MP हाईकोर्ट का ऐतिहासिक आदेश: जन्मतिथि अनुमान आधारित हो तो मार्कशीट सबूत नहीं मानी जाएगी
Jitendra Shrivastava | Apr 16, 2026, 23:14 IST
Photograph: (THESOOTR)
BHOPAL. MP हाईकोर्ट ने कहा कि दुष्कर्म मामले में उम्र विवादास्पद हो तो मार्कशीट सबूत (Marksheet Evidence) मान्य नहीं होगी। आरोपी दिनेश लोधी की 15 साल सजा निरस्त।
News In Short
- मार्कशीट उम्र प्रमाण के लिए अकेली मान्य नहीं।
- जन्मतिथि अनुमान पर लिखी गई थी।
- स्कूल रजिस्टर में ओवरराइटिंग पाई गई।
- पीड़िता ने स्वयं 19 वर्ष उम्र बताई थी।
- आरोपी की 15 साल की सजा निरस्त हुई।
News In Detail
MP हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण आदे
यदि पीड़िता की आयु को लेकर पुख्ता प्रमाण न हों, तो केवल अंकसूची में दर्ज जन्मतिथि सजा का आधार नहीं बन सकती। यह फैसला दुष्कर्म मामलों (Rape Cases) में साक्ष्य की विश्वसनीयता तय करने की दृष्टि से बेहद अहम है।
क्या था रायसेन का मामला?
निचली अदालत ने 21 फरवरी, 2025 को आरोपी को दोषी करार दिया था। ट्रायल कोर्ट (Trial Court) ने उसे 15 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। इस आदेश को चुनौती देते हुए आरोपी ने हाईकोर्ट में अपील दाखिल की थी।
आरोपी की अपील और दलीलें
सुनवाई के दौरान दस्तावेजों की बारीकी से जांच की गई। इस जांच में कई महत्वपूर्ण खामियां उजागर हुईं। साक्ष्यों (Evidence) की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए।
स्कूल रजिस्टर में ओवरराइटिंग की पुष्टि
संबंधित स्कूल के शिक्षक ने गवाही में स्वीकार किया कि जन्मतिथि केवल पिता के मौखिक कथन पर दर्ज की गई थी। कोई आधिकारिक प्रमाण पत्र (Birth Certificate) उपलब्ध नहीं था। इससे जन्मतिथि की प्रामाणिकता (Authenticity of Date of Birth) पर गंभीर संदेह उत्पन्न हुआ।
पिता की गवाही और अहम तथ्य
यह भी सामने आया कि पीड़िता और आरोपी ने आठ मार्च, 2021 को बोरास मंदिर में रीति-रिवाज से विवाह (Marriage) किया था। दोनों वैवाहिक जीवन जी रहे थे। इन तथ्यों ने मामले की दिशा बदल दी।
पीड़िता का स्वयं का बयान निर्णायक
पीड़िता ने अपनी उम्र 19 वर्ष बताई थी। उसने स्पष्ट कहा कि कोई गलत घटना नहीं हुई। न्यायालय ने पीड़िता के बालिग होने की प्रबल संभावना (Strong Possibility of Being Adult) को नजरअंदाज करना उचित नहीं माना। इसके आधार पर ट्रायल कोर्ट की सजा निरस्त कर दी गई।
फैसले का कानूनी महत्व
महज अंकसूची में दर्ज जन्मतिथि को संदेहास्पद स्थिति में मान्यता नहीं दी जा सकती। यह निर्णय भविष्य के दुष्कर्म मामलों में साक्ष्य मानकों को परिभाषित करेगा। न्यायालय ने साक्ष्य की गुणवत्ता (Quality of Evidence) को सर्वोच्च प्राथमिकता दी।
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