इंदौरी आलू से लेकर सिवनी के सीताफल तक MP की इन 9 फसलों को मिला GI टैग

Aman Vaishnav | Jun 29, 2026, 10:30 IST
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मध्यप्रदेश के किन किन प्रॉडक्ट्स को GI टैग मिला है
मध्यप्रदेश के किन किन प्रॉडक्ट्स को GI टैग मिला है

मध्य प्रदेश के 9 बेहतरीन कृषि उत्पादों को जीआई टैग मिला है। इनमें सिताही कुटकी, बुरहानपुर का केला और रतलाम की बालम ककड़ी जैसी खास फसलें भी शामिल हैं। रतलाम के सबसे ज्यादा यानी चार उत्पादों को जीआई टैग मिल चुका है।

समझें क्या है पूरा मामला...

  • मध्य प्रदेश की नौ प्रमुख कृषि उपजों को जीआई टैग मिल गया है।
  • इनमें डिंडोरी की सिताही और नागदमन कुटकी, बैगानी अरहर, छत्रिय धान शामिल हैं।
  • रतलाम के गराडू और बालम ककड़ी को भी यह खास पहचान मिली है।
  • सिवनी का जंबो सीताफल, बुरहानपुर का केला और इंदौर का मालवी आलू भी इस सूची में हैं।
  • इससे लाखों आदिवासी और सामान्य किसानों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार मिलेंगे।
MP GI Tags:मध्य प्रदेश के किसानों के लिए बड़ी खुशखबरी का वक्त है। प्रदेश की नौ कृषि उपजों को एक साथ जीआई टैग मिला है। यह टैग किसी उत्पाद की उत्पत्ति को कानूनी मान्यता देता है।

इसका सीधा फायदा यह है कि अब ये उपजें दुनिया के किसी भी बाजार में अपने मूल क्षेत्र के नाम से पहचानी जाएंगी। नकली उत्पाद बेचना कानूनी अपराध होगा। किसानों को उपज का बेहतर दाम मिलेगा और निर्यात के नए दरवाजे खुलेंगे।

जीआई टैग मिलता कैसे है

बता दें कि जीआई टैग पाने के लिए हर उत्पाद को कुछ जरूरी मानकों पर खरा उतरना होता है।

  • पहली शर्त यह है कि उत्पाद किसी खास भौगोलिक क्षेत्र से जुड़ा हो। उस क्षेत्र की मिट्टी, जलवायु, पानी या परंपरागत तरीकों के कारण उत्पाद में अनोखी विशेषता होनी चाहिए।
  • दूसरी शर्त है उत्पाद की ऐतिहासिक या सांस्कृतिक पहचान। उसे उस क्षेत्र से जोड़ने वाले दस्तावेज, साक्ष्य या परंपरा होनी चाहिए।
  • तीसरी जरूरत है उत्पादकों का एक संगठित समूह। कोई किसान उत्पादक संगठन, सहकारी संस्था या सरकारी विभाग आवेदन कर सकता है।
  • चौथी शर्त है उत्पाद की गुणवत्ता के मानक तय होना। कच्चे माल से लेकर उत्पादन प्रक्रिया तक हर चीज दस्तावेज में होनी चाहिए।
  • पांचवीं जरूरत है तकनीकी रिपोर्ट। कृषि विश्वविद्यालय या वैज्ञानिक संस्था से उत्पाद के विशेष गुणों की पुष्टि करवानी होती है।
इसके बाद भौगोलिक संकेतक रजिस्ट्री, चेन्नई में आवेदन होता है। परीक्षण और आपत्ति प्रक्रिया के बाद ही टैग मिलता है।

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डिंडोरी की कुटकी को मिली पहचान

डिंडोरी की दो किस्मों, सिताही कुटकी और नागदमन कुटकी को जीआई टैग मिला है।

सिताही कुटकी एक देशी किस्म की छोटी बाजरा है। यह सिर्फ 60 दिन में तैयार हो जाती है। सूखा, कम नमी और पहाड़ी बंजर जमीन में भी यह बखूबी उगती है।

डिंडोरी में इसकी खेती 10 हजार 395 हेक्टेयर में होती है। करीब 60 हजार आदिवासी किसान इससे जुड़े हैं। डिंडोरी, मंडला, अनूपपुर, छिंदवाड़ा, शहडोल, उमरिया और बालाघाट के किसानों को सीधा फायदा होगा।

नागदमन कुटकी अपने औषधीय गुणों के लिए जानी जाती है। इसकी पोषण मूल्य भी अधिक है।

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बैगानी अरहर और छत्रिय धान को भी जीआई टैग

इसके अलावा बैगानी अरहर और छत्रिय धान को भी जीआई टैग मिला है। बैगानी अरहर में बैंगनी रंग की झलक होती है। इसमें भरपूर प्रोटीन है और रोग प्रतिरोधक क्षमता जबरदस्त है।

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रतलाम बना चार टैग वाला पहला जिला

रतलाम ने मध्य प्रदेश में नया कीर्तिमान बनाया है। यहां की बालम ककड़ी और गराडू को जीआई टैग मिलने के बाद अब रतलाम के चार उत्पादों के पास यह खास पहचान है। इससे पहले रतलाम की सेव और रियावन सिल्वर लहसुन को यह टैग मिल चुका था।

बता दें कि प्रदेश में किसी और जिले के पास इतने उत्पादों का जीआई टैग नहीं है।

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बालम ककड़ी की खासियत

सैलाना के आदिवासी इलाके में उगने वाली बालम ककड़ी आम ककड़ी से बिल्कुल अलग है। भीतर से केसरिया और हरे रंग की यह ककड़ी अगस्त से सितंबर के बीच सिर्फ एक महीने मिलती है। करीब 100 हेक्टेयर में इसकी खेती होती है।

रतलाम का गराडू

गराडू रतलाम के बांगरोद, खेतलपुर, सेजावता और धमोतर इलाके में उगाया जाता है। यह एक खास किस्म का कंदमूल है। बाहर से कुरकुरा और अंदर से मुलायम यह स्नैक ठंड के मौसम में बिकता है। दिल्ली, मुंबई से लेकर दुबई तक इसके ऑर्डर आते हैं। करीब 120 हेक्टेयर में इसकी खेती होती है।

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सिवनी का जंबो सीताफल

सिवनी के जंबो सीताफल को भी जीआई टैग मिल गया है। यह सामान्य सीताफल से कहीं बड़ा होता है। इसका औसत वजन 200 से 650 ग्राम के बीच होता है। भूतबंधानी इलाके में कुछ फल 800 ग्राम से एक किलो तक के भी मिलते हैं।

यह फल बिना रासायनिक खाद के प्राकृतिक रूप से उगता है। इसलिए इसका स्वाद अलग होता है।

जिले में करीब 695 हेक्टेयर पर सीताफल की खेती होती है। हर साल करीब 6 हजार 90 मीट्रिक टन उत्पादन होता है। दिल्ली, मुंबई, नागपुर, रायपुर और वाराणसी इसके प्रमुख बाजार हैं।

सीताफल का इस्तेमाल फल के अलावा पल्प के रूप में भी होता है। आइसक्रीम, रबड़ी, लस्सी और मिठाइयां इससे बनती हैं। जिले में दो एफपीओ और तीन पल्प प्रोसेसिंग प्लांट पहले से काम कर रहे हैं।

2023 में इसके लिए आवेदन हुआ था। तीन साल की मेहनत के बाद अब यह मान्यता मिली है।

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बुरहानपुर का केला

बुरहानपुर अपने केले के लिए पूरे देश में जाना जाता है। प्रदेश की एकमात्र केला मंडी यहीं है। जिले में करीब 18 हजार 640 किसान केले की खेती करते हैं। यह खेती लगभग 26 हजार 120 हेक्टेयर जमीन पर होती है। हर साल 18 लाख 28 हजार मीट्रिक टन केला यहां पैदा होता है।

उत्तर भारत, कश्मीर और खाड़ी देशों में बुरहानपुर के केले की मांग है। जीआई टैग मिलने से यह मांग और बढ़ेगी। जिले में पीएमएफएमई योजना के तहत 55 से ज्यादा केला प्रोसेसिंग यूनिट भी काम कर रही हैं।

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इंदौर का मालवी आलू

इंदौर के मालवी आलू को भी जीआई टैग मिला है। यह रबी मौसम की प्रमुख फसल है। जिले में करीब 45,000 हेक्टेयर पर आलू की खेती होती है।

इंदौरी मालवी आलू में चीनी और स्टार्च कम होता है। इसीलिए इससे बने चिप्स तलने पर काले नहीं पड़ते। यही खासियत इसे बाजार में अलग बनाती है।

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FAQ

  1. जीआई टैग क्या होता है और किसानों को इससे क्या फायदा मिलता है?
    जीआई टैग यानी भौगोलिक संकेतक एक कानूनी पहचान है जो किसी उत्पाद को उसकी उत्पत्ति के आधार पर मिलती है। इससे नकली उत्पाद बेचना कानूनन अपराध हो जाता है। किसानों को बेहतर दाम, नए बाजार और निर्यात के मौके मिलते हैं।
  2. जीआई टैग पाने के लिए किसी उत्पाद में क्या खासियत होनी चाहिए?
    उत्पाद का किसी खास भौगोलिक क्षेत्र की मिट्टी, जलवायु या परंपरा से अनोखा जुड़ाव होना जरूरी है। उसकी गुणवत्ता के मानक तय होने चाहिए और तकनीकी वैज्ञानिक रिपोर्ट जरूरी है। किसान संगठन या सरकारी विभाग को भौगोलिक संकेतक रजिस्ट्री में आवेदन करना होता है।
  3. मध्य प्रदेश में अभी तक किन-किन उत्पादों को जीआई टैग मिला है?
    ताजा दौर में सिताही कुटकी, नागदमन कुटकी, बैगानी अरहर, छत्रिय धान, बालम ककड़ी, गराडू, जंबो सीताफल, बुरहानपुर केला और मालवी आलू को जीआई टैग मिला है। इससे पहले सीहोर शरबती गेहूं, रीवा सुन्दरजा आम, रतलाम सेव और रियावन सिल्वर लहसुन को भी यह टैग मिल चुका है।

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