जल, जंगल और जमीन पर कांग्रेस का नया दांव, आदिवासी वोट बैंक फिर बनेगा ताकत?

Ramanand Tiwari | Jun 25, 2026, 21:17 IST
Photograph: (thesootr)
BHOPAL. कांग्रेस ने मध्य प्रदेश में आदिवासी वोट साधने की नई रणनीति बनाई है। अब जल, जंगल, जमीन पर फोकस कर समिति गठित की गई है। संगठनात्मक चुनौतियों के बीच यह बड़ा राजनीतिक दांव माना जा रहा है।

ऐसे समझें क्या है पूरा मामला...

  • कांग्रेस ने आदिवासी मुद्दों पर नई रणनीतिक समिति बनाई।
  • जल, जंगल-जमीन अधिकारों पर राजनीतिक फोकस बढ़ाया।
  • उमंग सिंघार सहित वरिष्ठ नेताओं को जिम्मेदारी दी गई।
  • वन अधिकार कानून और जमीन विवाद मुख्य एजेंडा।
  • आदिवासी वोट बैंक साधने की कांग्रेस की कोशिश तेज।

आदिवासी राजनीति में वापसी की कोशिश या नया राजनीतिक प्रयोग? मध्य प्रदेश में लगातार चुनावी चुनौतियों और संगठनात्मक कमजोरियों से जूझ रही कांग्रेस अब जल, जंगल और जमीन के मुद्दों के सहारे नई राजनीतिक जमीन तलाशने की कोशिश करती दिखाई दे रही है।



पार्टी ने आदिवासी अधिकारों से जुड़े सवालों पर एक उच्च स्तरीय समिति बनाकर संकेत दिया है कि आने वाले दिनों में वह इस मुद्दे को राजनीतिक केंद्र में लाने की तैयारी कर रही है।



यह कदम ऐसे समय उठाया गया है जब कांग्रेस हाल के वर्षों में कई राजनीतिक झटके झेल चुकी है। राज्यसभा चुनाव से लेकर संगठनात्मक गतिविधियों तक कई मौकों पर पार्टी की अंदरूनी खींचतान खुलकर सामने आई है।



ऐसे में सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या यह समिति सिर्फ कागजी कवायद साबित होगी या वास्तव में राजनीतिक असर पैदा कर पाएगी।



आखिर बनाई क्यों गई यह समिति?

अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के निर्देश पर मध्य प्रदेश कांग्रेस प्रभारी हरीश चौधरी ने आदिवासी मुद्दों पर फोकस करने के लिए विशेष समिति का गठन किया है।



पार्टी का दावा है कि समिति आदिवासी समाज के अधिकारों, वन अधिकार कानून के क्रियान्वयन और जमीन से जुड़े विवादों का अध्ययन कर राजनीतिक एवं सामाजिक रणनीति तैयार करेगी।



दरअसल कांग्रेस मानती है कि प्रदेश की राजनीति में आदिवासी वर्ग निर्णायक भूमिका निभाता है। यही वजह है कि पार्टी इस वर्ग के बीच अपनी सक्रियता बढ़ाने की कोशिश कर रही है।



समिति में किन नेताओं को मिली जिम्मेदारी?

कांग्रेस ने इस समिति में कई वरिष्ठ नेताओं को शामिल किया है।



प्रमुख सदस्य...

  • नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार
  • पूर्व मंत्री कमलेश्वर पटेल
  • पूर्व नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह "राहुल भैया"
  • आदिवासी कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष विक्रांत भूरिया

इन नेताओं को आदिवासी क्षेत्रों से जुड़े मुद्दों पर पार्टी की दिशा तय करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है।



समिति किन मुद्दों पर करेगी काम?

प्रमुख फोकस क्षेत्र...

  • जल, जंगल और जमीन के अधिकारों का संरक्षण।
  • आदिवासियों के संवैधानिक और पारंपरिक अधिकारों की रक्षा।
  • वन अधिकार अधिनियम के क्रियान्वयन की समीक्षा।
  • जमीन से जुड़े विवादों और दावों का अध्ययन।
  • आदिवासी अंचलों में जनआंदोलन और राजनीतिक अभियान की रणनीति।
  • सरकार के खिलाफ स्थानीय मुद्दों को संगठित तरीके से उठाना।

कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या है?

समिति का गठन अपने आप में बड़ा राजनीतिक संदेश है, लेकिन असली चुनौती उसके कामकाज को लेकर होगी। प्रदेश कांग्रेस में समय-समय पर गुटबाजी और नेतृत्व संघर्ष की चर्चा होती रही है। कई बड़े नेताओं को एक मंच पर लाने की कोशिश पहले भी हुई, लेकिन अपेक्षित राजनीतिक परिणाम नहीं मिले।



यही कारण है कि राजनीतिक विश्लेषक अब इस समिति को केवल आदिवासी अधिकारों के मंच के रूप में नहीं, बल्कि कांग्रेस की संगठनात्मक परीक्षा के रूप में भी देख रहे हैं।



भाजपा पर हमला या खुद को मजबूत करने की तैयारी?

कांग्रेस की रणनीति केवल भाजपा सरकार पर हमला करने तक सीमित नहीं दिखती। पार्टी समझती है कि सिर्फ आरोप-प्रत्यारोप से राजनीतिक लाभ नहीं मिलता।



इसलिए जल, जंगल और जमीन जैसे भावनात्मक और जमीनी मुद्दों को केंद्र में रखकर कांग्रेस आदिवासी समाज के बीच अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने का प्रयास कर रही है। यदि यह अभियान गांवों और वन क्षेत्रों तक पहुंचता है, तो इसका राजनीतिक असर दिखाई दे सकता है।



सबसे बड़ा सवाल: क्या मुद्दे गुटबाजी पर भारी पड़ेंगे?

कांग्रेस ने जिन नेताओं को समिति में शामिल किया है, वे अपने-अपने क्षेत्रों में प्रभाव रखते हैं। लेकिन सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि क्या ये नेता व्यक्तिगत और गुटीय समीकरणों से ऊपर उठकर साझा रणनीति पर काम कर पाते हैं।



यदि समिति केवल बैठकों और बयानों तक सीमित रही तो इसका असर सीमित रहेगा। लेकिन यदि जल, जंगल और जमीन के सवालों को सड़क से लेकर सदन तक लगातार उठाया गया, तो यह कांग्रेस के लिए नई राजनीतिक ऊर्जा का स्रोत बन सकता है।



मध्य प्रदेश कांग्रेस ने आदिवासी राजनीति के सबसे संवेदनशील मुद्दे जल, जंगल और जमीन पर बड़ा दांव खेला है। समिति गठन से संदेश तो स्पष्ट गया है, लेकिन इसकी असली सफलता नेताओं की सक्रियता, संगठन की एकजुटता और जमीनी संघर्ष पर निर्भर करेगी।



आने वाले महीनों में यह साफ हो जाएगा कि यह पहल कांग्रेस के लिए राजनीतिक संजीवनी बनती है या फिर एक और संगठनात्मक प्रयोग बनकर रह जाती है।



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