संविदा नीति पर सरकार के पास ही नहीं पूरा रिकॉर्ड, 4 महीने से विभाग नहीं दे रहे जवाब
समझें क्या है पूरा मामला...
- चार महीने में कई बार रिमाइंडर भेजे गए।
- कई विभागों ने अब तक जानकारी नहीं भेजी।
- सरकार के पास संविदाकर्मियों का समग्र आंकड़ा नहीं।
- मुख्यमंत्री स्तर की समीक्षा जरूरी जानकारी के अभाव में अटकी।
- विभागों से नीति के हर प्रावधान का बिंदुवार जवाब मांगा गया।
मध्यप्रदेश सरकार की संविदा नीति 2023 के क्रियान्वयन की जमीनी हकीकत जानने की कोशिश खुद सरकारी तंत्र में ही अटक गई है। मुख्यमंत्री स्तर पर प्रस्तावित समीक्षा से पहले सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) को यह तक पता नहीं चल पा रहा कि प्रदेश में कितने संविदाकर्मी कार्यरत हैं और उन्हें नीति के मुताबिक सुविधाएं मिल रही हैं या नहीं। वजह यह है कि कई विभाग, निगम, मंडल, परियोजनाएं और स्वायत्त संस्थाएं पिछले चार महीने से लगातार भेजे जा रहे पत्रों के बावजूद जानकारी उपलब्ध नहीं करा रही हैं।
चार महीने से जानकारी जुटाने में जुटा जीएडी
सामान्य प्रशासन विभाग लगातार यह जानकारी एकत्र करने में लगा है कि संविदा नीति-2023 का वास्तविक क्रियान्वयन किस स्तर तक हुआ है। इसके लिए विभागों, निगमों, मंडलों, परियोजनाओं और स्वायत्त संस्थाओं से विस्तृत रिपोर्ट मांगी गई, लेकिन बड़ी संख्या में विभागों ने अब तक जवाब नहीं दिया है।
सरकार को नहीं पता कितने संविदाकर्मी हैं
सबसे अहम बात यह है कि सरकार के पास अभी तक प्रदेश में कार्यरत संविदा अधिकारी-कर्मचारियों की वास्तविक संख्या उपलब्ध नहीं है। ऐसे में यह आकलन भी संभव नहीं हो पा रहा कि उन्हें नीति के अनुरूप सुविधाएं और अधिकार मिल रहे हैं या नहीं। इससे संविदा नीति के प्रभावी क्रियान्वयन पर सवाल खड़े होने लगे हैं।
मुख्यमंत्री की समीक्षा से पहले मांगी गई पूरी रिपोर्ट
मुख्यमंत्री की घोषणा के अनुरूप संविदा नीति-2023 की समीक्षा प्रस्तावित है। इसी को ध्यान में रखते हुए सामान्य प्रशासन विभाग ने सभी विभागों से पूछा है कि नीति के कौन-कौन से प्रावधान लागू किए गए हैं, कितने संविदाकर्मी कार्यरत हैं और जिन प्रावधानों को लागू नहीं किया गया, उनके पीछे क्या कारण हैं।
हर प्रावधान का देना होगा लिखित जवाब
जीएडी ने सभी अपर मुख्य सचिव, प्रमुख सचिव और सचिव स्तर के अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि वे प्रत्येक बिंदु पर स्पष्ट जानकारी उपलब्ध कराएं। यदि किसी प्रावधान का पालन नहीं किया गया है तो उसका कारण भी लिखित रूप में बताना अनिवार्य किया गया है।
फिर भी अधूरी जानकारी
जानकारी उपलब्ध कराने के लिए सामान्य प्रशासन विभाग ने लगातार पत्र जारी किए। इसके बावजूद कई विभागों से अपेक्षित जानकारी नहीं मिली। अब एक बार फिर सभी संबंधित विभागों को तत्काल रिपोर्ट भेजने के निर्देश दिए गए हैं ताकि मुख्यमंत्री स्तर पर समीक्षा पूरी की जा सके। यह मामला केवल संविदा नीति के क्रियान्वयन का नहीं, बल्कि सरकारी मॉनिटरिंग सिस्टम की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़ा करता है। जब स्वयं सरकार के पास ही अपने विभागों में कार्यरत संविदाकर्मियों का अद्यतन रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है, तब नीति के प्रभावी पालन और लाभार्थियों तक उसके वास्तविक असर का मूल्यांकन करना भी चुनौती बन जाता है।
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