एमपी बार चुनाव में बवाल: फॉर्म खारिज, 20 हजार नाम गायब, वकीलों का फूटा गुस्सा
News in Short
- करीब 20 हजार मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से हटाए जाने का आरोप।
- फॉर्म निरस्तीकरण को लेकर अधिवक्ताओं में भारी नाराजगी।
- पहले अनुमति, बाद में नियम बदलकर प्रत्याशियों के फॉर्म खारिज करने का आरोप।
- कोर्ट परिसरों में पोस्टर-बैनर लगाकर नियमों के उल्लंघन की शिकायत।
- अधिवक्ताओं ने की निष्पक्ष जांच और चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता की मांग।
News in detail
मध्यप्रदेश राज्य अधिवक्ता परिषद के चुनाव अब गंभीर विवादों में फंस गए हैं। ये चुनाव सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों और तय समय-सीमा के तहत हो रहे हैं। बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) ने "एक व्यक्ति-एक पद" जैसे संशोधित नियम लागू किए हैं।
इन नियमों के क्रियान्वयन को लेकर अधिवक्ताओं में असंतोष बढ़ रहा है। हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष धन्य कुमार जैन ने आरोप लगाया है कि चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी है और नियमों का सही तरीके से पालन नहीं हो रहा।
वोटर लिस्ट से हजारों नाम हटाने पर सवाल
अधिवक्ता धन्य कुमार जैन ने चुनाव प्रक्रिया पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका दावा है कि लगभग 20 हजार से अधिक मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से बिना कारण हटाए गए हैं। उन्होंने कहा कि इतने बड़े स्तर पर नाम काटे जाने के बावजूद प्रभावित अधिवक्ताओं को आपत्ति दर्ज कराने का समय नहीं दिया गया। इससे चुनाव की निष्पक्षता पर सवाल उठ रहे हैं और हजारों वकीलों के मतदान अधिकार प्रभावित हो रहे हैं।
फॉर्म निरस्तीकरण बना सबसे बड़ा विवाद
चुनाव प्रक्रिया में सबसे बड़ा विवाद नामांकन फॉर्म निरस्त किए जाने को लेकर सामने आया है। हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष धन्य कुमार जैन ने आरोप लगाया कि चुनाव समिति ने पहले कहा था कि बार एसोसिएशन के पदाधिकारी भी चुनाव लड़ सकते हैं। उनसे हलफनामा और शुल्क भी लिया गया। लेकिन बाद में नियमों की अलग व्याख्या करते हुए कई प्रत्याशियों के नामांकन फॉर्म खारिज कर दिए गए। अधिवक्ताओं का कहना है कि यह निर्णय न केवल विरोधाभासी है, बल्कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ भी है।
BCI के नए नियमों के क्रियान्वयन पर विवाद
बार काउंसिल ऑफ इंडिया द्वारा लागू किए गए "एक व्यक्ति-एक पद" नियम को लेकर अब भ्रम और विवाद की स्थिति बन गई है। अधिवक्ताओं का कहना है कि इस नियम की सही व्याख्या और समय पर दिशा-निर्देश न मिलने के कारण उम्मीदवारों के साथ अन्याय हो रहा है। कई प्रत्याशियों का आरोप है कि पहले उन्हें चुनाव लड़ने की अनुमति दी गई और बाद में उसी आधार पर उनके फॉर्म खारिज कर दिए गए, जिससे प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठ रहे हैं।
अधिवक्ताओं में बढ़ा आक्रोश
इन सभी विवादों के बीच अब अधिवक्ताओं में आक्रोश बढ़ता जा रहा है। कई वकील इस पूरे मामले को उच्च स्तर तक ले जाने की तैयारी में हैं और निष्पक्ष जांच की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि यदि चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित नहीं की गई, तो यह न केवल बार काउंसिल की विश्वसनीयता को प्रभावित करेगा बल्कि अधिवक्ताओं के लोकतांत्रिक अधिकारों पर भी सीधा असर डालेगा।
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