MP 108 Ambulance Service: एम्बुलेंस सेवा के करोड़ों के भुगतान पर उठे सवाल, लोकायुक्त की एंट्री से बढ़ी हलचल

Ramanand Tiwari | Oct 13, 2026, 20:02 IST
मध्यप्रदेश की 108 एम्बुलेंस सेवा के संचालन और भुगतान पर उठे गंभीर सवाल
मध्यप्रदेश की 108 एम्बुलेंस सेवा एक बार फिर सवालों के घेरे में है। मरीजों को समय पर अस्पताल पहुंचाने वाली इस सेवा के संचालन और भुगतान को लेकर गंभीर शिकायत सामने आई है। शिकायत में कुछ ऐसे मुद्दे उठाए गए हैं, जिनसे सरकारी पैसों के इस्तेमाल और विभाग की निगरानी पर सवाल खड़े हो रहे हैं। अब मामला लोकायुक्त तक पहुंच गया है।
Madhya Pradesh's 108 ambulance service faces allegations of irregularities in operations, patient records, and payments, with the complaint reaching the Lokayukta.

करोड़ों का भुगतान, हिसाब कहां?

₹948 करोड़ के कथित भुगतान पर उठे सवाल।



प्रमुख सचिव और एनएचएम संचालक से जवाब मांगा।



मरीजों के अधूरे रिकॉर्ड पर सत्यापन का सवाल।



दूसरे राज्य के नंबरों पर एम्बुलेंस चलने का आरोप।



25 नवंबर तक तथ्यात्मक रिपोर्ट देने को कहा।



राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन से जुड़ी शिकायत पर लोकायुक्त ने मांगा जवाब

पहली चिट्ठी के बाद भी जवाब क्यों नहीं पहुंचा?

₹948 करोड़ के भुगतान से ज्यादा लोकायुक्त को विभागीय जवाब मिलने में कथित देरी अहम है। जानकारी के अनुसार, लोकायुक्त कार्यालय ने 5 जून 2026 को तथ्यात्मक प्रतिवेदन मांगा था। बाद के पत्र में प्रतिवेदन प्राप्त नहीं होने का उल्लेख करते हुए 25 नवंबर 2026 तक जवाब उपलब्ध कराने को कहा गया है।



ऐसे में सवाल उठता है कि जून में मांगी गई जानकारी अक्टूबर तक लोकायुक्त कार्यालय क्यों नहीं पहुंच सकी? क्या विभागीय स्तर पर रिकॉर्ड जुटाने में देरी हुई या जवाब तैयार करने की प्रक्रिया लंबित रही?



इस देरी का वास्तविक कारण संबंधित विभागों का पक्ष सामने आने के बाद ही स्पष्ट होगा।



108 एम्बुलेंस सेवा में अनियमितताओं का आरोप, एनएचएम अधिकारियों के खिलाफ शिकायत

प्रमुख सचिव और मिशन संचालक पर सवाल

राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के अंतर्गत संचालित 108 एम्बुलेंस और जननी एक्सप्रेस जैसी सेवाएं सीधे मरीजों की जिंदगी से जुड़ी हैं। शिकायत में वित्तीय अनियमितताओं की आशंका जताई गई है। इसलिए मामला केवल सेवा प्रदाता कंपनी तक सीमित नहीं रहता।



यह भी जांच का विषय है कि अनुबंध की निगरानी, भुगतान की स्वीकृति और सेवाओं के सत्यापन की जिम्मेदारी किन अधिकारियों के पास थी।



लोकायुक्त ने प्रमुख सचिव और मिशन संचालक से तथ्यात्मक प्रतिवेदन मांगा है। हालांकि इससे किसी अधिकारी की व्यक्तिगत संलिप्तता या दोष सिद्ध नहीं होता।



₹948 करोड़ का भुगतान, लेकिन सत्यापन किस आधार पर?

शिकायत के अनुसार, जय अम्बे इमरजेंसी सर्विस को वर्ष 2024 तक लगभग ₹948 करोड़ का भुगतान किया गया। यह आंकड़ा शिकायत में दिया गया है। स्वतंत्र ऑडिट या सरकारी भुगतान विवरण के बिना इसे अंतिम सत्यापित राशि नहीं माना जा सकता।



मूल प्रश्न यह है कि भुगतान से पहले किन दस्तावेजों का मिलान किया गया? क्या एम्बुलेंस की वास्तविक यात्राओं, जीपीएस रिकॉर्ड और मरीजों को अस्पताल पहुंचाने की जानकारी का नियमित सत्यापन हुआ?



यदि भुगतान किलोमीटर आधारित था, तो हर यात्रा का प्रमाण और उसकी स्वीकृति प्रक्रिया जांच के केंद्र में होनी चाहिए।



मरीज का रिकॉर्ड अधूरा तो किलोमीटर का हिसाब कैसे?

शिकायत के मुताबिक डिंडोरी और शहडोल के कुछ मरीजों के रिकॉर्ड में जरूरी जानकारियां नहीं थीं। ऐसे में सवाल है कि संबंधित एम्बुलेंस की यात्रा किस आधार पर सत्यापित हुई?



हालांकि अधूरा रिकॉर्ड अपने आप फर्जी भुगतान साबित नहीं करता। कॉल सेंटर डेटा, अस्पताल में भर्ती रिकॉर्ड, जीपीएस और वाहन लॉगबुक का मिलान करके ही वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकती है।



विदिशा में एम्बुलेंस के 500 से 600 किलोमीटर तक संचालन के उल्लेख की भी अवधि और परिस्थितियों सहित जांच आवश्यक है।



दूसरे राज्य के नंबर वाली एम्बुलेंस का मामला

शिकायत में मध्य प्रदेश में छत्तीसगढ़ पंजीकरण वाली एम्बुलेंस संचालित होने का आरोप लगाया है। दूसरे राज्य में पंजीकृत वाहन का संचालन अपने आप अवैध नहीं है। इसकी वैधता पंजीकरण, परमिट, कर संबंधी प्रावधानों और लागू नियमों के अनुपालन पर निर्भर करती है।



इसलिए जांच में यह स्पष्ट होना चाहिए कि संबंधित वाहनों के दस्तावेज वैध थे या नहीं और अनुबंध की शर्तों का पालन किया गया या नहीं।



कर्मचारियों के अधिकारों पर भी उठे सवाल

शिकायत में एम्बुलेंस कर्मचारियों की नियुक्ति, वेतन, ड्यूटी अवधि और श्रम कानूनों के अनुपालन की जांच की मांग की गई है।



इन आरोपों की पुष्टि के लिए वेतन रजिस्टर, उपस्थिति रिकॉर्ड, कर्मचारी अनुबंध और संबंधित वैधानिक दस्तावेजों की जांच जरूरी होगी।



शिकायतकर्ता का पक्ष, लेकिन जांच का केंद्र सरकारी रिकॉर्ड

कांग्रेस नेता मुकेश नायक और पुनीत टंडन ने इस मामले में सवाल उठाए थे। पुनीत टंडन ने शपथ-पत्र के साथ लोकायुक्त कार्यालय में शिकायत दर्ज कराने की जानकारी दी है। उनका कहना है कि भुगतान और संचालन की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।



लेकिन इस प्रकरण का निर्णायक पहलू राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि सरकारी दस्तावेज और विभागीय जवाब हैं।



25 नवंबर तक क्या स्पष्ट करना होगा विभाग को?

लोकायुक्त कार्यालय द्वारा मांगे गए तथ्यात्मक प्रतिवेदन के संदर्भ में भुगतान, अनुबंध, वाहन संचालन और रिकॉर्ड सत्यापन से जुड़े सवाल महत्वपूर्ण हैं।



विशेष रूप से यह स्पष्ट होना चाहिए कि ₹948 करोड़ के कथित भुगतान में कितनी राशि किस अवधि में दी गई, किन अधिकारियों ने स्वीकृति दी और अनियमितताओं की शिकायतों पर विभाग ने क्या कार्रवाई की।



सबसे बड़ा सवाल: यदि भुगतान और निगरानी की पूरी व्यवस्था नियमों के अनुसार चल रही थी, तो लोकायुक्त को मांगा गया तथ्यात्मक जवाब समय पर क्यों नहीं मिल सका?



अब निगाहें 25 नवंबर की समयसीमा और विभागीय प्रतिवेदन पर रहेंगी। लोकायुक्त द्वारा तथ्यात्मक प्रतिवेदन मांगना जांच प्रक्रिया का हिस्सा है। इसे भ्रष्टाचार प्रमाणित होने, किसी अधिकारी के दोषी पाए जाने या दंडात्मक कार्रवाई का आदेश नहीं माना जाना चाहिए।



FAQs:

  1. ₹948 करोड़ के भुगतान पर सवाल क्यों उठे हैं?
    ₹948 करोड़ के भुगतान पर सवाल इसलिए उठे हैं क्योंकि इसमें वित्तीय अनियमितताओं की आशंका जताई गई है और मरीजों के अधूरे रिकॉर्ड के आधार पर सेवाओं के सत्यापन का मुद्दा सामने आया है।
  2. क्या जांच में प्रमुख सचिव और मिशन संचालक की भूमिका पर सवाल उठाए गए हैं?
    हां, जांच में प्रमुख सचिव और मिशन संचालक की भूमिका पर सवाल उठाए गए हैं, क्योंकि वे राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के अंतर्गत एम्बुलेंस सेवाओं की निगरानी और भुगतान की स्वीकृति के लिए जिम्मेदार थे।
  3. लोकायुक्त ने जानकारी देने के लिए क्यों कहा है?
    लोकायुक्त ने ₹948 करोड़ के भुगतान और संबंधित अनियमितताओं की जांच के लिए तथ्यात्मक प्रतिवेदन मांगते हुए 25 नवंबर तक जानकारी उपलब्ध कराने का निर्देश दिया है।
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