकर कई बार बैठकें की हैं। इन बैठकों में संबंधित अधिकारियों के सामने बार-बार प्रस्ताव भेजे गए था। शासन स्तर पर इस मसले पर पत्राचार भी काफी हुआ। वहीं, इतने प्रयासों के बाद भी अब तक जमीन का आवंटन नहीं हो पाया है। निर्माण कार्य भी शुरू नहीं हो सका है। नतीजा यह है कि यह पूरा मामला अब तक सिर्फ विभागीय रिकॉर्ड तक ही सीमित रह गया है।

जमीन नहीं मिली इसलिए स्टाफ कहीं और- CMHO

इस पूरे मामले पर सीएमएचओ (चीफ मेडिकल एंड हेल्थ ऑफिसर) डॉ माधव हसानी ने अपना पक्ष रखा है। उनके मुताबिक खजराना में प्रस्तावित अस्पताल के लिए जमीन का आवंटन अभी तक नहीं हो पाया है। इस बारे में वरिष्ठ कार्यालय से लंबे समय से पत्राचार जारी है। उन्होंने बताया कि जब तक जमीन नहीं मिलती, तब तक स्वीकृत स्टाफ को अन्य अस्पतालों में भेजा जा रहा है। इससे मरीजों को सेवा देने का काम रुकता नहीं है।

सिर्फ निर्माण में नहीं, हर स्तर पर देरी

इस मामले में सिर्फ भवन निर्माण की देरी नहीं हुई है। बड़ा सवाल यह है कि जब अस्पताल का भवन और जमीन ही नहीं है, तो छह साल से उसके नाम पर स्वीकृत पदों पर ट्रांसफर-पोस्टिंग किस आधार पर हो रही है। यदि अस्पताल समय पर बन जाता तो पूर्वी इंदौर की करीब तीन लाख आबादी पर एमवाय, पीसी सेठी और जिला अस्पताल का दबाव काफी हद तक कम हो सकता था। वहीं, देरी की वजह से यह फायदा मरीजों को अब तक नहीं मिल पाया है।

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