वन भूमि डायवर्जन में देश में अव्वल मध्य प्रदेश, संसद की रिपोर्ट में खुलासा
समझें क्या है पूरा मामला
- मध्य प्रदेश देश में सबसे ज्यादा जंगल खोने वाला राज्य बन गया है।
- संसद में पेश केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय की रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ है।
- दो साल में राज्य ने 371.54 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र गंवाया है।
- पिछले पांच साल में 24,969.87 हेक्टेयर वन भूमि विकास कामों के लिए दी गई है।
- नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने सरकार की नीति पर सवाल उठाए हैं।
मध्य प्रदेश में पेड़ कटाई को लेकर विरोध लगातार बढ़ रहा है। सिंगरौली से भोपाल तक कई जगह पेड़ काटे जा रहे हैं। विकास परियोजनाओं के नाम पर यह कटाई हो रही है। विपक्षी दल और पर्यावरणविद इस पर सवाल उठा रहे हैं। अब केंद्र सरकार की एक रिपोर्ट ने मामला और गंभीर बना दिया है। संसद में रखी रिपोर्ट में मध्य प्रदेश को लेकर चौंकाने वाले आंकड़े हैं। राज्य ने सबसे ज्यादा जंगल खोया है। साथ ही सबसे ज्यादा वन भूमि दूसरे कामों में बदली गई है।
वन क्षेत्र में भारी गिरावट
भारतीय वन स्थिति रिपोर्ट (Indian State of Forest Report) के आंकड़े चिंता बढ़ाने वाले हैं। साल 2021 में मध्य प्रदेश का कुल वन आवरण 77,444.98 वर्ग किलोमीटर था। साल 2023 आते-आते यह घटकर 77,073.44 वर्ग किलोमीटर रह गया। यानी सिर्फ दो साल में राज्य ने 371.54 वर्ग किलोमीटर जंगल खो दिया। देश के किसी और राज्य में इतनी बड़ी गिरावट दर्ज नहीं हुई। केंद्र शासित प्रदेशों में भी ऐसी गिरावट नहीं देखी गई। इस मामले में मध्य प्रदेश पूरे देश में पहले नंबर पर है।
जमीन बदलने में एमपी सबसे आगे
सिर्फ जंगल घटने की बात नहीं है। वन भूमि दूसरे कामों में बदलने में भी एमपी आगे है। साल 2021 से 2026 के बीच देशभर में 1,05,594.32 हेक्टेयर वन भूमि डायवर्ट हुई। यह जमीन गैर-वानिकी कामों के लिए इस्तेमाल हुई। इसमें अकेले मध्य प्रदेश की हिस्सेदारी 24,969.87 हेक्टेयर रही। यह कुल आंकड़े का करीब 23.65 प्रतिशत है। मतलब हर चौथी हेक्टेयर वन भूमि मध्य प्रदेश से गई।
किन कामों के लिए कटे जंगल
पिछले पांच साल के आंकड़े बताते हैं कि जंगल किन कामों के लिए कटे। खनन और उत्खनन के लिए देशभर में 23,976.72 हेक्टेयर वन भूमि दी गई। सड़क निर्माण के लिए 22,284.65 हेक्टेयर जमीन इस्तेमाल हुई। जलविद्युत और सिंचाई परियोजनाओं के लिए 18,788.12 हेक्टेयर वन भूमि गई। पावर ट्रांसमिशन लाइनों के लिए 14,006.45 हेक्टेयर जंगल काटा गया। रिपोर्ट्स के मुताबिक इन सभी श्रेणियों में मध्य प्रदेश की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा रही।
अन्य राज्यों की स्थिति
हर राज्य की तस्वीर एक जैसी नहीं है। देश का कुल वन आवरण 7,15,342.61 वर्ग किलोमीटर है। यह पूरे भौगोलिक क्षेत्रफल का 21.76 प्रतिशत है। कई राज्यों ने अपना वन क्षेत्र बढ़ाया भी है। इनमें बिहार, गुजरात, कर्नाटक, केरल, मिजोरम, ओडिशा और उत्तर प्रदेश शामिल हैं। इनमें सबसे ज्यादा बढ़त मिजोरम में 241.73 वर्ग किलोमीटर दर्ज हुई। पूरे देश में कुल 156.41 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र बढ़ा है। लेकिन इसी दौरान मध्य प्रदेश में सबसे ज्यादा कमी आई है।
प्रतिपूरक वनीकरण की व्यवस्था
पर्यावरण मंत्रालय ने संसद में साफ किया कि वनों की रक्षा राज्यों की जिम्मेदारी है। यह जिम्मेदारी दो पुराने कानूनों से तय होती है। भारतीय वन अधिनियम 1927 और वन संरक्षण अधिनियम 1980 से यह नियम बना है। विकास कामों के लिए जंगल की जमीन देने पर प्रतिपूरक वनीकरण जरूरी होता है। इसके साथ एनपीवी (Net Present Value) की राशि भी जमा करानी होती है। यह पैसा कैम्पा (CAMPA) से नए जंगल लगाने में खर्च होता है। कैम्पा का पूरा नाम कंपनसेटरी अफॉरेस्टेशन फंड मैनेजमेंट एंड प्लानिंग अथॉरिटी है।
2030 तक जमीन सुधारने का लक्ष्य
केंद्र सरकार ने संसद में अपने लक्ष्य भी बताए हैं। साल 2011 से 2020 के बीच देश में 21.76 मिलियन हेक्टेयर खराब जमीन सुधारी गई। अब सरकार का लक्ष्य साल 2030 तक है। तब तक 26 मिलियन हेक्टेयर बंजर जमीन को हरा-भरा बनाना है। इसके लिए राष्ट्रीय वनीकरण कार्यक्रम और हरित भारत मिशन चलाए जा रहे हैं। हालांकि मध्य प्रदेश के मौजूदा आंकड़े इन लक्ष्यों पर सवाल खड़े करते हैं।
बाघों के कॉरिडोर पर भी खतरा
मध्य प्रदेश को टाइगर स्टेट के नाम से जाना जाता है। लगातार पेड़ कटाई से बाघों के रास्ते प्रभावित हो रहे हैं। नए ढांचे बनने से भी यह असर बढ़ रहा है। बांधवगढ़, कान्हा, पन्ना और सतपुड़ा में यह असर साफ दिख रहा है। जंगल टुकड़ों में बंटने से वन्यजीव अपने पुराने रास्तों से भटक रहे हैं। इससे इंसान और जंगली जानवरों के बीच टकराव बढ़ने का डर है।
नेता प्रतिपक्ष ने उठाए सवाल
नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने इस मामले पर सरकार को घेरा है। उनका कहना है कि इसके पीछे दो बड़ी वजहें हैं। पहली वजह जंगल की जमीन पर हो रहे अवैध कब्जे बताई गई है। रिपोर्ट्स के मुताबिक सरकार साल 2005 से स्थिति साफ नहीं कर पाई है। यह तय नहीं हो पाया कि जमीन पर कौन काबिज है। उन्होंने कहा कि किसे पट्टा देना है, यह फैसला भी अटका हुआ है। सिंघार ने मध्य प्रदेश के नए मुख्य सचिव अशोक बर्णवाल पर भी सवाल उठाए। उनका आरोप है कि बर्णवाल के कार्यकाल में नर्मदा किनारे पौधरोपण में गड़बड़ी हुई। हालांकि इस आरोप की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो सकी है। सिंघार ने पूछा कि आखिर जंगल कब तक बचेंगे।
नीति बदलने की मांग
नेता प्रतिपक्ष ने बड़ी कंपनियों को जमीन देने पर भी सवाल उठाया। उनका कहना है कि अंडरग्राउंड माइनिंग का विकल्प अपनाया जा सकता है। इससे जंगल कटे बिना भी खनन का काम हो सकता है। सिंघार के अनुसार सरकार जंगल कटवाकर माइनिंग की मंजूरी दे रही है। रिपोर्ट्स के मुताबिक इसका फायदा चुनिंदा लोगों को मिल रहा है। यह आरोप फिलहाल राजनीतिक बयान के तौर पर सामने आया है। सिंघार ने सरकार से वन नीति में बदलाव की मांग की है।
जरूरी FAQ
मध्य प्रदेश में वन क्षेत्र कितना कम हुआ है?
भारतीय वन स्थिति रिपोर्ट के अनुसार मध्य प्रदेश का वन आवरण साल 2021 में 77,444.98 वर्ग किलोमीटर था। साल 2023 में यह घटकर 77,073.44 वर्ग किलोमीटर रह गया। इस तरह दो साल में राज्य ने 371.54 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र गंवाया। यह देश में सबसे बड़ी गिरावट है।
मध्य प्रदेश में वन भूमि किन कामों के लिए दी गई?
रिपोर्ट के अनुसार पिछले पांच साल में मध्य प्रदेश में 24,969.87 हेक्टेयर वन भूमि गैर-वानिकी कामों के लिए डायवर्ट हुई। यह जमीन खनन, सड़क निर्माण, जलविद्युत परियोजना और पावर ट्रांसमिशन लाइनों के लिए इस्तेमाल हुई। यह देश में सबसे ज्यादा हिस्सेदारी है।
वन भूमि हटाने पर सरकार की क्या नीति है?
भारतीय वन अधिनियम 1927 और वन संरक्षण अधिनियम 1980 के तहत वन भूमि की रक्षा राज्यों की जिम्मेदारी है। विकास कामों के लिए जंगल की जमीन देने पर प्रतिपूरक वनीकरण अनिवार्य है। इसके लिए एनपीवी की राशि कैम्पा के जरिए नए जंगल लगाने में खर्च होती है।
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