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गणतंत्र दिवस से पहले पद्म पुरस्कारों की सूची जारी हुई है। इस सूची में देशभर के 45 हस्तियों का नाम पद्म श्री अवार्ड के लिए चुना गया है। इसमें मध्यप्रदेश के भगवान दास रायकवार, कैलाश चंद्र पंत, मोहन नागर और नारायण व्यास का नाम शामिल है। यह लोग अपने-अपने क्षेत्रों में लंबे समय से महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं।
इनके नाम का हुआ ऐलान....
- भगवान दास रायकवार (मध्य प्रदेश)
- भिकल्या लडक्या धिंडा (महाराष्ट्र)
- ब्रिज लाल भट्ट (जम्मू-कश्मीर)
- चरण हेम्ब्रम (ओडिशा)
- चिरंजी लाल यादव (उत्तर प्रदेश)
- डॉ. पद्मा गुरमेट (जम्मू-कश्मीर)
- कोल्लक्कयिल देवकी अम्मा जी (केरल)
- महेंद्र कुमार मिश्रा (ओडिशा)
- नरेश चंद्र देव वर्मा (त्रिपुरा)
- ओथूवर तिरुथानी (तमिलनाडु)
- रघुपत सिंह (उत्तर प्रदेश)
- रघुवीर खेडकर (महाराष्ट्र)
- राजस्तापति कालीअप्पा गौंडर (तमिलनाडु)
- सांग्युसांग एस. पोंगेनर (नागालैंड)
- श्रिरंग देवबा लाड (महाराष्ट्र)
- थिरुवरूर बख्तवसलम (तमिलनाडु)
- अंके गौड़ा (कर्नाटक)
- आर्मिदा फर्नांडीस (महाराष्ट्र)
- डॉ. श्याम सुंदर (उत्तर प्रदेश)
- गफरुद्दीन मेवाती (राजस्थान)
- खेम राज सुंद्रीयाल (हरियाणा)
- मीर हाजीभाई कसामभाई (गुजरात)
- मोहन नागर (मध्य प्रदेश)
- नीलेश मंडलेवाला (गुजरात)
- आर एंड एस गोडबोले (छत्तीसगढ़)
- राम रेड्डी ममिडी (तेलंगाना)
- सिमांचल पात्रो (ओडिशा)
- सुरेश हनागवाड़ी (कर्नाटक)
- तेची गूबिन (अरुणाचल प्रदेश)
- युनम जत्रा सिंह (मणिपुर)
- बुधरी ताथी (छत्तीसगढ़)
- डॉ. कुमारासामी थंगाराज (तेलंगाना)
- डॉ. पुण्णियामूर्ति नटेासन (तमिलनाडु)
- हैली वॉर (मेघालय)
- इंदरजीत सिंह सिद्धू (चंडीगढ़)
- के. पाजनिवेल (पुडुचेरी)
- कैलाश चंद्र पंत (मध्य प्रदेश)
- नुरुद्दीन अहमद (असम)
- पोकीला लेकटेपी (असम)
- आर. कृष्णन (तमिलनाडु)
- एस. जी. सुशीलेम्मा (कर्नाटक)
- टागा राम भील (राजस्थान)
- विश्व बंधु (बिहार)
- धर्मिकलाल चूनीलाल पांड्या (गुजरात)
- शफी शौक (जम्मू-कश्मीर)
- नारायण व्यास ( मध्य प्रदेश)
जिनको मिलेगा सम्मान जानें उनके बारे संक्षेप में
अंके गौड़ा, कर्नाटक
कर्नाटक के अंके गौड़ा, जो पहले एक बस कंडक्टर थे, अब ‘ज्ञान रक्षक’ के रूप में मांड्या में ‘पुस्तक मने’ (किताबों का घर) चला रहे हैं। उनके निजी पुस्तकालय में 10 लाख से ज्यादा किताबें हैं, जिनमें 22 भारतीय और विदेशी भाषाएं शामिल हैं। उन्होंने ज्ञान के प्रसार के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया है और साहित्य तथा शिक्षा के क्षेत्र में उनकी सेवाओं के लिए उन्हें पद्म सम्मान से नवाजा गया है।आर्मिडा फर्नांडीज, महाराष्ट्र
‘स्नेहा’ संस्था की संस्थापक और नियोनाटोलॉजी में विशेषज्ञ डॉ. आर्मिडा फर्नांडीज ने 30 वर्षों से अधिक समय तक झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य की सेवा की है। उन्होंने मुंबई के सायन अस्पताल में देश का पहला ह्यूमन मिल्क बैंक स्थापित किया था। उन्हें स्वास्थ्य सेवा में उनके योगदान के लिए सम्मानित किया गया है।भगवान दास रायकवार, मध्य प्रदेश
बुंदेलखंड के प्रसिद्ध लोक नृत्य ‘राई’ के संरक्षक भगवान दास रायकवार ने दशकों तक इस पारंपरिक नृत्य को न केवल सिखाया, बल्कि देशभर में इसका प्रदर्शन भी किया। एक साधारण पृष्ठभूमि से आकर उन्होंने अपनी संस्कृति को जीवित रखा है। कला के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है।भिकल्या लडक्या ढिंडा, महाराष्ट्र
पालघर के आदिवासी कलाकार भिकल्या लडक्या ढिंडा ‘तारपा’ वाद्य यंत्र के उस्ताद हैं, जिन्होंने इसे विलुप्त होने से बचाया और नई पीढ़ी को इसके निर्माण और बजाने की कला सिखाई। वे वारली संस्कृति के महत्वपूर्ण हिस्से ‘तारपा’ के संरक्षक हैं और कला के क्षेत्र में उन्हें सम्मानित किया गया है।बृज लाल भट्ट, जम्मू और कश्मीर
कश्मीरी लोक संगीत के संरक्षक और धुमर के प्रसिद्ध कलाकार बृज लाल भट्ट ने कश्मीर में आतंकवाद के बावजूद अपनी गायकी से कश्मीरी पंडितों की सांस्कृतिक धरोहर को बचाया है। उन्हें कश्मीरी लोक संगीत के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए कला में सम्मानित किया गया है।बुदरी ताती, बस्तर, छत्तीसगढ़
बस्तर की आदिवासी महिला बुदरी ताती धोकरा कला और औषधीय ज्ञान के लिए प्रसिद्ध हैं। नक्सल प्रभावित क्षेत्र में रहते हुए भी उन्होंने आदिवासी परंपराओं को संरक्षित किया और सैकड़ों महिलाओं को स्वरोजगार से जोड़ा। समाज सेवा और कला के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है।चरण हेम्ब्रम, ओडिशा
संथाली भाषा के प्रसिद्ध लेखक और शिक्षाविद् चरण हेम्ब्रम ने संथाली साहित्य को मुख्यधारा में लाने के लिए कई प्रयास किए हैं। उन्होंने आदिवासी बच्चों को उनकी अपनी भाषा में शिक्षित करने और पाठ्यपुस्तकें तैयार करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए उन्हें पद्म सम्मान प्राप्त हुआ।चिरंजी लाल यादव, उत्तर प्रदेश
बिरहा लोक गायन के पुरोधा चिरंजी लाल यादव ने पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार में बिरहा गायकी के माध्यम से सामाजिक मुद्दों को उजागर किया। उनका गायन लोक इतिहास को संरक्षित करता है और वे कला के क्षेत्र में सम्मानित किए गए हैं।धार्मिकलाल चुन्नीलाल पंड्या, गुजरात
गुजरात की लुप्त होती भवाई लोक नाट्य परंपरा के संरक्षक 90 वर्षीय धार्मिकलाल चुन्नीलाल पंड्या ने 6 दशकों तक भवाई नाटकों के जरिए न केवल मनोरंजन किया, बल्कि समाज में जागरूकता भी फैलाई। उन्हें कला के क्षेत्र में सम्मानित किया गया है।गफरुद्दीन मेवाती जोगी, राजस्थान
राजस्थान के अलवर के गफरुद्दीन मेवाती जोगी भपंग वाद्य यंत्र के जादूगर हैं। वे मेवाती लोक संगीत की इस अनूठी विधा को वैश्विक मंच पर पहचान दिलाने के लिए प्रसिद्ध हैं। उन्होंने ‘जोगी’ परंपरा के माध्यम से रामायण और महाभारत की कथाएं भपंग पर गाई हैं।हेली वार, मेघालय
मेघालय के खासी संगीत के संरक्षण और निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली हेली वार ने पारंपरिक खासी वाद्य यंत्रों को सहेजने में अहम योगदान दिया है। वे पूर्वोत्तर की प्राचीन संस्कृति को संरक्षित करने के लिए काम कर रही हैं।इंद्रजीत सिंह सिद्धू, पंजाब
पशु कल्याण और लावारिस जानवरों की सेवा में समर्पित इंद्रजीत सिंह सिद्धू ने पंजाब में बीमार और घायल पशुओं के लिए आश्रय स्थल बनाए। वे मूक प्राणियों की सेवा के लिए बिना सरकारी मदद के वर्षों से काम कर रहे हैं।के. पजनीवेल, पुडुचेरी/तमिलनाडु
नादस्वरम के प्रख्यात वादक के. पजनीवेल ने दक्षिण भारतीय मंदिरों की परंपरा को जीवित रखने के लिए गुरु-शिष्य परंपरा को बनाए रखा। उनका अद्भुत वादन अगले पीढ़ी तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण रहा है।कैलाश चंद्र पंत, उत्तराखंड
उत्तराखंड के कुमाऊंनी भाषा और साहित्य के विद्वान कैलाश चंद्र पंत ने लोक कथाओं, मुहावरों और हिमालयी संस्कृति पर गहरे शोध किए हैं। उन्होंने क्षेत्रीय भाषा को सम्मान दिलाने में अहम योगदान दिया है।खेम राज सुंद्रियाल, उत्तराखंड/दिल्ली
वयोवृद्ध पत्रकार और लेखक खेम राज सुंद्रियाल ने पहाड़ के सरोकारों को राष्ट्रीय स्तर पर उठाया। उन्होंने हिमालयी पर्यावरण और वहां के जनजीवन की कठिनाइयों को लगातार उजागर किया है।कोल्लाक्कायिल देवकी अम्मा, केरल
‘वन की मां’ के नाम से मशहूर कोल्लाक्कायिल देवकी अम्मा ने बिना किसी औपचारिक प्रशिक्षण के 5 एकड़ जमीन को घने जंगल में बदल दिया। उन्होंने हजारों पेड़ लगाए और जैव विविधता का अद्वितीय उदाहरण पेश किया।कुमारसामी थंगराज, तेलंगाना
प्रसिद्ध वैज्ञानिक कुमारसामी थंगराज ने भारतीय जनसंख्या के जीनोमिक्स पर अभूतपूर्व शोध किया है। उनके अध्ययन ने भारतीय जाति व्यवस्था और अंडमान की जनजातियों की आनुवंशिक जड़ों को समझने में मदद की है।महेंद्र कुमार मिश्रा, ओडिशा
लोकगीत और आदिवासी संस्कृति के शोधकर्ता महेंद्र कुमार मिश्रा ने कालाहांडी और अन्य आदिवासी क्षेत्रों की मौखिक परंपराओं का दस्तावेजीकरण किया। इस योगदान से वहां की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत दुनिया के सामने आई।मीर हाजीभाई कासमभाई, गुजरात
गुजरात के कच्छ की बन्नी कढ़ाई और पारंपरिक कला के संरक्षक मीर हाजीभाई कासमभाई ने कच्छ के रेगिस्तान में इस हस्तकला को न केवल बचाया, बल्कि सैकड़ों कारीगरों को रोजगार भी दिलाया। उनकी कला में गुजरात के रंगों की जीवंतता दिखाई देती है।मोहन नगर, हरियाणा/दिल्ली
शिक्षाविद और लेखक मोहन नगर ने वंचित वर्ग के बच्चों की शिक्षा के लिए लंबा संघर्ष किया है। वे हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार और सामाजिक चेतना जगाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।नरेश चंद्र देव वर्मा, त्रिपुरा
त्रिपुरा के शाही परिवार से ताल्लुक रखने वाले नरेश चंद्र देव वर्मा ने आदिवासी कल्याण और राज्य की स्वदेशी संस्कृति के संरक्षण के लिए अपना जीवन समर्पित किया। उन्हें मरणोपरांत सम्मान मिला।नीलेश विनोदचंद्र मांडलेवाला, गुजरात
सूरत के ‘अंगदान दूत’ नीलेश विनोदचंद्र मांडलेवाला ने ‘डोनेट लाइफ’ संस्था के जरिए हजारों लोगों को अंगदान के लिए प्रेरित किया। उनके प्रयासों से कई मरते हुए मरीजों को नया जीवन मिला है।नूरुद्दीन अहमद, असम
असम के मोबाइल थिएटर के दिग्गज नूरुद्दीन अहमद बांस और स्थानीय सामग्री से भव्य सेट बनाने के लिए प्रसिद्ध हैं। उन्होंने असमिया रंगमंच को नया आयाम दिया है।ओतुवर थिरुथानी स्वामीनाथन, तमिलनाडु
प्राचीन शैव मंदिरों में गाए जाने वाले ‘तेवारम’ भजनों के गायक ओतुवर थिरुथानी स्वामीनाथन ने इस लुप्त होती परंपरा को जीवित रखा है। उन्होंने चोल कालीन गायन शैली को अपनी आवाज में पुनर्जीवित किया है।पद्मा गुरमेट, लद्दाख
लद्दाख की पारंपरिक पत्थर नक्काशी और मूर्तिकला के विशेषज्ञ पद्मा गुरमेट ने हिमालयी बौद्ध कला को संरक्षित किया है। कठोर मौसम और आधुनिकता के बावजूद वे पत्थरों में जान फूंकने का काम कर रहे हैं।पोखिला लेखतेपी, असम
कार्बी आंगलोंग की लोक गायिका पोखिला लेखतेपी ने कार्बी जनजाति के लोकगीतों और मौखिक इतिहास को अपनी गायकी के जरिए नई पीढ़ी को सौंपा है। वे पूर्वोत्तर की आदिवासी अस्मिता की सशक्त आवाज हैं।पुण्यमूर्ति नटेसन, तमिलनाडु
थप्पट्टम लोक नृत्य के गुरु पुण्यमूर्ति नटेसन ने दलित समुदाय से जुड़े इस प्राचीन ढोल वादन और नृत्य को सम्मानजनक मंच दिलाया और इसे सामाजिक बदलाव के हथियार के रूप में इस्तेमाल किया।आर. कृष्णन, तमिलनाडु
मदुरी के परोपकारी समाजसेवी आर. कृष्णन ने दशकों से गरीबों को भोजन और लावारिस शवों के अंतिम संस्कार का काम निस्वार्थ भाव से किया है। मानवता की सेवा उनके जीवन का मुख्य उद्देश्य रहा है।रघुपत सिंह, राजस्थान
रेगिस्तानी इलाके में जल संरक्षण और जैविक खेती के लिए काम करने वाले रघुपत सिंह ने पारंपरिक तरीकों से पानी बचाया और बंजर जमीन में खेती कर एक मॉडल प्रस्तुत किया।रघुवीर तुकाराम खेड़कर, महाराष्ट्र
तमाशा लोकनाट्य के दिग्गज कलाकार रघुवीर तुकाराम खेड़कर ने इस परंपरा को सम्मानित मंच दिलाया और इसे अश्लीलता के आरोपों से बाहर निकालकर एक सम्मानित लोककला के रूप में स्थापित किया।राजस्थपति कालियाप्पा गाउंडर, तमिलनाडु
गांधीवादी विचारक राजस्थपति कालियाप्पा गाउंडर ने ग्रामीण विकास और शिक्षा के क्षेत्र में काम किया। उन्होंने अपने गांव में स्कूल बनवाए और स्वच्छता अभियान चलाकर जीवन स्तर को ऊंचा किया।रामा रेड्डी मामिड़ी, तेलंगाना
तेलुगु साहित्य और भाषा आंदोलन के प्रमुख स्तंभ रामा रेड्डी मामिड़ी ने तेलंगाना की लोक संस्कृति और बोलियों पर व्यापक काम किया है। उनके लेखन ने स्थानीय अस्मिता को मजबूत किया है।रामचंद्र गोडबोले और सुनीता गोडबोले, महाराष्ट्र
डॉक्टर दंपति रामचंद्र और सुनीता गोडबोले ने आदिवासी स्वास्थ्य के लिए अपना जीवन समर्पित किया। उन्होंने मेलघाट में कुपोषण और बाल मृत्यु दर को कम करने के लिए ‘ट्रस्ट फॉर हेल्थ’ के जरिए वर्षों तक काम किया।एस. जी. सुशीलाम्मा, कर्नाटक
‘सुमंडली सेवा आश्रम’ की संस्थापक एस. जी. सुशीलाम्मा ने देवदासी प्रथा, बाल विवाह और घरेलू हिंसा की शिकार महिलाओं को आश्रय और रोजगार दिया। वे महिलाओं के सशक्तिकरण की मशाल थामे हुए हैं।संगयुसांग एस पोंगनर, नागालैंड
नागालैंड के पारंपरिक ‘लॉग ड्रम’ के संरक्षक संगयुसांग एस पोंगनर ने एओ नागा जनजाति की सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखा और युवाओं को अपनी जड़ों से जोड़ने का काम किया है।शफी शौक, जम्मू और कश्मीर
कश्मीरी भाषा के प्रख्यात विद्वान शफी शौक ने कश्मीरी साहित्य को आधुनिक संदर्भ में प्रस्तुत किया और कश्मीरी संस्कृति को दुनिया से परिचित कराया। उन्हें भाषा के सच्चे सेवक के रूप में सम्मानित किया गया है।श्रीरंग देवबा लाड, महाराष्ट्र
कोल्हापुर की कुश्ती और पारंपरिक कलाओं से जुड़े श्रीरंग देवबा लाड ने लोक कलाओं के संरक्षण में अहम भूमिका निभाई है। उन्होंने मिट्टी की कुश्ती को बढ़ावा दिया और ग्रामीण खेल संस्कृति के ध्वजवाहक बने हैं।श्याम सुंदर, उत्तर प्रदेश
कालाजार रोग के उन्मूलन में अहम योगदान देने वाले बीएचयू के वैज्ञानिक श्याम सुंदर ने इस बीमारी की सस्ती दवा और इलाज खोजने में अपना जीवन समर्पित किया है।सिमांचल पात्रो, ओडिशा
गंजाम जिले के लोक कलाकार सिमांचल पात्रो ने प्रह्लाद नाटक और मुखौटा नृत्य के जरिए ओडिशा की लोक परंपरा को जीवित रखा है। उन्होंने लकड़ी और कागज की लुगदी से मुखौटे बनाने की कला को संरक्षित किया है।सुरेश हनागवाड़ी, कर्नाटक
हीमोफीलिया के मरीजों के मसीहा सुरेश हनागवाड़ी ने ‘कर्नाटक हीमोफीलिया सोसाइटी’ की स्थापना की और हजारों गरीब मरीजों को महंगे इलाज और देखभाल मुफ्त या रियायती दरों पर उपलब्ध कराई।तगा राम भील, राजस्थान
राजस्थानी मांगणियार/भील परंपरा के लोक गायक तगा राम भील ने अपनी खनकती आवाज से राजस्थानी लोकगीतों को देश-विदेश के मंचों तक पहुंचाया। वे अपनी जड़ों से जुड़े रहे हैं।टेची गुबिन, अरुणाचल प्रदेश
नशामुक्ति और सामाजिक सुधार के लिए काम करने वाले टेची गुबिन ने युवाओं को नशे के चंगुल से निकाला और उन्हें खेलों व रचनात्मक कार्यों में व्यस्त किया।तिरुवरुर भक्तवत्सलम, तमिलनाडु
मृदंगम के दिग्गज वादक तिरुवरुर भक्तवत्सलम ने तंजावुर शैली को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया और शास्त्रीय संगीत में एक नई दिशा दी। उन्होंने सैकड़ों शिष्यों को तैयार किया है।विश्व बंधु, उत्तर प्रदेश/उत्तराखंड
स्वच्छता कर्मियों के अधिकारों के लिए काम करने वाले गांधीवादी विश्व बंधु ने मैला ढोने की कुप्रथा के खिलाफ संघर्ष किया और स्वच्छता कर्मियों के पुनर्वास और सम्मान के लिए काम किया।युमनाम जात्रा सिंह, मणिपुर
मणिपुरी ‘नट संकीर्तन’ और रासलीला के गुरु युमनाम जात्रा सिंह ने मणिपुर की आध्यात्मिक नृत्य परंपरा को जीवित रखा है। वे कला के माध्यम से शांति और भक्ति का संदेश फैला रहे हैं।
पद्म पुरस्कार देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान
पद्म पुरस्कार भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान हैं। ये तीन श्रेणियों में दिए जाते हैं। पद्म विभूषण, पद्म भूषण और पद्म श्री सम्मान। ये सम्मान कला, सामाजिक कार्य, विज्ञान, व्यापार, चिकित्सा, साहित्य, शिक्षा, खेल और सिविल सेवा जैसे क्षेत्रों में उत्कृष्ट योगदान देने वाले व्यक्तियों को प्रदान किए जाते हैं। पद्म विभूषण असाधारण सेवा के लिए, पद्म भूषण उच्च कोटि की सेवा के लिए, और पद्म श्री उल्लेखनीय सेवा के लिए दिया जाता है।
पद्म पुरस्कारों की घोषणा हर साल गणतंत्र दिवस पर होती है। ये पुरस्कार भारत के राष्ट्रपति द्वारा मार्च या अप्रैल में दिए जाते हैं। राष्ट्रपति भवन में एक औपचारिक समारोह आयोजित होता है। इस दौरान, सम्मानित व्यक्तियों को नागरिक सम्मान दिया जाता है।
एमपी NSUI में शह–मात का खेल: प्रदेश नेतृत्व ने प्रभारी को किया दरकिनार, नियुक्ति पर रोक
धर्मेन्द्र को पद्म विभूषण, रोहित शर्मा को पद्मश्री; 131 हस्तियों को मिला पद्म पुरस्कार
बीबीसी के पत्रकार मार्क टुली का निधन, भोपाल गैस कांड के कवरेज में थी महत्वपूर्ण भूमिका
शादी से पहले शर्त, फिर सेवा का संकल्प: दंतेवाड़ा के गोडबोले दंपति को मिला पद्मश्री
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