शादी से पहले शर्त, फिर सेवा का संकल्प: दंतेवाड़ा के गोडबोले दंपति को मिला पद्मश्री

Sanjay Dhiman | Jan 25, 2026, 17:42 IST
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दंतेवाड़ा के डॉ. रामचंद्र और सुनीता गोडबोले को समाज सेवा के लिए पद्मश्री 2026 मिला। शादी की अनोखी शर्त निभाकर इन्होंने अबूझमाड़ में हजारों आदिवासियों का मुफ्त इलाज किया।

NEWS IN SHORT

  • पद्मश्री सम्मान: दंतेवाड़ा के डॉ. रामचंद्र और सुनीता गोडबोले को संयुक्त पद्मश्री सम्मान मिला।
  • अनोखी शर्त: शादी से पहले वनवासियों की सेवा करने की शर्त पर दोनों एक हुए।
  • निशुल्क इलाज: दंपति पिछले 37 सालों से अबूझमाड़ में मुफ्त स्वास्थ्य सेवाएं दे रहे हैं।
  • बड़ा योगदान: पिछले 5 वर्षों में 8500 से अधिक ग्रामीणों का सफल इलाज किया।
  • नक्सलगढ़ में सेवा: महाराष्ट्र छोड़ छत्तीसगढ़ के दुर्गम नक्सल प्रभावित इलाकों को अपना घर बनाया।

NEWS IN DETAIL

RAIPUR. केंद्र सरकार ने गणतंत्र दिवस 2026 की पूर्व संध्या पर पद्म पुरस्कारों का ऐलान किया है। इस बार छत्तीसगढ़ के तीन चेहरों ने दिल्ली तक अपनी धमक दिखाई है। इनमें सबसे ज्यादा चर्चा दंतेवाड़ा के 'सेवा दूत' डॉ. रामचंद्र गोडबोले और उनकी पत्नी सुनीता गोडबोले की हो रही है। इस जोड़ी को संयुक्त रूप से पद्मश्री सम्मान के लिए चुना गया है।

यह कहानी सिर्फ एक अवॉर्ड की नहीं है। यह कहानी है एक अटूट वादे और कठिन संघर्ष की। डॉ. गोडबोले पिछले 37 सालों से बस्तर के जंगलों में डटे हुए हैं। उन्होंने महाराष्ट्र का आरामदायक जीवन छोड़कर अबूझमाड़ की सेवा को चुना है। आज के दौर में जहां डॉक्टर शहरों की तरफ भागते हैं, वहां गोडबोले दंपति ने नक्सलीगढ़ को अपना घर बनाया।

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शादी की वो अनोखी शर्त जिसने बदल दी जिंदगी

डॉ. रामचंद्र गोडबोले बताते हैं कि उनकी पत्नी सुनीता का साथ सबसे बड़ा सहारा रहा है। दिलचस्प बात यह है कि शादी से पहले ही उनकी पत्नी ने एक शर्त रखी थी। पत्नी सुनीता ने साफ कह दिया था कि उन्हें अपना पूरा जीवन वनवासियों की सेवा में लगाना है। डॉ. रामचंद्र गोडबोले ने न सिर्फ इस शर्त को माना, बल्कि कंधे से कंधा मिलाकर इस सफर में शामिल रहे। आज सुनीता गोडबोले दंतेवाड़ा में CWC (Child Welfare Committee) की सदस्य के रूप में भी सक्रिय हैं।

यह जोड़ी मिलकर उन इलाकों में जाती है जहां सरकारी तंत्र भी मुश्किल से पहुंचता है। बीजापुर, सुकमा और नारायणपुर के अंदरूनी गांवों में इन्होंने सैकड़ों हेल्थ कैंप लगाए हैं। इनका मकसद सिर्फ इलाज करना नहीं, बल्कि ग्रामीणों को स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करना भी है।

37 सालों का संघर्ष और हजारों चेहरों पर मुस्कान

डॉ. गोडबोले का सफर 1990 में बस्तर से शुरू हुआ था। बीच में कुछ पारिवारिक वजहों से उन्हें वापस महाराष्ट्र जाना पड़ा। लेकिन उनका मन हमेशा आदिवासियों के बीच ही लगा रहा। साल 2010 में वे फिर से बारसूर लौटे और सेवा में जुट गए। आंकड़ों की बात करें तो पिछले 5 सालों में ही उन्होंने लगभग 8500 ग्रामीणों का मुफ्त इलाज किया है।

वे सिर्फ खुद इलाज नहीं करते, बल्कि बड़े शहरों के विशेषज्ञों को भी दंतेवाड़ा बुलाते हैं। इनका काम देखकर साफ लगता है कि 'सेवा ही परमो धर्म:' सिर्फ एक नारा नहीं है। इसी समर्पण का नतीजा है कि आज भारत सरकार ने उन्हें देश के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान से नवाजा है।

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छत्तीसगढ़ के अन्य गौरव: बुधरी ताती को भी मिला सम्मान

गोडबोले दंपति के साथ-साथ दंतेवाड़ा की ही बुधरी ताती को भी पद्मश्री दिया गया है। बुधरी ताती ने स्वास्थ्य और सामाजिक क्षेत्र में अद्भुत काम किया है। बस्तर जैसे चुनौतीपूर्ण इलाके से तीन-तीन लोगों का चयन होना यह साबित करता है कि अब दूरदराज के इलाकों में छिपी प्रतिभाओं को सही पहचान मिल रही है। यह छत्तीसगढ़ की जनता के लिए गर्व का क्षण है।

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