एमपी में न्यायाधीशों को मिल रहे 16 तरह के भत्ते, फिर भी 21 लाख से ज्यादा केस पेंडिंग, 100 से ज्यादा जज ऑफिसों में अटैच

Kaushiki | Oct 20, 2026, 13:38 IST
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मध्यप्रदेश की अदालतों में 21 लाख से ज्यादा केस अब भी लंबित
मध्यप्रदेश की अदालतों में 21 लाख से ज्यादा केस अब भी लंबित

MP की अदालतों में 21 लाख से अधिक केस पेंडिंग हैं। फिर भी यौ से ज्यादा जज दफ्तरी कामों और प्रतिनियुक्ति पर तैनात हैं। जजों को 16 तरह के भत्ते मिलते हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक, यदि ये जज अदालतों में सुनवाई करें तो हर साल 30 हजार से अधिक लंबित मुकदमों का फैसला हो सकता है। आइए इस आर्टिकल को डिटेल से जानें।

मध्यप्रदेश में लंबित केस की संख्या जिला और अधीनस्थ अदालतों में 21 लाख 42 हजार 280 पहुंच गई है। इनमें 36 हजार 80 मामले दस साल से ज्यादा पुराने हैं। करीब 15 सौ न्यायाधीशों में से 100 से अधिक प्रतिनियुक्ति पर दफ्तरों में काम कर रहे हैं। हाईकोर्ट प्रिंसिपल बेंच में भी 22 जज अटैच हैं। जस्टिस आरएस गर्ग कहते हैं कि जजों को मूल काम पर लौटना चाहिए।

हाईकोर्ट प्रिंसिपल बेंच में 22 जज

Judges on deputation यानी वे जज, जो सुनवाई की जगह दफ्तर संभाल रहे हैं। इनमें अधिकांश डीजे (DJ - District Judge) या एडीजे (ADJ - Additional District Judge) स्तर के हैं।

MP High Court की प्रिंसिपल बेंच में 22 निचली अदालत के न्यायाधीश अटैच हैं। ये प्रशासनिक और दफ्तरी काम संभाल रहे हैं। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के इंदौर और ग्वालियर खंडपीठ में भी 3-3 जज प्रतिनियुक्ति पर हैं। तीनों बेंच की संख्या जोड़ें तो कुल 28 जज हाईकोर्ट में अटैच हैं।

लोकायुक्त, रेरा और विजिलेंस में भी जज

लोकायुक्त संगठन में पांच न्यायाधीशों को भेजा गया है। वे लोकायुक्त के विधिक सलाहकार सहित दूसरे काम भी देख रहे हैं। रजिस्ट्रार की जिम्मेदारी भी एडीजे स्तर के जज के पास है। यह जिम्मेदारी रेरा (RERA - Real Estate Regulatory Authority) और उपभोक्ता फोरम में है। विजिलेंस (निगरानी) में अलग-अलग जिलों में एक-एक एडीजे स्तर के जज पदस्थ हैं।

जिला अदालतों के जज और 16 भत्ते

आपको बता दें कि District Court Judges को सुविधाएं देने के लिए सरकार ने दो आयोग बनाए थे। मकसद था कि जिला एवं सत्र न्यायालयों में लंबित मुकदमे जल्दी खत्म हों। शेट्टी और रेड्डी आयोग ने सुविधाएं, छुट्टियां और भत्ते देने का सुझाव दिया था। इन्हीं के आधार पर न्यायाधीशों को 16 तरह के भत्ते और सुविधाएं मिल रही हैं।

मकान किराया, बिजली-पानी, घरेलू सहायक और टेलीफोन जैसे भत्ते इनमें शामिल हैं। समाचार पत्र, परिवहन और चिकित्सा के खर्च पर भी सहायता मिलती है। निर्धारित पोशाक के खर्च के लिए अलग भत्ता है।

बचे हुए अर्न लीव के बदले नियमानुसार पेमेंट भी होता है। आवास निर्माण अग्रिम (Housing Construction Advance), स्थानांतरण भत्ता (Relocation Allowance) और विशेष वेतन भी इसी सूची में हैं।

बच्चों का इंटरनेट मौलिक अधिकार: सुप्रीम कोर्ट ने पाबंदी का विरोध क्यों किया? जानें पूरा मामला | Children's Internet a Fundamental Right: Why did the Supreme Court oppose the ban? Know the full story
इंटरनेट इस्तेमाल करना बच्चों का भी मौलिक अधिकार, सुप्रीम कोर्ट ने पूरी पाबंदी का क्यों किया विरोध? समझें इसके मायने
19 Oct 2026 ,
By Saurabh Mishra
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में अपने एक आदेश में साफ किया है कि इंटरनेट का इस्तेमाल करना बच्चों का भी मौलिक अधिकार है। उनकी सुरक्षा के नाम पर इंटरनेट पर पूरी तरह रोक नहीं लगाई जा सकती, हालांकि नुकसानदायक कंटेंट पर पाबंदी लग सकती है। द सूत्र प्राइम में समझें, सर्वोच्च अदालत ने ऐसा क्यों कहा।
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में अपने एक आदेश में साफ किया है कि इंटरनेट का इस्तेमाल करना बच्चों का भी मौलिक अधिकार है। उनकी सुरक्षा के नाम पर इंटरनेट पर पूरी तरह रोक नहीं लगाई जा सकती, हालांकि नुकसानदायक कंटेंट पर पाबंदी लग सकती है। द सूत्र प्राइम में समझें, सर्वोच्च अदालत ने ऐसा क्यों कहा।

भत्तों की शर्त और उठा सवाल

रिपोर्ट के मुताबिक, प्रतिनियुक्ति पर गए जज मुकदमों की सुनवाई नहीं कर रहे। ऐसे में सवाल उठता है कि भत्ते देने का मकसद कितना पूरा हुआ? न्यायाधीशों से उनका मूल काम ही लेना चाहिए।

“शेट्टी और रेड्डी आयोग की भत्तों को लेकर सिफारिशें इसी शर्त पर लागू की गई थीं कि जजेस सुविधा संपन्न होने के बाद तेजी से मामलों का निराकरण करेंगे। प्रतिनियुक्ति में वे अपना मूल काम यानी प्रकरणों की सुनवाई नहीं कर रहे हैं। प्रतिनियुक्ति वाले पद टेक्निकल, क्लेरिकल के हैं। वहां पर अलग से नियुक्त होना चाहिए। न्यायाधीशों की प्रतिनियुक्ति तत्काल समाप्त कर उन्हें अदालतों में भेजना चाहिए।”
By: जस्टिस आरएस गर्ग, सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश

30 हजार केस का हिसाब क्या है?

विधि विशेषज्ञ संजय मेहरा ने एक जज के काम का औसत बताया है। एक जज साल में करीब 300 केस निपटाता है।

“जिला कोर्ट में एक न्यायाधीश महीने में औसतन 25 के करीब प्रकरणों का निराकरण करते हैं। इस हिसाब से पूरे साल में 300 केस का फैसला देते हैं। प्रतिनियुक्ति पर गए जज अदालतों में सुनवाई करें तो हर साल 30 हजार से अधिक केस खत्म कर सकते हैं।”
By: संजय मेहरा, विधि विशेषज्ञ
अगर 100 जज साल में 300-300 केस निपटाएं, तो कुल 30 हजार केस होते हैं। यह संख्या 21 लाख 42 हजार 280 लंबित केस का करीब 1.4 फीसदी है। बाकी 21 लाख से ज्यादा केस फिर भी अदालतों में रहेंगे। करीब 15 सौ जजों में केस बांटें, तो हर जज के हिस्से करीब एक लाख 428 केस आते हैं। यह सिर्फ औसत है। हर अदालत का रियल बर्डन अलग हो सकता है।

यह खबर क्यों जरूरी है

किसी केस में 10 साल से ज्यादा लग जाएं, तो भरोसा कमजोर होता है। ये खबर बताती है कि 21 लाख 42 हजार 280 केस के बीच न्यायाधीश कहां तैनात हैं। जवाबदेही और पारदर्शिता का सवाल यहीं से उठता है। मध्यप्रदेश के लोगों के लिए यह अपने केस की रफ्तार का मामला है। जल्द न्याय सिर्फ अदालत का नहीं, पूरे तंत्र का काम है।

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FAQs:

  1. मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में कितने जज प्रतिनियुक्ति पर हैं?
    मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की प्रिंसिपल बेंच में 22 जज प्रतिनियुक्ति पर हैं, जबकि इंदौर और ग्वालियर खंडपीठ में 3-3 जज प्रतिनियुक्ति पर हैं। कुल मिलाकर 28 जज हाईकोर्ट में अटैच हैं।
  2. जजों की प्रतिनियुक्ति का क्या मकसद है?
    जजों की प्रतिनियुक्ति का उद्देश्य प्रशासनिक और दफ्तरी काम संभालना है, ताकि न्यायाधीश अदालत में सुनवाई की बजाय इन कार्यों को सुचारु रूप से कर सकें।
  3. स्थानीय अदालतों में लंबित मुकदमों के निराकरण में जजों की भूमिका क्या है?
    जिला अदालतों में एक न्यायाधीश औसतन साल में करीब 300 केस निपटाता है। अगर प्रतिनियुक्ति पर गए जज वापस अदालतों में सुनवाई करें, तो वे हर साल 30,000 से अधिक केस खत्म कर सकते हैं।
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  • district court judges
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