एमपी के भगवानदास रैकवार को मिला पद्मश्री, बुंदेली मार्शल आर्ट के क्षेत्र में सम्मान

Sandeep Kumar | Jan 26, 2026, 17:00 IST
mp bhagwandas raikwar
सागर के भगवानदास रैकवार को बुंदेली मार्शल आर्ट के संरक्षण और प्रदर्शन के लिए पद्मश्री सम्मान दिया गया। यह बुंदेली कलाओं के लिए एक बड़ी उपलब्धि है।

News in Short



  • भगवानदास रैकवार को बुंदेली मार्शल आर्ट के संरक्षण के लिए पद्मश्री सम्मान मिला।
  • रैकवार ने बुंदेली कला को मंचीय प्रस्तुति के लायक बनाया और इसे जीवित रखा।
  • वह सागर और बुंदेलखंड की छत्रसाल व्यायामशाला के उस्ताद हैं।
  • रैकवार के अनुसार, आधुनिकीकरण और फिल्मों ने पारंपरिक कलाओं को नुकसान पहुंचाया है।
  • बुंदेलखंड की पारंपरिक कलाओं को सहेजने के लिए रैकवार ने युवा पीढ़ी को प्रेरित किया।

News in Detail

सागर के अखाड़ा उस्ताद भगवानदास रैकवार को यह सम्मान दिया गया। उन्हें यह सम्मान बुंदेली मार्शल आर्ट की कला के संरक्षण और प्रदर्शन के लिए मिला है। भगवानदास रैकवार ने कहा कि यह मेरी तपस्या का फल है। उन्होंने कहा कि बुंदेली कलाएं आज भी जीवित हैं। यह बुंदेलखंड के लिए बड़ी उपलब्धि है। यह दूसरा मौका है जब बुंदेली कला से जुड़े कलाकार को पद्मश्री सम्मान मिला है।



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कौन हैं भगवान दास रैकवार

पद्म श्री से सम्मानित भगवानदास रैकवार सागर के प्रसिद्ध नाम हैं। उनका जन्म 2 जनवरी 1944 को हुआ था। उन्होंने बुंदेली मार्शल आर्ट के संरक्षण के लिए जीवनभर मेहनत की। वह सागर और बुंदेलखंड की छत्रसाल व्यायामशाला के उस्ताद हैं। उन्होंने लाठी, भाला, ढाल, तलवार और त्रिशूल से युद्ध कला के करतब देश-दुनिया में प्रस्तुत किए। उन्हें श्रेय जाता है कि उन्होंने इन कलाओं को मंचीय प्रस्तुति के लायक बनाया। करीब 82 साल की उम्र में उन्हें यह सम्मान मिला, जिसे उन्होंने बुंदेलखंड और बुंदेली कलाओं के लिए समर्पित किया।



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मेरे जीवन की तपस्या रंग लाई

पद्म श्री सम्मान पर भगवानदास रैकवार ने मीडिया से कहा, यह बड़ी उपलब्धि है। मेरे जीवन की तपस्या रंग लाई है। भारत सरकार विलुप्त होती कलाओं को प्रोत्साहन दे रही है। यह बुंदेली कला और कलाकारों को सम्मान है।



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फिल्मों में इन कलाओं की नकल : रैकवार

भगवानदास रैकवार बुंदेली मार्शल आर्ट और अखाड़े के विलुप्त होने का कारण मानते हैं। वे कहते हैं, आधुनिकीकरण और डुप्लीकेसी से पारंपरिक कलाओं को नुकसान हुआ है। फिल्मों में इन कलाओं की नकल की जा रही है। नई पीढ़ी इसका महत्व समझ रही है। बच्चे जूडो कराटे पर ज्यादा ध्यान देते हैं और अखाड़े को कम महत्व देते हैं।"



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पहले मिल था रामसहाय पांडे को

रामसहाय पांडे को राई लोक नृत्य के लिए पद्मश्री मिला था। अब भगवानदास रैकवार को बुंदेली मार्शल आर्ट के लिए पद्मश्री मिला है। भगवानदास रैकवार ने कहा, बुंदेलखंड की कलाओं में दम है। ढिमरयाई, सैरा, मोनिया जैसे नृत्य हमारे पारंपरिक रूप को बचाए हुए हैं। युवा पीढ़ी को इन कलाओं को सीखना चाहिए। इससे हमारी लोक कला संस्कृति जिंदा रहेगी।"



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