देश में मानसून की बेरुखी से 51% हिस्से में सूखे का संकट: खरीफ फसलों पर मार, बढ़ सकती है महंगाई और आम आदमी की मुश्किलें

Aman Vaishnav & CHAKRESH | Sept 28, 2026, 11:18 IST
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देश के 51% हिस्से में सूखे जैसे हालात<br>
देश के 51% हिस्से में सूखे जैसे हालात

देश में मानसून की बारिश औसत से 15% कम रही है। खरीफ फसलों का रकबा और पैदावार घटने से महंगाई बढ़ने, ग्रामीण मांग गिरने और अर्थव्यवस्था पर दबाव आने का खतरा है। कम बारिश और अल नीनो के कारण चावल, दाल, मक्का और सोयाबीन जैसी खरीफ फसलों की पैदावार घटने का अनुमान है।

देश में मानसून की बेरुखी अर्थव्यवस्था के लिए नई मुसीबत बनती दिख रही है। खरीफ फसलों की पैदावार घटने का डर है। इससे खाद्य महंगाई बढ़ सकती है। ग्रामीण मांग भी कमजोर पड़ने का खतरा है। असर शेयर बाजार से लेकर आम आदमी की जेब तक दिख सकता है।

इकोनॉमिक रिसर्च एंड ट्रेनिंग फाउंडेशन के एडवाइजर जी. चंद्रशेखर ने इसका विश्लेषण किया है। उनके मुताबिक स्थिति चुनौतीपूर्ण बनी हुई है।

कैसी रही इस साल की बारिश

20 सितंबर तक देश में बारिश लंबी अवधि के औसत से 15% कम रही। मानसून भी जून में 4 दिन की देरी से आया। इसके बाद करीब तीन हफ्ते तक इसकी रफ्तार थमी रही।

जुलाई की बात करें तो बारिश की स्थिति कुछ सुधरी। लेकिन अगस्त और सितंबर में पर्याप्त बारिश नहीं हुई। मौसम के आधार पर देश में 36 सब-डिविजन हैं। इनमें से 19 में बारिश की कमी है। यह देश के करीब 51% इलाके के बराबर है। कुछ सब-डिविजन में बारिश सामान्य बताई जा रही है। पर वहां भी आंकड़ा सामान्य की न्यूनतम सीमा से कुछ ही ऊपर है।

अल नीनो का असर भी साथ चल रहा है। खाद की कीमतें ऊंची हैं और उपलब्धता सीमित है। इससे स्थिति और मुश्किल हो गई है। कमजोर बारिश और महंगी खाद का असर खरीफ फसलों पर दिखेगा। रकबा और पैदावार, दोनों घटने का अनुमान है।

किन इलाकों में सबसे ज्यादा कमी

कई प्रमुख कृषि क्षेत्रों में जरूरत से कम बारिश हुई है। इनमें पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात के हिस्से शामिल हैं। गुजरात में सौराष्ट्र और कच्छ प्रभावित हैं। महाराष्ट्र का मराठवाड़ा भी इसी सूची में है।

आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक और असम भी कम बारिश झेल रहे हैं। पूर्वोत्तर के लगभग पूरे इलाके में यही हाल है। ये सभी प्रमुख कृषि क्षेत्र हैं। इसलिए यहां की फसलों की कमजोरी का असर सीधे राष्ट्रीय उत्पादन पर दिखेगा।

खरीफ फसलों के आंकड़े

चंद्रशेखर की रिसर्च के मुताबिक लगभग हर फसल का रकबा और पैदावार पिछले साल से कम रह सकते हैं। रकबा लाख हेक्टेयर में है। उत्पादन लाख टन में है। कपास का आंकड़ा लाख गांठ में है। 2026 का अनुमान चंद्रशेखर की रिसर्च पर आधारित है।

  • चावल: रकबा 447 से घटकर 427। उत्पादन लक्ष्य 1,230, अनुमान 1,160 से 1,180। सरकारी अनुमान (2025) 1,248।
  • दलहन: रकबा 119 से घटकर 118। लक्ष्य 84, अनुमान 70 से 73। सरकारी अनुमान (2025) 76।
  • मक्का: रकबा 99 से घटकर 92। लक्ष्य 310, अनुमान 280 से 285। सरकारी अनुमान (2025) 305।
  • सोयाबीन: रकबा 124 से घटकर 122। लक्ष्य 148, अनुमान 95 से 100। सरकारी अनुमान (2025) 126।
  • कॉटन: रकबा 110 से घटकर 109। लक्ष्य 336, अनुमान 275 से 280। सरकारी अनुमान (2025) 290।
  • गन्ना: रकबा 59 से घटकर 58। लक्ष्य 5,000, अनुमान 4,400 से 4,500। सरकारी अनुमान (2025) 5,000।

अर्थव्यवस्था पर तीन बड़े असर

कमजोर मानसून का असर सिर्फ खेतों तक सीमित नहीं रहेगा। यह देश की आर्थिक विकास दर को धीमा कर सकता है। कई सेक्टर दबाव में आ सकते हैं। अर्थव्यवस्था की रफ्तार सुस्त पड़ने, महंगाई बढ़ने और रुपए में कमजोरी का खतरा है। यानी तीनों मोर्चों पर एक साथ चुनौती है।

ग्रामीण मांग घट सकती है

ग्रामीण आय बढ़ने की उम्मीद कम है। इससे रोजाना इस्तेमाल के सामान की मांग घट सकती है। इन्हें एफएमसीजी (FMCG – Fast Moving Consumer Goods) कहा जाता है। दोपहिया, साइकिल, कृषि उपकरण और सोलर उपकरणों की मांग भी घट सकती है।

आयात का बोझ बढ़ेगा

दलहन का आयात 70 लाख टन से ज्यादा रहने का अनुमान है। खाद्य तेल का आयात 160 से 170 लाख टन रह सकता है। कॉटन का आयात 70 लाख गांठ से ज्यादा हो सकता है। इन तीनों का आयात बढ़ना तय बताया गया है। इससे पहले से कमजोर रुपए पर दबाव और बढ़ेगा।

थ्री-सी की बड़ी चुनौती

नीति-निर्माताओं यानी सरकार के सामने अब तीन चुनौतियां हैं। पहली है क्रूड, यानी ऊर्जा की महंगाई। दूसरी है क्रॉप्स, यानी खाद्य महंगाई। तीसरी है करेंसी, यानी महंगा आयात। तीनों मोर्चों पर चुनौती एक साथ खड़ी है।

शेयर बाजार पर क्या असर होगा

महंगाई से मांग कमजोर पड़ने पर सेंसेक्स पर भी दबाव बन सकता है। कुछ सेक्टरों के शेयरों पर असर साफ दिख सकता है।

  • एग्रीकल्चर और एफएमसीजी: बीज, खाद, एग्रोकेमिकल्स, दोपहिया और एफएमसीजी कंपनियां ग्रामीण मांग पर निर्भर हैं। इन पर दबाव आ सकता है।
  • बुलियन और गोल्ड लोन: पुराने सोने-चांदी के गहनों की स्क्रैप सेल बढ़ सकती है। गोल्ड लोन में तेज बढ़ोतरी देखी जा सकती है।
  • बैंकिंग सेक्टर: कर्ज न चुका पाने के मामले बढ़ सकते हैं। लोन की मांग में कमी आ सकती है। इससे एसेट क्वालिटी कमजोर पड़ सकती है। यानी एनपीए (NPA – Non-Performing Asset) बढ़ सकता है।

सरकार के पास चार विकल्प

  1. एथेनॉल बनाने के लिए चावल, मक्का और गन्ने के इस्तेमाल पर कुछ पाबंदी लगाई जा सकती है।
  2. कच्चे खाद्य तेल के आयात पर अभी 10% सीमा शुल्क लागू है। इसे हटाकर रिफाइंड तेल का आयात व्यावहारिक बनाया जा सकता है।
  3. दलहन आयात नीति मार्च 2027 तक जारी रखी जा सकती है। जरूरत पड़ी तो आगे भी। इसे सरकार के लिए कारगर रणनीति बताया गया है।
  4. करीब 80 करोड़ लोगों को मुफ्त राशन मिल रहा है। इसमें 5 किलो चावल या गेहूं मिलता है। इसकी मात्रा बढ़ाने पर विचार किया जा सकता है>

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